बचपन
बचपन
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बस इतनी सी दुआ हैं मेरी रब से
फिर से मेरा बचपन दे दे
खेलकूद मौज मनाऊँ
घर का छोटा सा आँगन दे दे
कब सुबह हुयीं, कब शाम ढली
बेखबर रहने की कमियां दे दे
तितली के पिछे दौड़ लगाऊँ
बचपन की फिर से सारी खुशियाँ दे दे
शाम ढले जब थक के घर को लौटे
सोने को माँ का आँचल दे दे
सही गलत का न एहसास रहे
मन को फिर से इतना चंचल कर दे
हर वक्त साथ रहते थे जो मेरे
फिर से ऐसे दोस्तों की संगत दे दे
जीवन जीने की जहां सदा चाह रहे
ऐ रब, इतनी सी मेरी मिन्नत सुन ले
