अंगारिका
अंगारिका
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अंगारे लगते शीतल से
सोना हार गया पीतल से।
सींच के खुद को एक दलदल से,
कलियाँ खिल आई हैं कमल से।
चंद्र तिलक है उस माथे का,
भौहें लगती हैं बादल से।
देखो, अब तुम द्वार न रोको,
अश्रु बोल रहे काजल से।
तेज़ हवा जब बाल बिखेरे,
लगती सर ढकने आँचल से।
मानो जैसे बोल रही हो,
कौन भिड़े आँधी पागल से।
