अखबार
अखबार
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आज कल अखबार तुम अच्छा नहीं लगता,
पढ़कर तुझसे सब कोई भड़कता .... ।
चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार तक हम दुःखी थे,
हद बढ़ाई आपने बलात्कार न सह पाए।
प्रपंच भी धीरे धीरे शुरू हुआ कौन न जानता?
अब मानुष वध की कथा खुली करने में तू लगा है।
"संकेत " कौन तेरा दोस्त, कौन दुश्मन,
अब तुझे कोई प्रेम .......न करता।
