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kavi dr. mala

Others

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kavi dr. mala

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अखबार

अखबार

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आज कल अखबार तुम अच्छा नहीं लगता, 

पढ़कर तुझसे सब कोई भड़कता ....   ।


चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार तक हम दुःखी थे, 

हद बढ़ाई आपने बलात्कार न सह पाए। 


प्रपंच भी धीरे धीरे शुरू हुआ कौन न जानता?

अब मानुष वध की कथा खुली करने में तू लगा है। 


"संकेत "  कौन तेरा दोस्त, कौन दुश्मन, 

अब तुझे कोई प्रेम .......न करता।



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