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Smita Saksena

Children Stories

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Smita Saksena

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अब वो वाले दिन-रात नहीं आते

अब वो वाले दिन-रात नहीं आते

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वो वाले दिन-रात अब नहीं आते

पर काश वापस आ सकते,

जब माँ के साथ बैठ आँगन में

हाड़ सिहराती-कँपाती ठंड में

सूखी लकडिय़ों से हाथ सेंकते थे।


उन सूखी लकड़ियों और माँ के

प्यार की वो गर्मी अब नहीं,

वह लकडिय़ों की आग और

उसकी वो भली सी गरमाहट,

जो ठंड से बचाकर रखती थी

बदलकर अब पेट की आग बन गई है।


जिसने रोटी की तलाश में

मेरे शहर की गलियों से ही

मुझे अब दूर कर दिया है,

माँ से बिछड़े भी जमाना हुआ

पल पल गिनते बीतते पहर।


शायद वो खुरदुरे हाथों का

नर्म स्पर्श फिर से नसीब में होता,

आँखों में भी चैन की नींद नहीं

सिसकियां कोई नहीं सुनता।


आँसू भी अब पलकों में ही

रहते हैं कोई नहीं इन्हें पोछने वाला,

किस्मत के हैं तमाशे ये सब

जो अब वो वाले दिन-रात नहीं आते।


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