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Dr. Nisha Satish Chandra Mishra

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Dr. Nisha Satish Chandra Mishra

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आओ चले गाँव की ओर

आओ चले गाँव की ओर

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आओ चलें गाँव की ओर

अमवा की डाली पर बौरे फरे

कोयलिया कूँहे गाँव में चहूँ ओर

दरख्त से बंधी नाव हिलोरे लेती

महावर पाँव में लगाकर गोरिया 

देखो थिरकती गाँव में चहूँ ओर

आओ चलें गाँव की ओर 


यशोदा बन मईया जोर से पुकारे 

खाले गुड़ सतुआ आके अपनी ओर

नटखट बछड़ा, रंभाती है गईया 

सावन में लगती जब सखियों संग 

पेड़ो पर झूलों की खूब फूलझिया

देखो खींचे अलग जिंदगानी अपनी ओर

आओ चलें गाँव की ओर 


शादी में बरातियों के स्वागत में 

यारों का ख़ुशियों से जुट जाना

हर त्यौहार को हुड़दंग कर

मिलकर खूब धूम मचाना

आओ चलें गाँव की ओर 


है प्रदूषण से भरा शहरी करण 

हर पल लोकल ट्रेन में रहता 

मौत का अपना अलग ही कहर

जिंदगी है यहाँ पर बड़ी ही व्यस्त 

आओ चलें गाँव की ओर 


शहर में धन माया का है अपना पहर

दोस्त बनकर ठगी कर लेते हैं 

बुजुर्गों की न इस शहर में है कोई कदर

शालीनता पर है न इनकी अपनी पकड़ 

आओ चलें गाँव की ओर 


निर्मल नदी, है निर्मल काया

यही है बाबू अपनी गाँव की माया

है शिष्टाचार यहां, लफ्जों पर लगाम यहां

भाईचारे का है अलग अपना अभिमान यहां

आओ चलें गाँव की ओर 



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