STORYMIRROR

Rishikesh Murgunde

Others

3  

Rishikesh Murgunde

Others

आँखे

आँखे

1 min
224

हाथ में रुमाल लिए खड़ा था कब से 

चाँद पे लगा दाग पोछना था 

तोहफे में देना था उसे, काला चश्मा मेरा 

और छड़ी से मेरी उसे, यूँही डराना था 

सोचा कूद के हाथ लगाऊ 

हाथ आ जाए शायद 

मैंने छलांग लगाई, 

और नींद खुल गई 

अब हर तरफ सिर्फ अँधेरा हैं 

और चाँद गायब. 

अमावस है शायद.


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Rishikesh Murgunde

आँखे

आँखे

1 min पढ़ें