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Indu Singh

  Literary Colonel

‘भ्रम भंग’

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जब आया साँसों का अंत डूबने लगा जीवन सूर्य तब ये राज़ समझ आया कि जिसे समझते रहे वजूद अपना वो तो बस, कद...

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. ‘जीने का सामां...’

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यूँ तो सब कुछ मिलता इस जहाँ में लेकिन... जिंदा रहने का सामां नहीं मिलता

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सेरोगेट मदर’

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मानव का सृजन जब से करने लगा मानव किराये की कोख भी तब से बेचने लगा मानव भरकर परखनली में मानव बनाने का...

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अनंत इंतेज़ार.

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हैं दिल को ख़ुद के यकीं पर... पूरा यकीन... कि भले ही हो जाऐ ज़ुल्मों-सितम की हद या फिर आ ही जाऐ क़यामत....

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मेरी अंतरात्मा’

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जो मुझको सदा राह दिखाती मोहमाया भरी दुनिया में भटकने से भी बचाती

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एक ख्याल

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न जाने किसने आकर तुम्हारे जीवन के रिक्त पलों को अपने अहसास से भर दिया

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ओ मेरे सांवरे...’

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उस महासमर में जब अपने ही खड़े थे अपनों के सामने तुम ही तो आये थे तब बनकर कुशल सारथी धर्मरथ को थामने ।

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