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मैं सपनों के इस खूनी, स्याह( सच कहूँ या कहानी) को न लिख रही होती काश....। मैं सपनों के इस खूनी, स्याह( सच कहूँ या कहानी) को न लिख रही होती काश....
मत काटो इनके पंखों को माँ के कोख में ही, मत काटो इनके पंखों को माँ के कोख में ही,
आज प्रकृति के एक फूंक से उसे तिनके की भांति उड़ते भी देखा। आज प्रकृति के एक फूंक से उसे तिनके की भांति उड़ते भी देखा।