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डाका
डाका
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© Surendra Raghuwanshi

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मेरी उम्र करीब आठ साल रही होगी , जब मेरे गाँव और घर में डाका पड़ा था।मैं दूसरी क्लास में पढ़ता था और उस वक़्त मेरे लिए डाका पड़ने का अर्थ था अपने दूसरी क्लास के गणित के किताब में रखे मेरे दो रूपए के नोट और प्लास्टिक की थैली में रखे मेरे पटाखों का डाके में लुट जाना। आधी रात को अचानक कई दर्जन बंदूक धारियों ने गाँव में धावा बोल दिया। थका हारा गनिहारी और गांव नींद के सागर में डूबा था।नींदों में कोई जादुई राजमहलों के सपने नहीं थे। सपनों में भी खेत - खलिहान, फसलें, मवेशी , सूखा ,बीमारी , भूत प्रेत भूख और प्यास थे। पर डकैत अचानक आक्रमणकारियों की तरह गांव में आये और उन्होंने दहशत की बौछार कर दी। वे दूसरे घरों को लूट रहे थे तब तक खबर हमारी बाखर में आ पहुंची।कल्लू ने घर के आंगन में आकर हांफते हुए चिल्लाकर कहा -"गांव में डाकू घुस गए। महेन्दर के घर को लूट रहें हैं। जल्दी भाग जाओ।" यह खबर देकर कल्लू खुद वहां से भागकर खेतों के सुनसान एकान्त अंधेरे में समा गया।इस सूचना पर पूरा घर भौंचक्का रह गया। जो घरवाले जाग गए उन्होंने चिल्लाकर और किवाड़ खटखटाकर बाकी परिवार वालों को जगा दिया। इसी तरह पड़ोसियों को जगाकर डाके की खबर दे दी। सभी महिलाओं ने अपने गहने आदि अपनी -अपनी संदूकों से आनन- फानन में निकाले और बच्चों को लेकर घर के मर्दों के साथ अपनी बाखर के आगे बगल में ही बनी बिहारी गड़रिया की संकरी छेंड़ी में इकठ्ठा हो गए। किसी ने दौड़कर बिहारी के घर के आगे जाकर उसे जगाया और उसकी गाडरों वाली सार का छेंड़ी वाला दरवाजा खुलवा दिया। दरवाजा खुलते ही सभी उसमें भर्र- भर्र गाडरों और बकरियों के ऊपर गिरते गए। अम्मा को अचानक ध्यान आया कि वे मुझे तो घर में ही सोता छोड़ आईं। वे चिल्लाकर घर की ओर मुझे लेने आईं तो मझले काका भी डंडा लेकर उनके साथ आ गए। उन्होंने मुझे उठाया और और जल्दी से छेंड़ी की ओर भागीं। लौटते समय डाकुओं की टॉर्च का बहुत दूर से आता हुआ छपका माँ के चेहरे पर पड़ा। पर समय रहते अम्मा और मझले काका छेंड़ी के खुले दरवाजे से बिहारी गड़रिया की गाडरों वाली सार में जाकर अन्दर से दरवाजा बंद कर चुके थे। महिला , पुरुषों और बच्चों के अचानक अपनी भरी हुई सार में आ धमकने से भेड़ बकरियां और उनके बच्चे बेचैन होकर मिमियाने लगे।पर सार निचाट में और बंद थी सो उनकी मिमियाने की आवाजें भी डाकुओं के कानों में पहुंचने का खतरा नहीं था।डाकू सोच भी नहीं सकते थे कि हम सब घर के पिछवाड़े की खण्डहर गड़रिया की सार में छिपे हो सकते हैं। पड़ोसिन बमूरिया वाली काकी अपने गहनों को ही ढूंढती रहीं और बाखर की औरतों द्वारा बार- बार बुलाए जाने के बाद भी घर से निकलकर सबके साथ भागी नहीं। इसलिए वे वहां से रफू चक्कर हो पातीं तब तक डाकुओं की एक टोली सीधे उनके घर में ही दाखिल हो गई। घर की छानबीन में उन्हें और तो कोई नहीं मिला पर काकी पकड़ में आ गईं। खुद को डाकुओं से घिरा हुआ पाकर काकी दहाड़ें मारकर रोने लगीं। डाकू उनसे गहने और रूपए पैसे दे देने अथवा गड़े छुपे धन का पता बताने के लिए दबाव बनाने लगे। जब काकी ने कुछ भी नहीं बताया तो वे उनकी पिटाई करने लगे। इसी बीच एक बुजुर्ग से दिखने वाले डाकू ने काकी की पिटाई करने वालों को हिदायत दी-" रे दुष्ट ध्यान से और धीरे दबाव धौंस से पूछताछ कर जा औरत तो पेट सै है।"उस डाकू की हिदायत का पालन करते हुए बाकी डाकुओं ने काकी को सामने से और पेट पर कोई प्रहार नहीं किया। दो चार थप्पड़ पीठ और सिर में हल्के से मारकर उनकी पिटाई बन्द कर दी। काकी ने भी कुछ नहीं बताया डाकुओं को। डाकुओं ने घरों में पसरे सन्नाटे को देखकर जब उनसे पूछा कि आस पड़ोस के लोग कहाँ भाग गए तो काकी ने साफ़ कह दिया कि उन्हें कुछ भी पता नहीं कि लोग कहाँ गए हैं। काकी के बच्चे खुद हमारे साथ गड़रिया की सार में थे। थोड़ी देर बाद डाकू पास ही स्थित हमारे घर के आँगन में थे। वे घर के भीतर घुसकर देख रहे थे। न कोई जन और न ही धन उन्हें वहां मिला।वे आँगन में इकठ्ठा होकर मंत्रणा करने लगे। बड़े ताऊ जी अटारी पर चढ़कर छिपे हुए बैठे थे।उन्होंने अटारी की कोर की पाट ऊपर से आँगन के डाकुओं पर गिराने के इरादे से उसे पूरी ताक़त लगाकर ऊपर से नीचे की ओर खिसकाना शुरू किया। दो पाटों में सरकते हुए रगड़ होने से खर्र-खर्र की आवाज़ को डाकुओं ने सुन लिया और चौकन्ने होते हुए एक डाकू ने कहा - " साथी ऊपर आदमी हैं खैर करौ।" उसके इस कहन में डाकुओं का भय प्रगट हो रहा था।एक डाकू ने बारह बोर की बन्दूक में कारतूस लगाया और हवाई फायर कर दिया। ताऊ जी अँधेरे का लाभ लेते हुए घर के पीछे के खेरे में कूदकर भाग खड़े हुए। सबल सिंह मोटे ताजे और ऊँचे पूरे थे। विधुर थे और शौकिया पहलवानी करते थे।वे मंदिर के पीछे वाले जीने से मंदिर के छत पर चढ़कर गुम्बद और मंदिर की किनारे की मुंडेर के बीच छिपकर बहुत से पत्थर लेकर बैठ गए। जब डाकू हमारे घर की तरफ़ से लौटते हुए मन्दिर के पास मैदान से गुजरने लगे तो सबलसिंह ने डाकुओं पर पत्थर बरसाना शुरू कर दिया।डाकुओं में भगदड़ मच गई। एक डाकू ने एक घर की दीवार की ओट लेकर जहां से पत्थर आ रहे थे उस स्थान का अंदाजा लगाकर पत्थरों के आने वाले स्थान की ओर ऊपर बन्दूक की नाल करके फायर किया। इससे पहले सबलसिंह पत्थर फेंककर नीचे झुके। वह निशानेबाज डाकू रहा होगा। गोली सबल सिंह के कंधे के ऊपरी हिस्से को चीरती हुई शरीर के बाहर निकल गई। खून का फब्बारा निकल पड़ा। सबलसिंह ने अपनी तौलिया कंधे पर बांध ली। वे अपने देश की सीमा पर अपनी मातृ भूमि की रक्षा के लिए शत्रु से लड़ रहे सैनिक की भूमिका में थे।और उनके पास केवल पत्थर थे बन्दूक भी नहीं थी। वे लुढ़कते और सरकते हुए मन्दिर के पिछवाड़े में बनेें चन्दन महाराज के घर में कराहते हुए उतर आये।पंडिताइन जाग तो रहीं थीं, पर अचानक सबल सिंह को खून में लथपथ देखकर चीख पड़ीं। सबलसिंह ने कराहते हुए पंडिताइन को पूरी कहानी सुना डाली और जल्दी से खून से सना कपड़ा निकालकर दूसरा कपड़ा कसकर बाँधने को कहां। पंडित जी डरपोक थे, उन्होंने अपनी धोती गीली कर ली और सबलसिंह से थोड़ी दूरी बनाकर बैठ गए।उनके दांत किटकिटा रहे थे और वे बुरी तरह काँप रहे थे। पर मर्दानी पंडिताइन ने जल्दी में अपनी नई साड़ी फाड़ी और सबलसिंह का खून से सना बंध खोल दिया। सबल सिंह के कंधे से फिर खून का हल्का फब्बारा फूट पड़ा उन्होंने आँखे बंद करके दांत भींच लिए। पंडिताइन ने उकडू बैठकर सबलसिंह के हाथ को अपने घुटने पर रखा और कंधे और काँख के बीच फ़टी हुई साड़ी के कपड़े को कई बार ऊपर नीचे घुमाकर कसकर बांध दिया।खून का बहरी रिसाब फिर बन्द हो गया और सबलसिंह को थोड़ी राहत मिली।ढिबरी के उजाले में पंडिताइन की ओर कृतज्ञता से देखते हुए सबलसिंह की आँखें सजल हो उठीं। पंडिताइन ने सबलसिंह को दरी पर लिटाकर गुड़ की गर्म चाय बनाकर पिला दी। फिर घायल सबलसिंह तन्द्रा में ऑंखें बन्द करके बेहोशी जैसी हालत में धीरे- धीरे होंठ हिलाकर कुछ बुदबुदाते रहे। पिताजी और दादा जी घाटी के नीचे बाड़े वाले मकान में सो रहे थें। दादा जी नीचे की पौर में और पिताजी दूसरी मंजिल की अटारी में किवाड़ खोलकर सो रहे थे। छै सात हल की जमीन के लिए चौदह तगड़े बैल थे।गाएं भैंसें अलग।उन्हें भूसे की सानी और घर के मौसमी हरे चारे के अलावा गर्मियों के लिए सूखे चारे की ज़रूरत पड़ती थी। इसके लिए ईसागढ़ -चन्देरी के जंगलों से कई बैलगाड़ियों में भरकर हर साल की तरह इस साल के लिए आज शाम को ही सूखा घास लाया गया। जंगल में घास उपलब्ध भी रहता था और सस्ता भी पड़ता था। इसलिए अन्य किसानों की तरह ही हमारा परिवार भी वहां से घास लाकर अपने खेरे में उसके ऊँचे-ऊँचे गंज लगाकर अपने पशुधन और ख़ासकर बैलों के चारे का साल भर का इंतज़ाम कर लेता था। तो जंगल से अपने भाइयों और हरवाहों के साथ घास लेकर हारे थके पिताजी नींद में खर्राटे भर रहे थे। डाकुओं को पिताजी की खास टारगेट के तौर पर तलाश थी। पिताजी हायर सेकेंड्री पास होकर पटवारी का प्रशिक्षण ले चुके थे और फॉरेस्ट डिपार्टमेन्ट में वन आरक्षक के रूप में एम पी- यू पी बॉर्डर पर राजघाट के पास तैनात रह चुके थे। पर बड़े ताऊ जी ने घर की देखभाल के लिए उनका सरकारी सर्विस से स्तीफा दिलवाकर उन्हें गाँव बुलवा लिया था। तबसे अपने भाइयों के साथ पिताजी ने खेतीबाड़ी में जीतोड़ मेंहनत की और कृषि उपज से जो भी आय होती उससे वे गाँव की टगर में कोई खेत खरीद लेते। दादा जी गुना जिले की आरोन तहसील के मोहरी गांव से बचपन में ही अपनी बुआ के पास आकर गनिहारी में बस गए थे। दूसरे गांव के परिवार की गाँव में तरक्की गाँव के भुमिया जमींदारों को पच नहीं पा रही थी। पिताजी पूरे घर में एकमात्र पढ़े लिखे और घर के संचालक थे। इसलिए व्यूह रचना में वे ही डाकुओं के टारगेट पर थे। डाकू पिताजी को ही तलाश रहे थे।चूंकि पिताजी अपने पास बारह बोर की बन्दूक सुरक्षा के उद्देश्य से रखते थे, यह बात डाकुओं को पता थी और इसी वज़ह से वे अतिरिक्त सावधानी बरत रहे थे। डाकू घर के पिछवाड़े से घर में दाखिल हुए जहां से उन्होंने देख लिया कि पिताजी जिस दूसरी मंजिल की अटारी में सो रहे हैं उसका दरवाजा आधी रात को भी खुला पड़ा है। फिर दीवार के सहारे धीरे-धीरे गिरोह का एक सदस्य दरवाजे से झांककर अंदर के दृश्य को देखकर नीचे उतरा और उसने सूचना गिरोह के सरदार को दी। खुले किवाड़ और सोते हुए पिताजी ने जैसे डाकुओं की मनोकामना पूरी कर दी । सबसे पहले एक डाकू दबे पांव अटारी में दाखिल हुआ और खूँटी पर टंगी बारह नंबर बन्दूक को उतारकर बाहर भागा। अब आत्मविश्वास से भरे दो डाकू अटारी में गए और पलँग पर गहरी नींद में सो रहे पिताजी को धक्का दिया।नींद टूटते ही पिताजी भौंचक्के रह गए और खड़े होकर खूँटी से बन्दूक उठाने के लिए दौड़े। पर वहां कुछ नहीं था।दोनों डाकुओं ने पिताजी को पकड़ लिया। पिताजी उस वक़्त जवान और तंदुरुस्त थे। सधा हुआ लम्बा शरीर चेहरे पर बड़ी-बड़ी मूंछें पिताजी की पहचान हुआ करती थी।पिताजी ने दोनों भुजाओं को फैलाकर झटका दिया और डाकू नीचे फर्श पर गिर पड़े ।उन्होंने आवाज़ लगाकर बाकी साथियों को सूचना दी - " साथी ! आदमी तगड़ौ है। कछू और जने आओ।" दो डाकू और आये और उन्होंने पिताजी के साथ झूमा झटकी की तब भी पिताजी अकेले ही संघर्ष करते रहे थे। नीचे की तलाशी ले रहे कई और डाकू आये और पिताजी से मार पीट करने की धमकी देते हुए बोले -"बता माल कां है नईं तौ भौत मारेंगे।" धक्का मुक्की सहते हुए पिताजी उन्हें नीचे ले आये। माल होता तो वे बताते। पर डाकुओं को चकमा देते हुए उन्होंने कहा -"जा विंडा में है।"उन्होंने कमरे का दरवाज़ा खोला और डाकुओं से कहा - "माल नींचै है चना हटाओ।" कमरा चने से भरा था। थोड़ा बहुत चना डलिया से हटाकर उन्होंने फिर पूछा-", बता माल कां है?" पिताजी ने कहा -", मंजोटे में है।" एक डाकू बोला -" जौ तो पागल बना रउ है रे। मंजोटे खों हेरबे में तो भुंसारौ हो जायेगो।" पिताजी ने डाकूओं से कहा -" ऊपर के घर में है माल।" डाकू पिताजी को चारों ओर से घेरकर उनके इशारे पर घाटी चढ़कर मन्दिर की ओर से गुजरते हुए घर की ओर बढ़ने लगे। तभी हिम्मत सिंह ने अपने घर के भीतर की खिड़की से अपनी टोपीदार बन्दूक से डाकुओं पर फायर किया तो वह फुस्स होकर रह गई। बन्दूक न चलने पर हिम्मत सिंह एक पड़ोसी को लेकर पिछले दरवाजे से डाकुओं को गांव से भगाने हेतु पुकार लेने के लिए पड़ोसी गाँव कन्हैरा के लिए रवाना हो गया। इधर पिताजी डाकुओं को लेकर उस घर में आ गए जहां पूरा परिवार रहता था और जिसमें से डाकुओं के आने से पहले ही सभी परिजन भाग गए थे। पिताजी के कहने पर डाकू इधर उधर तलाशी में जुट गए। पर कुछ हो तब मिलता न। पिताजी भी किसी तरह डाकूओं को उलझाये थे। कुछ भी न मिलने पर तैश में आकर सरदारनुमा डाकू ने कहा-" वैसे वी जा हरी सिंह खों मारनेंई है।जौ इत्ते जनिने पागल बना रउ है। गोली मार दो जामें।" खुद पर आसन्न संकट को भांपकर पिताजी ने आख़िरी दाव चला। वे जोर से बोले-"चलौ नींचे के घर में भौत माल है, मैं बतांगौ तुमे।" पिताजी डाकुओं के इरादे और साजिश को भांप गए। उनकी आँखों के सामने फिल्म की भांति विगत की रील घूमने लगी।परिजनों के चेहरे उनकी आँखों के जल में तैर रहे थे।पिटते और गाली खाते हुए वे विवश और बंधक थे। बन्दूकधारी डाकू उनको चारों ओर से घेरा डालकर चल रहे थे। दो डाकू दोनों ओर से उनके हाथ पकड़कर भी चल रहे थे। पिताजी ने अपने आपको बिल्कुल ढीला छोड़ दिया था और रोबोट की तरह यंत्रवत चले जा रहे थे। जैसे उनका रिमोट डाकुओं के हाथों में हो और वे ही उन्हें अपनी क्रूरता के हाथों संचालित कर रहे हों।वे मन्दिर और नीम के आगे से होते हुए घाटी से घर की ओर नीचे उतरने लगे। घर वहां से कुछ ही कदम पर था। सर्वाधिक संकट ही मुक्ति की प्रेरणा देता है। प्राणों पर आसन्न संकट का ज्ञान होने पर पिताजी ने अपनी समूची शक्ति को एकत्र कर पूरी ताक़त से झटका देकर दौड़ लगा दी। "पकरौ-पकरौ" कहकर कई डाकू उनके पीछे दौड़े। फायर किया जो इधर -उधर हो गया। पिताजी पूरी ताकत से दौड़ते चले गए। पीछे मुड़कर देखने का अवसर नहीं था। दूर तक दौड़कर एक पड़ती खेत में जिसमें सूखे घास के कई गंज लगे थे, उनमें से ही सूखे घास के एक गंज में घुस गए। उन्हें आसपास ही ढूंढ रहे डाकुओं की आवाज़ें उनके कानों में आती रहीं। पर पिताजी साँस रोके मूर्तिवत गंज के भीतर बैठे रहे। संयोग की ही बात थी कि जिस सूखे घास के कारण वे संकट में पड़े थे उसी सूखे घास ने उन्हें आश्रय देकर रक्षा की। डाकू उन्हें ढूंढने में असफल होकर लौट गए। तब तक वह काली रात प्रभात बेला में प्रवेश कर चुकी थी।पड़ोसी गॉव कन्हैरा से पुकार आ गई थी।पुकार में दो बन्दूकधारी ग्रामीण फायर करते हुए और दो लोग आगे-आगे ढपला और रमसींगा बजाते हुए चल रहे थे।उनके पीछे सैकड़ों ग्रामीण लाठी , फरसा , बल्लम और लुहांगी से लैस होकर उत्साह के साथ मशालों की रौशनी में चले आ रहे थे। पुकार को आता देख डाकू गनिहारी गॉंव से भाग खड़े हुए। डाकुओं के जाने पर लोग अपने- अपने गायब परिजनों को खोज रहे थे। धन से ज्यादा जन कीमती होता है। जो धन गया उसकी परवाह न करते हुए लोग अपने परिजनों के सुरक्षित होने के कारण राहत की साँस ले रहे थे। सबल सिंह को इलाज के लिए नज़दीकी शहर अशोकनगर भेज दिया गया था।कोटवार नईसराय थाने में गाँव में डाका पड़ने की रिपोर्ट दर्ज़ कराने रवाना हो चुका था। केवल पिताजी नहीं मिल रहे थे। हमारे घर लोगों का हुजूम इकठ्ठा हो गया। घर में हाय तौबा मच गई । लोग गांव के चारों ओर उन्हें तलाश रहे थे। दिन निकलते ही पिताजी गंज में से निकल कर घर आये। तब सबने राहत की साँस ली। दिन के उजाले में गनिहारी गाँव आक्रांताओं द्वारा किसी लुटी हुई राजधानी की तरह लग रहा था। लोगों की आँखों में भय और विस्मय एक साथ तैर रहे थे। साधनहीन और अभावग्रस्त गाँव अपनी असुरक्षा का रोना रो रहा था। पर सूरज अपनी उसी तपिश और गति के साथ आसमान में आ गई छुट पुट घटाओं को पार करते हुए अपेक्षाकृत चमकीला होकर निरन्तर आगे बढ़ता जा रहा था। 

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