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मिस्र के श्रापित मकबरे
मिस्र के श्रापित मकबरे
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© Ourooj Safi

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अपने सुनहरे और रहस्यमय अतीत की वजह से आज भी मैं लोगों के कौतूहल का विषय हूँ, ढेरों राज़ मेरी इस मिट्टी में दफ़न है। हजारों साल का मेरा इतिहास है भी बड़ा रोचक।

मैं मिस्र हूँ,नील नदी के किनारे और दूर तक फैले सहराओं के बीच मेरा अस्तित्व है। न जाने कितनी सभ्यताओ को मैंने पनपते और खत्म होते देखा है। जिन्होंने मुझ पर राज्य किया उनको फैरोह कहा जाता है। इन फरोह ने रहस्य की दुनिया में खुद को अमर कर लिया। वादिए मुल्क ( valley of kings) के मकबरों (pyramids) में सोते हुए इन फरोह का जीवन सत्ता, सार और साज़िशों से भरा हुआ था। यह मकबरे इस उम्मीद में बने थे कि उनको मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास था। वह सत्ता की ताकत पर हमेशा अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते थे और इस के लिए उन्होंने पता नहीं कितने मजलूमों को मौत के घाट उतार दिया। फराओ को रूहानी ताक़तो पर बहुत भरोसा था इसी वजह से इनके दरबार में तांत्रिक और ज्ञानी जादूगरों का खास स्थान था।

वह सितारों की चाल देख कर ही किसी काम की शुरुआत करते थे और जो काम मुश्किल होते उनमें तंत्र मंत्र या मृत्यु आत्माओ का सहारा लेते। वादिए मुल्क में खड़े हुए ये खामोश मकबरे इतनी सदियाँ बीतने के बाद भी मुझे डराते है कयोंकि इन में से कुछ मकबरे श्रापित हैं और इन के श्राप का असर ता-क़यामत रहेगा। इन मकबरों कि रक्षा अभिमंत्रित मंत्र और मृत्यु आत्माएँ करती हैं लेकिन श्रापित मकबरे में सबसे रहस्यमयी कहानी फैरो तूतनखामन और रानी नेफरतिति की है।फैरो तूतनखामन जिसके बारे में दुनिया 80-90 साल पहले तक अंजान थी वो ईसा से 1300 वर्ष पूर्व मुझ पर राज करता था ...उसके पिता राजा अखनातन थे ....अखनातन का किस्सा भी बहुत दिलचस्प है, उसका नाम धार्मिक क्रांति चलाने की वजह से इतिहास से लगभग मिटा दिया गया था।

उसने सूर्य देवता कि उपासना के अलावा तमाम देवताओं की उपासना पर प्रतिबंध लगा दिया था। उसकी शादी बेहद खूबसूरत नेफरतिति से हुई थी। नेफरतिति के हुस्न का कोई सानी न था, उसका एक एक अंग जैसे साँचे में ढला था और देखने वालों को कुछ देर के लिए ठिठकने पर मजबूर कर देता था। अखनातन पर उसका असर बहुत ज्यादा था, वो उसे हमेशा अपने साथ रखता था और राज काज में भी उसकी सहायता लेता था। नेफरतिति काफ़ी महत्वकांक्षी थी, उसे राजनीति और सत्ता में बहुत दिलचस्पी थी।अखनातन ने एक दो ब्याह और किए थे मगर महारानी का दर्जा नेफरतिति को मिला था। तमाम सुख नेफरतिति के कदमों में थे पर एक दुखद पहलू उसके साथ जुड़ा था कि उसने राजा को कोई बेटा नहीं दिया था। लड़के की चाहत में उसे छह बेटियां हुई। वो राजा को कोई वारिस न दे सकी इस बात का उसे बेहद अफसोस था। जब नेफरतिति से बेटा नहीं हुआ तो मजबूरन राजा अखनातन को दूसरी रानियों के पास जाना पड़ा और नेफरतिति का अफ़सोस जलन और क्रोध में बदल गया। राजा को अपना वारिस तूतनखामन के रूप में मिला।

तूतनखामन की माँ किया राजा की बहन थी, उस समय सगे रिश्तों में शादी होना बहुत आम था। वारिस देने की वजह से अखनातन इस रानी को भी काफी तवज्जो देने लगा था और ये बात नेफरतिति के लिए बर्दाश्त के बाहर थी लेकिन राजा को खोने के डर से वो अपने जज़्बात को काबू में रखती थी, कभी भी अपनी नफरतें खुल कर ज़ाहिर नहीं करती थी। वक़्त गुज़रता गया और एक दिन अचानक राजा अखनातन की मृत्यु हो गई। तूतनखामन उस समय बहुत छोटा था और राज करने के लायक नहीं था। वक़्त की नज़ाकत देखते हुए नेफरतिति ने राज्य की कमान अपने हाथों में ले ली और मुझ पर हुकूमत करने लगी। वो एक महत्वकांक्षी और दूरअंदेश औरत थी, उसने बहुत जल्द अपना दबदबा कायम कर लिया।

कहने को तो वो राज कर रही थी मगर इस हकीकत से वो अंजान न थी कि यह मुकाम बस कुछ ही दिन का है इधर तूतनखामन समझदार हुआ नहीं कि उसके हाथ से तख़्त फिसला नहीं। अब हर दम तूतनखामन उसकी आँखों में कांटें की तरह चुभने लगा मगर चूंकि वो एक शातिर औरत थी तो उसने किसी को भी अपनी नफरतों का अहसास नहीं होने दिया।

इसके उलट अब वो तूतनखामन को खुद से करीब रखती,उस पर अपना प्यार लुटाती और जब उसने सब को यकीन दिला दिया कि वह तूतनखामन की सच्ची हमदर्द है तब वह अपना खतरनाक मंसूबा अमल में लाई। उसने मिस्र के सबसे बड़े तांत्रिक को तलब किया, वो चाहती थी कि तूतनखामन में कुछ ऐसा ऐब पैदा हो जाए कि वो तख़्त पर बैठने के लायक ही न रह जाए। तांत्रिक की मदद से उसने तूतनखामन पर असर कराना शुरू कर दिया। इसी वजह से उसने तूतनखामन को खुद से इतना नज़दीक किया था कि वह आसानी से उस पर जादू करा सके। सहर इतना खतरनाक था कि तूतनखामन बुरी तरीके से इसकी चपेट में आ गया। उसके बदन की हड्डियां टेढ़ी हो गई, पीठ में कूबड निकल आया, वो बिना लाठी के चल नहीं पाता था, और तीर कमान चलाने में अक्षम होता जा रहा था। उसको हड्डियों में इतना दर्द होता कि वह रातभर चीख़ता था। अपने बेटे में आये इस बदलाव से तूतनखामन की माँ को शक हो गया आखिर थी तो वो भी फरोह की बेटी और तंत्र मंत्र का ज्ञान उसे भी था। उसने अपने बेटे को बचाने के लिये उसे महल से दूर कर दिया। अब तूतनखामन महारानी की पहुंच से दूर था और उसके काले जादू से बेअसर था।अपना वार खाली जाता देख नेफरतिति किलस कर रह गई थी।

दो तीन साल निकलने के बाद जब तूतनखामन दस साल का हुआ तब उसकी माँ ने दरबारियों की सहायता से उसे तख़्त पर बैठाया और नेफरतिति को काबू में रखने के लिए उसकी छोटी बेटी से तूतनखामन की शादी करा दी। कहते हैं कि डायन भी सात घर छोड़ कर वार करती है मगर नेफरतिति एक ऐसी ज़हरीली डायन थी जो पोर पोल लालसा में डूबी थी और उसने अपने घर को भी न छोड़ा था। तूतनखामन को उसकी माँ ताबीज़ो में और मंत्रो की रक्षा में रखती थी इस वजह से नेफरतिति कुछ कर नहीं पा रही थी लेकिन वह हर वक़्त मौके की तलाश में रहती और उसे मौका मिल भी गया। तूतनखामन की बीवी और नेफरतिति की बेटी माँ बनने वाली थी। राजा का पहला बच्चा था, सभी बहुत खुश थे और रानी किया भी अब इत्मीनान से थी कि नेफरतिति अपनी बेटी का घर क्यो खराब करेगी मगर वो गलत थी। नेफरतिति तूतनखामन को तो बर्दाश्त कर नहीं पा रही थी उसका वारिस कैसे बर्दाश्त करती, उसने अपनी बेटी को जाने कौन सी दवा खिलाई की उसकी जचगी छठे महीने ही हो गई।

छठे महीने का बच्चा कितनी देर ज़िन्दा रहता फौरन ही मर गया। नाती की मौत से उसे बहुत सुकून मिला। जल्दी ही तूतनखामन को दूसरा बच्चा होने को हुआ इस बार किया बहुत सावधान थी उसने महारानी को अपनी बहू के नज़दीक न आने दिया और सही वक़्त आने पर वो एक खूबसूरत पोती की दादी बन गई। मगर यह ख़ुशी थोड़ी सी देर के लिए थी, बच्ची का साल पूरा होते ही वो काल के गाल में समा गई। इस किस्से के बाद रानी किया ने सीधे सीधे नेफरतिति को चेतावनी दे दी कि अगर उसके बेटे को कुछ हुआ तो उसका अंजाम बहुत बुरा होगा लेकिन नेफरतिति को सत्ता के आगे कुछ दिखाई नहीं देता था, वो कुछ भी कर के तख़्त वापस अपने पास चाहती थी। तूतनखामन की माँ तंत्र विद्या में माहिर थी उसने अपने बेटे को अपनी निगरानी में ले लिया था इसी वजह से काली शक्तियों का ज़ोर चल नहीं पा रहा था। हालांकि राजा तूतनखामन को काफ़ी बचा कर रखा जा रहा था मगर पहले से किए हुए जादू का असर उसमें अभी भी था, हड्डियों की बीमारी की वजह से उसका कद छोटा रह गया था और उसकी हड्डियां इतनी कमज़ोर थी कि अगर उसे कोई कस कर मार देता तो वह बुरी तरह से टूट जाती।महारानी नेफरतिति ने अब आर या पार की ठान ली थी।

जब जादू टोने से बात न बनी तो उसने उसे दूसरे तरीके से ठिकाने लगाने की सोची। उसके शातिर दिमाग ने फिर से षडयंत्र रचा। कयोंकि नेफरतिति ने कभी भी खुल कर अपनी भावनाएं ज़ाहिर नहीं की थी इसलिए राजा और उसकी पत्नी अभी भी महारानी को इज्ज़त देते थे, इस भरोसे का उसने फायदा उठाया। राजा तूतनखामन अपनी जिस्मानी तकलीफ़ों से परेशान रहता था, वह इसका कोई स्थाई ईलाज चाहता था। नेफरतिति ने राजा को यकीन दिलाया कि वह उसे ठीक करा सकती है। उसके पास ऐसा इलाज है जिससे न सिर्फ़ राजा का लंगड़ापन सही हो जाएगा बल्कि उसकी पीठ का उभार भी खत्म हो जाएगा और वो सीधा खड़ा हो सकेगा। राजा महारानी की बातों में आ गया और इलाज के लिए तैयार हो गया।

अब नेफरतिति रोज उसे कुनैन की छाल का अर्क पिलाती। कुनैन वैसे तो हड्डी के लिए अच्छी दवा होती है लेकिन अगर इसे ज़्यादा मात्रा में दे तो ये जानलेवा होती है। उसने बहुत सोच कर ये षडयंत्र रचा था कि कोई भी उस पर उंगली न उठा सके। अर्क पीने के 7-8 दिन के अंदर ही तूतनखामन की हालत खराब हो गई, उसको शीत ज्वर रहने लगा, उसके पैर की हड्डी अपने आप टूट गई और वो होशोहवास से बेगाना होता गया। बेहोशी की हालत में ही उसकी मौत हो गई। अपने अठ्ठारह साल के जवान बेटे की मौत से रानी किया गुस्से से पागल हो गई थी।

तूतनखामन के बाद दूसरा कोई वारिस न था जो तख़्तनशीन होता महारानी नेफरतिति इसी उम्मीद में थी कि सब उसे ही अब तख़्त पर बैठा देंगे लेकिन उसके अरमानों पर ओस पड़ गई जब रानी किया ने उसकी असलियत दरबारियों और प्रजा को बता दी। नेफरतिति ने अपने बचाव के हर हरबे आज़माए मगर किसी ने उसकी न सुनी, उसे अपनी जान के लाले पड़ गए थे। उधर तूतनखामन की माँ चाहती थी कि मौत के बाद तूतनखामन सुकून से रहे, उसे मौत के बाद कि जिन्दगी में कोई परेशान न करे इसलिए उसने तूतनखामन के शरीर का ममीकरण करा कर वादिए मुल्क के ऐसे मकबरे में दफन किया जहां पहुंचना बहुत मुश्किल था और जो लोगों की नज़रों से हमेशा ओझल रहता। उस मकबरे में उसने तूतनखामन का सारा सोना, उसकी नन्ही बच्चियों के शव और उसके इस्तेमाल की सभी चीजें रखी। इसके बाद उसने मृतको की किताब (book of deads) से बहुत से मंत्र दीवारों पर लिखवाए, ताकि इन मंत्रों की ऊर्जा से तूतनखामन को मौत के सफर और उसके बाद के जीवन में कोई परेशानी नहीं हो,उन्हीं मंत्रों का शक्तिशाली ताबीज़ अपने बेटे को पहनाया जिससे कोई भी ताकत उसका नुकसान न करे।उसने एक ठोस सोने का मुखौटा जो हूबहू तूतनखामन की शक्ल का था उसकी ममी के चेहरे पर रख दिया, उस मुखौटे पर गिद्ध और कोबरा नाग बने थे जो ममी के रक्षक थे। रानी ने अपनी तांत्रिक शक्तियों के बल पर उस मकबरे की रक्षा के लिए रूहानी ताकतों का आह्वान किया और उनसे इल्तिजा की वह इस मकबरे के पहरेदार बने अगर कोई भी उसके बेटे को ज़रा सा भी परेशान करे तो उसकी मृत्यु अटल हो जाए।

अगरचे उसने मकबरा बहुत गुप्त बनवाया था मगर फिर भी लोगों को मकबरे से दूर रखने के लिए उसने मकबरे के पास सात कब्रें बनवाई और यह चेतावनी लिखवाई कि मकबरे में जाने वाले पहले सात लोग इसके श्राप की चपेट में आ जाएँगे और आत्माएँ उनका सर्वनाश कर देंगी। इस सबके बाद उसने अपनी दृष्टि नेफरतिति की तरफ डाली, नेफरतिति की असलियत जाहिर हो चुकी थी दरबारी और प्रजा दोनों उसको मार देना चाहते थे,लेकिन वो ज़मीनदरोश हो चुकी थी। जब वो उन लोगों के हाथ न लगी तो उन्होंने ने उसके स्मारक और मूर्ति नष्ट करके ही संतोष प्राप्त किया। उसका नाम और हर निशानी इतिहास से

मिटा दिया। मगर रानी किया का दुख इससे कम न हुआ। उसने नेफरतिति के पीछे रूहानी शक्तियों को लगा दिया। उसके बाद नेफरतिति का क्या हुआ ये मेरे अलावा दुनिया में किसी को नहीं मालूम।

आज भी दुनिया महारानी नेफरतिति के बारे में जानने के लिए काफ़ी उत्सुक रहती है। एक फरौ महारानी होने की वजह से उसको भी मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास था इसी कारण उसने अपना मकबरा भी बनाया था मगर वो इन सहराओं में कहाँ दफन है ये रहस्य कभी कोई नहीं जान पाएगा।तूतनखामन अपने वंश का आखिरी राजा था, उसके बाद फरोह का वंश नेस्तनाबूत हो गया। इस किस्से के बाद तूतनखामन तीन हज़ार साल तक सुकून की नींद सोता रहा, दुनिया उसके बारे में भूल चुकी थी, उसके मकबरे को ढूंढने की बहुत कोशिश की गई मगर उस तक कोई पहुंच नहीं पाया था कि उन्नीसवीं शताब्दी में एक दिन इत्तेफाक से एक मज़दूर जो अंग्रेज़ पुरातत्व वैज्ञानिक लार्ड कारनावन और हावर्ड काटर के लिये खुदाई कर रहा था, उसे ईटों की कुछ सीढियां नीचे जाती दिखाई दी। दोनों वैज्ञानिक नीचे सील बंद दरवाज़े को देख कर हैरान हो गए, उन्हें फौरन ही अहसास हो गया कि उन्होंने सदियों से गुम मकबरे को खोज लिया है, लेकिन प्रचलित श्राप की कहानियों के कारण कोई भी मज़दूर दरवाज़े की सील तोड़ने को तैयार नहीं था।

लार्ड कारनावन उनकी जाहिलियत पर हँसता हुआ खुद ही सील तोड़ने लगा उसका साथ देने को चार-पांच अंग्रेज़ और साथ आ गए। यहाँ देखने वाली बात यह थी कि दूसरा वैज्ञानिक कार्टर दरवाज़ा खुलवाने में बिल्कुल मदद नहीं कर रहा था न ही वो अंदर जाने को बेचैन था उसे कहीं न कहीं श्राप वाली बात पर विश्वास था। खैर दरवाज़ा खुल गया और अंदर का वैभव देख कर सबकी आँखें फटी रह गईं यहाँ तक के उन्होंने दीवारों पर लिखी हुई चेतावनी भी नज़रअंदाज़ कर दी, बल्कि कारनावन तो खुले आम इन चेतावनी का मज़ाक उड़ाने लगा। इन लोगों ने मकबरा क्या खोला अपनी बदकिस्मती को दावत दे दीथी। मकबरा खुलने से एक हफ्ते पहले कार्टर एक कैनरी चिड़िया का जोड़ा लाया था, ताकि उसके घर में चिड़िया की मीठी आवाज़ गूंजे, इन चिड़ियो को काफ़ी खुशकिस्मत मानते हैं। चिड़ियों को देखते ही उसके नौकर ने कहा था कि इन चिड़ियों के साथ भाग्य आता है और बहुत जल्द कार्टर को सोने से भरा हुआ मकबरा मिलेगा। उसकी बात सच साबित हुई मगर जिस दिन मकबरा खुला उसकी शाम को नौकर को मनुष्य रूदन की आवाज़ आई जब उसने बाहर देखा तो हैरान हो गया। चिड़िया के जोड़े को एक बड़ा सा कोबरा निगल रहा था, उस दिन बहुत से लोगों ने कोबरा देखने की बात कही थी, जबकि आमतौर पर यहाँ कोबरा साँप की प्रजाति नहीं मिलती। कोबरा का दिखनामकबरे के श्राप का एक इशारा भर था कयोंकि कोबरे का चिन्ह तूतनखामन के स्वर्ण मुकुट पर था जो ममी के रक्षण के लिए था।

फिर उसके बाद शुरू हुआ रहस्यमयी मौतों का सिलसिला।

एक एक कर के पुरातत्व टीम के सदस्य पुरअसरार मौत मरने लगे। सबसे पहला शिकार लार्ड कारनावन ही बना मकबरे खुलने के कुछ दिन के अंदर ही उसे मच्छर काटने की वजह से खून का संक्रमण हो गया और वो मर गया। तीन और सदस्यों को अजीब बीमारी हो गई और वो भी दो महीने में मर गए। कुछ ने आत्महत्या कर ली, एक ने तो उस इमारत से कूद कर जान दे दी जिसमें तूतनखामन का खज़ाना रखा था और साथ में एक खत भी छोड़ा कि अब वो ये डर बर्दाश्त नहीं कर पा रहा इसलिए दुनिया छोड़ कर जा रहा है। काटर का निजी सचिव अपने बिस्तर में मरा हुआ मिला।

इस मिशन में शामिल लार्ड कारनावन के रिश्ते के दो भाई भी संदिग्ध परिस्थितियों में मरे मिले। ममी का एक्स रे करने वाले रेडियोलोजिस्ट सर डगलस को किसी रहस्यमय बीमारी ने मार दिया। इतनी सारी मौते इस बात का सुबूत थी कि यह मकबरा श्रापित है। इन सब में सबसे आखिर में मरने वाला काटर था, जो श्राप में यक़ीन करता था और अपने बचाव के लिए उसने पादरी का सहारा लिया था,मगर ज्यादा समय वो भी न जी पाया। इतना सर्वनाश देख कर ये फैसला लिया गया कि तूतनखामन की ममी को लपेट कर वापस उसके मकबरे में रख दिया जाए। तूतनखामन तो एक मासूम कम उम्र राजा था और उसको बचाने के लिये उसकी माँ ने मकबरे को श्रापित किया था। मैं यह सोच कर कांप जाता हूँ कि अगर कहीं दुर्भाग्य से किसी को नेफरतिति का मकबरा मिल गया तो क्या कयामत आएगी। वो तो एक जहरीली डायन थी, उसका राज़ छुपा रहे यही सबसे हित में है और मैं सदियों से उसका राज़ अपने सीने में छुपाने के लिए ख़ुद को दाद देता हूँ।

खून शिकार सदस्य

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