अक्षरा और उसका परिवार
अक्षरा और उसका परिवार
एक शहर में एक अच्छे नाम की लड़की रहती थी। वह अपने मां के साथ सुंदरपुर रहती थी। सुंदरपुर एक नाम ही नहीं वह सच में सुंदर था। वहां के लोग भी सुंदर ही थे। अक्षरा और उसकी मां जिस किराए में रहती थी। उसकी राय के अगल-बगल रहने वाले अक्षरा की मां को रोज रोज बोलते थे कि अपनी बेटी को क्यों नहीं शादी करवा देती हो। पढ़ अक्षरा की मां को यह बात सुनने में नहीं अच्छा लगता था। इसलिए अक्षरा की मां अक्षरा की शादी करवा दी और अक्षरा की मां और अक्षरा के पत्ती और छे से रहने लगे। फिर अक्षरा की मां किराए के अगल-बगल उसको बोलने गई कि आप तो आप खुश हो ना क्योंकि मेरी बेटी की शादी हो गई है।
फिर अगर बगल वाले बोले,"हां हम लोग को बहुत अच्छा लगा कि तुम्हारी बेटी की शादी हो गई। 6 महीने बीत गए। फिर अगल-बगल अक्षरा की मां को आकर बोली 6 महीना हो गया पर अभी तक अक्षरा की बच्ची नहीं हुई। अक्षरा यह बात सुनकर बहुत दुखी हुई और रोने लगी। फिर अपने पति से कहने लगी कि,"जी यह सब मैं क्या सुन रही हूं मुझे बहुत दुख हो रहा है फिर अक्षरा के पत्ती गुस्सा से बोले,"तो फिर मैं इसमें क्या करूं जाओ अपनी मां को बोलो। अक्षरा रोते-रोते एक जंगल में चली गई और एक पीपल के पेड़ के पास जाकर बैठ गई और रोने लगी। फिर उसका पति बहुत पछताया और वह अपनी पत्नी को डांटा तो दौड़ी दौड़ी जंगल में पहुंची अक्षरा को घर लेकर आया और माफी मांगी फिर 2 महीने बाद अक्षरा को दो बेटा बेटी हुई और अच्छे से वह दोनों रहने लगे और अक्षरा की मां को अब कोई की ताने नहीं सुनी पढती थी।
