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और हवा खामोश हो गई
और हवा खामोश हो गई
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© Uma Uma

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रात गहराती जा रही है, मैं बहती जा रही हूं। थम नहीं सकती, कोई सराय मेरे लिए नहीं बनी। मेरे लिए है तो चारों ओर पसरे मंज़र। अब वो चाहे जैसे भी हों, उनसे आंखें नहीं फेर सकती मैं। अपने साथ लाई कुछ भली-बुरी गंध राह में फैलाती जाती हूं तो वहां पसरे सन्नाटे और शोर के टुकड़ों को समेट ले जाती हूँ। कुछ पुरानी चीजें फिर भी पीछा नहीं छोड़तीं। खुरचन की तरह चिपक जाती हैं, इन्हें उतारें तो भी निशान रह ही जाते हैं। इनसे पीछा छुड़ाने के लिए कुछ ऐसा ही करती हूं मैं, जैसा आप पीतल की कढ़ाही के साथ करते हैं, कलई करवाते हैं या जैसे दीवारों के साथ करते हैं। नए रंग धुंधलाई को छुपा देते हैं। मैं भी नई गंधों का आवरण लपेट लेती हूं। इतनी गहराई तक उतरती हूं, जहां तक कोई पहुंच ही नहीं पाता, अलबत्ता पहुंचा भी तो वापसी नहीं होती...मेरी होती है। जिस्म की अंधी गलियों में उतरती हूँ। भीतर का ज़हर मुझ पर असर नहीं करता। मैं ज़िन्दा रहती हूं। गाती हूं मैं शोर का गीत, शोक का गीत, उल्लास का गीत, हताशा का गीत। बेशुमार आवाज़ों की पनाहगाह हूं मैं। हवा हूं मैं।

पानी के भीतर भी बहती हूं। इसी पानी में मैंने हीर को भी देखा था। उसके घड़े में समाई थी मैं। एक तिलिस्म रचा था मैंने। हीर के दिल में उतरी और समेट लाई उसके भीतर की तमाम खुशबू और उतार दी रांझे के जिस्म में, पर रुकी नहीं मैं, चलती रही। बंजारा पन मुझमें है या मैं बंजारे पन में, कहना मुश्किल है ज़रा। और यूं कहते-कहते, यूं बहते-बहते, एक दिन तड़प उठी मैं। मुझे रहम चाहिए था, नहीं मिला, उन्हें भी चाहिए था, नहीं मिला। एक कतरा भी नहीं। उनकी बेचारगी मेरी बेचारगी से आ मिली, मैं स्त्री बन गई। मैं उन स्त्रियों की तरह ही कांप रही थी, जो बंटवारे की भेंट चढ़ीं। ज़्यादतियों की गवाह थी मैं, मगर ठहर नहीं सकती थी। मेरी चाल चीखों में बदल गई। साल पीछे छूट-से गए, बहुत-सी चीखों का बोझ उतारा, लेकिन जो पोरों में बस गई थीं उनका क्या? धर्म बहाना बना था उन दिनों रंग-बिरंगी चुनरों को तार-तार कर देने का। अज़ानों और आरतियों की धुन में भी ज़हर घुल गया था। ज़हर का असर अब जाता रहा है, आज एक बार फिर से अज़ान और आरती के स्वर कानों से टकरा रहे हैं।

'गणपति बप्पा मोरिया...की गूंज पूरे माहौल में पसरी है, पर ज़हर का असर क्या सचमुच खत्म हो गया है! महसूस कर रही हूं इस पल का सच। इस पल मेरी सांसें तेज़ हो रही हैं। उसकी तरह, उसकी यानी वो जो सामने स्कूटी पर अधबैठी-सी है। स्कार्फ और हेलमेट से पूरी तरह मुंह ढांपे है वह। एक लड़की...या महिला भी कह सकते हैं, कपड़े अब विभेदीकरण से आज़ाद हैं। शरीर ढांपते हैं या आपका विज्ञापन करते हैं। आप क्या बला हैं? यह बताते हैं। तो ऐसा उसे देखकर लगा कि वह कोई हैरान परेशान आत्मा है। आत्मा...एक स्त्री देह के भीतर। ये बात और है कि उसकी देह उसकी आत्मा पर हर बार भारी पड़ती है। संभलती ही नहीं देह, उससे भी शायद नहीं संभल रहीं, वो कभी सिमट रही है, कभी स्कूटर पर पूरा वज़न लाद देती है, जाने कितना भार हो इस देह में। जैसे...अभी एकदम से वह एक तरफ झुकी, पास से कोई गुज़र रहा था शायद। इतना भी पास नहीं था, जितने पास उजाला लिपटा था उससे। उजाला, तेज उजाला, रात के नौ बजे!

यह जयपुर शहर का भीड़-भाड़ वाला चौराहा है। शहरवालों के प्रिय मोतीडूंगरी गणेशजी के मंदिर से होती हुई यह रोड सांगानेरी गेट की ओर जाती है। शहर के चार दरवाज़ों में एक दरवाज़ा। गणेश प्रतिमाएं अपने इतिहास, गाथाओं, गीतों, भजनों और तमाशों की फौज के साथ पुराने शहर पर चढ़ाई करने जा रही हों जैसे। सच में सड़कों पर सरपट दौड़ती गाडिय़ों का शोर हथियार डाल रहा है, भाग रही हैं गाडिय़ां इधर-उधर किसी सुरक्षित गली की तलाश में। वह स्त्री भी शायद किसी सुरक्षित गली की तलाश में तो नहीं। मैं उतरी उसके भीतर, डर की गंध समाई मुझमें या मैं कुछ डर छोड़ आई वहां, कहना मुश्किल है।

खैर डर से पहले बात आज के दिन की, कुछ खास ही दिन है आज का। आज गणेशजी की शोभायात्रा निकाली जा रही है। कल अद्भुत संयोग था। गणेश चतुर्थी और ईद एक ही दिन मनाई गई। ये संयोग हमारी जमीं पर नए नहीं हैं पर ये डर भी तो नए नहीं हैं। रेवा...रेवा नाम है इस स्त्री का, कहीं इसी डर को तो नहीं जी रही वो। मैं रेवा के इर्द-गिर्द हूं, वह बुदबुदा रही है, लेकिन उसकी अपनी आवाजें जय गणेश की गूंज में दफन होती जा रही हैं।

            हरे रंग के शॉर्ट कुर्ते, लैगिंग और झीने दुपट्टे में समाई सामान्य कदकाठी वाली रेवा ने शायद तीस वसंत तो देखे ही होंगे, महसूस होगा कितनी ही बार कि ऋतुएं उससे ही जवां होती हैं, लेकिन रेवा को तो अभी मौसम की महक से कोई लेना-देना नहीं। बहुत देर से ट्रैफिक जाम में फंसी है वो। झुंझलाहट में उसने हेलमेट और स्कार्फ उतारा, बालों की ढीली पड़ चुकी पॉनीटेल को ठीक किया। सांवली रंगत और तीखे नैन-नक्श के बीच चिंता की लकीरें दौड़ रही हैं। गहरी काली आंखें काजल से और भी गहरी नज़र आ रही हैं, संदेह के डोरे इन गहराइयों में फिर भी नहीं डूबे, बल्कि उछलकर घड़ी पर जा टपके '...नौ बज गए हैं, चीनू के सोने का वक्त हो रहा है। हे गणेशजी महाराज आपकी प्रतिमाओं को देखने का सुख अद्भुत है, लेकिन अब ज़रा जल्दी जाओ जी'। रेवा पास खड़े ट्रैफिक मैन से पूछती। 'अरे भाई कितनी देर लगेगी रास्ता खुलने में।

'आप आराम से गाड़ी खड़ी कर लो मैडम, टाइम लगेगा अभी।' ठंडे और थके लहजे में चौड़ी मूंछों वाले ट्रैफिक मैन ने कहा।

'कितना?'

'कुछ पता नहीं है।'

'इसे कहते हैं पढ़ी-लिखी गंवार। रेवा आहिस्ता से अपने कान में फुसफुसाई। कानाफूसी खुद से चालू रही...सुबह से खयाल आ रहा था कि शाम को रास्ता बंद मिल सकता है। शोभायात्रा निकलनी है पर नहीं जी, अपने दिमाग पर ही कुछ भरोसा कम है। निकल पड़ी मैडम, अब भुगतो।

खुद से जिरह करती हुई बोली, हां ठीक है भुगत रही हूं न पिछले एक घंटे से। बस चीनू की चिंता सता रही है। पता नहीं कुछ खाया होगा उसने या नहीं। उसके खाने से ज़्यादा डर तो उसके पापा का है। अभी फोन आता है, अभी चीखेंगे, अपने आपको ज़्यादा होशियार समझती हो, मुझसे पूछ तो सकती थी जाने से पहले।

क्यों? क्या पूछना था उनसे। दस दिन हो गए कहते-कहते चीनू की फीस जमा करवानी है, उसका बैग भी बेहाल हो रहा है, हाथ की सिलाई भी कोई रुकती है बैग पर...पर नहीं, उन्हें कोई मतलब नहीं इन चीजों से। एक नौकरी तक वो अपने लिए नहीं ढूंढ सकते। उनकी बला से भूखे मरो...रेवा बड़बड़ाती जा रही थी कि अचानक किसी का हाथ उसकी पीठ पर ज़ोर से पड़ा...।

'हाय रेवा', जींस और कुरते में उसकी हमउम्र पर ज़रा खिलंदड़-सी नज़र आने वाली लड़की ने हंसी को हवा में बिखेरते हुए कहा।

'अरे जीतू तू क्या कर रही है।'

'मेरा कौन खसम बैठा है घर पर, राह देखने को। दीदी का फोन आया था, ज़रा काम था उसे, बस इसी बहाने की डोर पकड़कर आवारागर्दी कर रही हूँ और तू? आसपास पसरी भीड़ पर नज़र दौड़ाते हुए उसने कहा।

'अरे चीनू के लिए कुछ खरीदना था। देर हो गई। पता है कितना घूमते-घामते यहां तक पहुंची हूं। जौहरी बाज़ार में गाडिय़ों की आवाजाही बंद कर दी गई है। चौपड़ से किशनपोल होते हुए आई हूं, बेवकूफी की कि अजमेरी गेट से नहीं मुड़ी। सोचा रास्ता खुला है तो आगे भी खुला मिलेगा। ये तो सोचा नहीं कि गणपति की सवारी तो गणेश मंदिर से सांगानेरी गेट की ओर होते हुए ही निकलनी है।'

'अरे तो अब परेशान मत हो। कितने सालों बाद ऐसी झांकियां देखने को मिल रही हैं।' कंधे से ज़रा नीचे इधर-उधर छितरे अपने छल्लेदार बालों में अंगुलियां फंसाते हुए उसने कहा।

'हां वो तो है, बचपन में देखी थी एक बार। तब से तौबा कर ली। फिर से उस हादसे का रीटेक ना हो इसलिए बिलकुल बीच में स्कूटर खड़ा कर दिया। ट्रैफिक मैन के लिए बनी गुमटी के पास। ज़्यादा हुआ तो वहीं जाकर खड़ी हो जाऊंगी। रेवा की नज़रें गुमटी पर गई।

गुमटी पूरी तरह से बच्चों के हवाले थी। उनकी नन्ही हथेलियां जाम हो रहे रास्ते में भी राह दिखा रही थी। नन्हे हाथों ने जिधर इशारा किया, रेवा के खयाल भी उधर मुड़ गए और चीनू से जा मिले। चिंता की लकीरें चेहरे पर पसर गई। उसने नज़रें वहां से हटा जीतू पर टिका दी।

'हां, भीड़ से मुझे भी घबराहट होती है, देर तो मुझे भी हो रही है। लैंडलोर्ड ताला लगा देंगे। जीतू पर चिंता के कीटाणुओं ने धावा बोल दिया।'

'अरे मैं ड्रॉप कर दूंगी ना, तेरा घर तो वैसे भी रास्ते में है।' तसल्ली में लिपटे शब्‍द रेवा के।

'ठीक पर पहले ये बता कि तुझे क्या हुआ है? ऑफिस में भी परेशान दिख रही थी। सोच रही थी बात करूं, लेकिन आज काम बहुत ज़्यादा था, बता न क्या हुआ?' जीतू ने पूछा।

'क्या कहूं? कुछ नया तो नहीं है। सारा दिन घर में रहकर भी वे चीनू से बेपरवाह ही रहते हैं। भाभी के भरोसे छोड़कर आती हूं उसे, लेकिन कब तक। मुझे भाभी को कुछ कहना भी अच्छा नहीं लगता। उन्हें लगता होगा कि उनके लिए कुछ करने की बजाय हमने अपनी ज़िम्मेदारी भी उन्हें सौंप दी।'

'वो तो घर पर ही रहती हैं ना। अपने बेटे के साथ तेरी बेटी को रख लेने में हर्ज भी क्या है। और फिर दो-चार घंटे की तो बात है। स्कूल से आने में ही उसे तीन बज जाते होंगे।'

'हम्म...वो तो ठीक है, लेकिन घर से जल्दी निकलती हूं तो घर के सारे काम भी नहीं कर पाती हूँ। पापा जब देखो, तब सुना देते हैं। सबके सामने कह देते हैं कि बड़ी बहू है, तभी छोटी नौकरी कर पा रही है। नहीं तो इसके बस का कुछ नहीं। बहुत बुरा लगता है। उनसे कहती हूं कि थोड़ा-सा काम पीछे से संभाल लें लेकिन वो सुनते ही नहीं। न उनसे बाहर का काम होता, न घर का। चीनू की फीस भी दो महीने से नहीं दी। उसका भी इंतजाम करना था लेकिन हुआ नहीं। पापा से भी नहीं मांग सकती। बड़े बेटे के जाने के बाद से बड़ी बहू और पोते की जिम्मेदारी उन्होंने ओढ़ ली है। वही देते हैं उसकी फीस। भाभी ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है इसलिए जॉब भी नहीं कर सकती...।'

'अरे देखो रेवा...कैसे ये लोग मुंह से आग की लपटें निकाल रहे हैं।' जीतू ने उदास बातों का सिलसिला तोड़ा। रेवा भी उसके प्रयासों में साथ देते हुए बोली, 'हां यार। ये मुंह से निकाल रहे हैं उस आग को, जो हलक के नीचे नहीं उतरी, यहां मेरे जिस्म में बसी आग को कौन निकालेगा।'

ठीक चौराहे पर खड़ी रेवा और जीतू गणेशजी व अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की शोभायात्रा के साथ ही लोक कलाकारों के करतब भी देख रही थी। साथ ही सोच रही थी कि कैसे वो अभी तक किसी की धक्का-मुक्की का शिकार नहीं बनी हैं।

'अरे रेवा क्या टाइम हुआ?'

'टाइम तो बड़ा बुरा है। रेवा ने कहा ही था कि मोबाइल बज उठा।'

'हां, हैलो...हैलो...हां जोर से बोलो, आवाज़ सुनाई नहीं दे रही।'

'कितनी देर लगेगी...फोन से आती आवाज़।'

'बस अभी रास्ता बंद है, झांकियां निकल रही हैं।'

'तो, कोई ज़रूरी था तुम्हारा आज ही शॉपिंग करना देवी जी।'

'आ रही हूं, कहा ना।'

'ठीक है, अच्छी बात है। तुम अब कमाती हो। तुम्हें किसी से पूछने की ज़रूरत भी क्या है। जब मन करे, तब आ जाना। मैं जा रहा हूं। देर रात आऊंगा। तुम्हारी तरह नहीं हूं, जो नहीं बताऊं। तुम्हारी तो नाक आजकल ज़्यादा ऊंची हो गई है, रखो अपनी नाक संभालकर।'

शब्‍दों को अधूरा-सा छोड़ता फोन रेवा के चेहरे पर अधूरापन छोड़ जाता है। कई भाव आए और गए उसके चेहरे से। जीतू समझ गई। दोस्त जो है उसकी।

'पति देव?'

'चल छोड़ ना, उनकी परवाह नहीं मुझे लेकिन चीनू परेशान हो रही होगी। बोल क्या करें?'

'हम्म...चल, गाड़ी को घसीटकर ले जाते हैं, देखें पैदल घसीटकर ले जाने की इजाजत दे दे। ज़रा गुजारिश कर ही लेते हैं।'

जीतू के प्रस्ताव पर रेवा की मौन मोहर लगती है और स्कूटर उनकी बात मानता हुआ घसीटता है धीरे-धीरे।

'...अरे...अरे मैडम, आगे नहीं ले जा सकती आप।' ट्रैफिक मैन अपने होने का सबूत देता है और स्कूटर की हैडलाइट पर हाथ रखते हुए पीछे की ओर लौटने का इशारा करता है।

'प्लीज भैया जी, देखिए ना देर हो रही है, छोटी बच्‍ची राह देख रही है।'

'तो मैं भी तो राह दिखा रहा हूं ना आपको। आप ऐसा करो जी, साइड वाली गलियों में से होते हुए निकल जाओ। देखिए और लोग भी जा रहे हैं। बस, बस वहीं से, रास्ता आगे मेन सड़क में मिल जाएगा।' उसने हाथों से इशारा करते हुए समझाया। अपनी आदत से उलट कुछ मिठास उसके शब्‍दों में थी, लिहाजा बात तुरंत मान ली गई।

रेवा गाड़ी को आगे घसीट रही है, डर पीछे घसीट रहा है। 'नहीं, रेवा नहीं। आगे न जाना। तू कभी इस रास्ते पर नहीं गई। तू जानती नहीं रेवा, मुस्लिम इलाका है। रात के ग्यारह बजने को हैं। सारी खातूनें तो भीतर होंगी। वो जो दया कर सकती हैं, मदद कर सकती हैं, जो मुस्लिम होने से पहले स्त्रियां हैं, तुझे एक भी नज़र नहीं आएंगी।'


सच एक भी नज़र नहीं आई थी मुझे...ज़िन्दा। पीछे छूट चुके वक्त को पकड़ती हूं। तमाम तहों के पीछे गुज़रतें ज़माने की चीखें सुनाई देने लगी हैं। नहीं...नहीं अज़ानों और आरतियों के स्वर में मैं फिर से चीखों को शामिल नहीं होने दूंगी। मैं रेवा के इर्द-गिर्द लिपट जाती हूं।

 

'फंस गए जीतू। अब क्या करें? कितना अंधेरा है इन गलियों में। समझ में ही नहीं आ रहा कि कौन-सी गली आगे जाकर बंद निकलेगी और कौन-सी गली सड़क की ओर। डर में भीगे शब्‍द रेवा के मुंह से छूट पड़े।

'अरे डरो नहीं। देखो ना आगे दो स्कूटर वाले भी जा रहे हैं। बस इन्हीं के पीछे हो लो।

'कितनी पतली और अंधेरी गलियां हैं। हर लम्हा सोया है यहां। कौन सुनेगा, अगर चीखना भी पड़ा तो। रेवा ने कहा।

पीछे बैठी जीतू रेवा को तसल्ली देने लगी और हल्के से कंधे को दबा दिया। दबा क्या दिया, अपना भी डर ज़ाहिर कर दिया। जीतू को याद आ रहा है कि उसके भाई तो दिन में भी उसे मुसलमानों की बस्ती में नहीं जाने देते। क्या भरोसा उनका। उन्हें तो हिंदू बैरी नज़र आते हैं। नफरत की कोई न कोई वजह मिल ही जाती है दोनों सम्प्रदाय के लोगों को। तो क्या इस नफरत का खामियाज़ा भुगतने की बारी आज हमारी है। नहीं-नहीं, ये बातें पुरानी हो चली हैं, हमारे शहर ने हर पुरानी बात पर मिट्टी डाल दी है। खुद को तसल्ली देती जीतू की नज़रें गली के तिराहे पर अटकी। पतली-सी गली यहां और पतली होकर दो हिस्सों में बंट रही थी। कुछ वाय की आकार में थी गली, जहां से दो फाड़ हो रही थी वहीं एक जर्जर मकान खड़ा था और उसके आगे उसी मकान से मिलता-जुलता एक शख्स। 

'रेवा देखो इनसे पूछो ना यह बूढ़े बाबा खड़े हैं, भले ही नज़र आ रहे हैं। जीतू ने मन की कह डाली।

'नहीं, पागल है तू, हम किसी से नहीं पूछेंगे। स्कूटर के पीछे चलते हैं ना। बीवी-बच्‍चों के साथ है वो। उसके साथ-साथ चलना ज़्यादा सुरक्षित है।

यह क्या स्कूटर ने तो लेफ्ट टर्न ले ली, रेवा की नज़र अंधेरी गली में दौड़ते स्कूटर को पकडऩा चाहती थी लेकिन पकड़ न सकी। नजरें पीछे की राह पर पसरने के लिए गर्दन के साथ घूम गईं और स्कूटर खुद-ब-खुद रुक गया। पीछे हलचल थी तो बस अंधेरे की। हॉर्न की आवाज़ जो अक्सर कोफ्त पैदा करता है, रेवा को आज उसकी दरकार थी। मायूस आंखें फिर पलटी और बूढ़े आदमी से जा टकराई। ठीक स्कूटर के सामने जर्जर दीवार की तरह खड़ा था वो। क्या तोड़ दूं इस दीवार को, स्कूटर चढ़ा दूं....इतनी भी जर्जर इमारत नहीं, जो ढह जाएगी...रेवा के खयाल भागने की फिराक में थे। पसीना भी सूखने लगा था। रेवा कुछ कहना चाह रही थी, लेकिन जुबान ने साथ न दिया। उसके होंठ बुदबुदाए...।

'हां बेटा, उधर उस गली से फिर वहां मुड़ जाना, सड़क आ जाएगी।  बूढ़े ने बहुत तसल्ली और अपनेपन से कहा।

रेवा को कहां तसल्ली थी। उसने तुरंत स्कूटर आगे बढ़ा लिया, लेकिन हड़बड़ी में ठीक से समझा नहीं। कोसा खुद को। कितने भले थे ना बाबा। पहले भी तो दो लोगों को रास्ता बताया था और हमें तो बिना पूछे ही बताया। नाहक ही इतना डर रहे थे। रेवा ने कुछ राहत की सांस ली, फिर याद आया कि अरे कौन-सा मोड़?

'जीतू बता न कहां मुडऩे के लिए कहा था।

'राइट की और

'नहीं, शायद सीधा चलने के लिए कहा था।

'नहीं, राइट की और

तभी पास से एक मोटर साइकिल गुज़री, भेदती-सी नज़रें और चेहरे पर कुटिल मुस्कान का गहना पहने। वो कोई चोर तो नहीं था, चोर से कुछ ज़्यादा ही खतरनाक लग रहा था।

'राइट मैडम राइट, आंखों और गर्दन से एकसाथ इशारा करते हुए उसने ऐसे कहा कि सोच ना जाने रेवा को कौन-से भयावह अंजाम तक ले गई।

'तुमसे पूछा मैंने, रेवा तमतमाई और गाड़ी सीधी आगे बढ़ा दी, राइट साइड की अगली गली से भी आगे बढऩे को हुई तो सामने देखा कि रास्ता कुछ बंद-सा लग रहा है। रेवा की सांस फूलने लगी, स्कूटर की तो बंद ही हो गई। न जाने कैसा स्कूटर है, जब भी स्‍पीड कम करो तो बंद हो जाता है...रेवा बड़बड़ाती जा रही थी, कोस रही थी स्कूटर को, जैसे कोई बुरी-सी गाली सुनकर उसका अहं जाग उठेगा और वह स्टार्ट हो जाएगा। स्टार्ट नहीं हुआ स्कूटर, एक बार नहीं, दो बार नहीं, लेकिन तीसरी किक से...शुक्र है स्टार्ट हुआ, रेवा ने तसल्ली की सांस ली।

जीतू बोली, 'चल अब वापस बैक ले स्कूटर को, कहा था न सुनती ही नहीं मेरी।

रेवा ने गाड़ी बैक की। इधर-उधर देखते हुए नज़रें फिर उन्हीं नज़रों पर ठहर गई। स्कूटर भी ठहर गया। उसी तिराहे के ठीक बीच खड़ा था वो, जहां से रेवा को टर्न लेना था। स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी में उसका चेहरा देख पा रही थी रेवा। रेवा को वो खुद से कम उम्र लगा, लेकिन उम्र से क्या मतलब। मजबूत कद-काठी थी उसकी। गहरे रंगों के कपड़ों में समाया उसका रंग भी गहरा ही था। शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले थे, लंबी सी चैन उसकी गर्दन में झूल रही थी। उसके बाल ज़रा भी नहीं हिल रहे थे, बालों में अंगुलियां फिराकर वो जबरन उन्हें हिलाने की कोशिश कर रहा था। हंसी उसके चेहरे पर मस्तमौला-सी पसरी थी। वो घूरता रहा रेवा को और हंसता रहा, रेवा ठहरी रही और डरती रही। इस बार उसने मुंह से कुछ नहीं बोला, रेवा के मुंह से भी कोई बोल नहीं फूटा। अंधेरा के मुंह से भी नहीं।

रेवा ज़ोर से हांफने लगी, पीछे बैठी जीतू भी। बाइक वाला लड़का पहले की तरह कुटिल मुस्कान बिखेर रहा है। कह कुछ नहीं रहा। बस हाथ से इशारा किया। मगर ये क्या? इशारा तो कोई अभद्र नहीं था। उसने फिर राइट की गली की ओर हाथ से इशारा किया। रेवा ने तुरंत राइट की ओर टर्न किया। एक बार लड़के को पीछे मुड़कर देखा, कहीं वो पीछे तो नहीं आ रहा। नहीं, वो अभी वहीं खड़ा है। गाड़ी आगे बढ़ रही है, डर पीछे छूट रहा है और सच में छूट ही गया पीछे, वो लड़का भी।

एक लंबी गहरी सांस ली दोनों ने। रेवा, जीतू और स्कूटर तीनों अब मेन रोड पर थे। पीछे मुड़कर देखा तो गणेशजी का लवाजमा नज़रों से दूर हो रहा था। जीतू और रेवा ज़ोर से हंसी, बहुत ज़ोर से।

मैं भी ज़ोर से हंसी। हंसी चादर की तरह बिछ गई डर की परतों पर। कसकर लपेट ली चादर को कि कहीं डर फिर मुंह बाहर न निकाले। वो चली आगे-आगे और मैं उनके आगे-पीछे, लिपटती-सी, डर को ज़रा-सा छिटकती-सी। लवाजमा पीछे छूट रहा था। रोशनी भी पहली जैसी नहीं रही थी। रेवा ने जल्दी से जीतू को ड्रॉप किया। रेवा की गाड़ी अब तेज दौडने लगी, मुझसे भी तेज दौड़ सकती हो! मैं सोच रही हूं, वो भी कुछ सोच रही है, अपने-अपने समय के घाव कुछ अलग पैकेजिंग में तैयार मिलते हैं। अंधेरे को चीरता हुआ स्कूटर और बहानों को बुनती रेवा अपने मुकाम पर पहुंचे, दरवाज़ा रेवा के इंतज़ार में खुला ही था और भी बहुत कुछ था उसके इंतज़ार में। एक तीखी दुर्गंध।

'आ गई आप, बड़ी जल्दी आई, रेवा के पति की आवाज़ थी।

'मैंने बताया तो तुमको, अब क्या दस बार कहूं।

'जबान मत चलाओ मुझसे, कुछ ज़्यादा ही हवा में उडऩे लगी हो आजकल, मैं कम पड़ता हूं न तुमको।

'इतना है तो तुम कमाओ ना, क्यों भेजते हो मुझे बाहर।

'छूट दी तो ये गुल खिलाओगी।

'ज़रा शर्म है, घर में सब सुन रहे है।

'मुझे कहां शर्म। शर्म तो तुम्हें है, जो आवारा की जैसे रात को घूमती हो।

'और तुम...तुम भी तो जाने वाले थे।

'ओह तो इसलिए आप देर से आई कि मैं तो जा रहा हूं, मुझे क्या पता चलेगा। मैं इतना बेवकूफ नहीं हूं, जितना तुम समझती हो।

'बस करो।

'हां, मेरी क्या औकात आपको कुछ कहूं। गुस्से में दरवाज़ा पटकते हुए बाहर निकल जाता है।

रेवा पीछे-पीछे जाती है, 'रात को बारह बजे कौन-सी खेती करने जा रहे हो?

'मुझे तुम्हारी इजाजत की ज़रूरत नहीं है समझी, तुम्हारी वजह से मैं वैसे ही लेट हो चुका 
हूं।

'सारा दिन घर में पड़े रहते हो, मुझे अपना ताव न दिखाओ।

'रेवा, बस चुप करो, जाने दो, बच्‍चे जाग जाएंगे, पापा भी सुन रहे हैं, अंदर आओ, भाभी हाथ पकड़ती हुई अंदर घसीटती है।

दरवाज़े पर चिटकनी चढ़ाती है और रेवा आंखों से आंसुओं को नीचे गिराती है।

रोती जाती है रेवा और बोलती जाती है, 'चीनू की फीस का इंतजाम करने गई थी भाभी, खुद भी कोई काम नहीं करते और मुझ पर चिल्लाते हैं।

'मैं समझती हूं। मत दो उसे सफाई। अच्‍छा बताओ हुआ इंतजाम।

'नहीं भाभी, पूरा नहीं। मीनल के घर गई थी, उसने दो हजार दिए हैं। चीनू का बैग ले आई, अब इसमें फीस तो जमा होती नहीं इसलिए।

'कितने चाहिए?'

'तीन हजार और चाहिए।'

'करती हूं कुछ इंतजाम।'

'नहीं भाभी, आप कहां से लाएंगी। आप परेशान न हो। रास्ते में जीतू भी मिली थी, उसने कहा कि वो कुछ इंतजाम कर देगी। किस काम का ऐसा पिता, अपनी बच्ची को पढ़ा भी नहीं सकता।'

'ऐसा मत कह रेवा, एक छांह तो है।'

'नहीं ज़रूरत ऐसी छांह की, ज़हर छोड़ती है जिसकी पत्‍तियां, उस पेड़ की छांह से क्या मतलब भाभी।'

'ऐसा मत बोल रेवा, तू नहीं समझेगी, पति का न होना क्या होता है। चल गुस्सा छोड़ पहले खाना खा ले, चीनू ने खा लिया, सो गई है। कपड़े बदलकर रसोई में आ जा।'

आंसू पोंछती हुई, 'मैं ले लूंगी भाभी आप सो जाओ।'

रेवा अपने कमरे में जाती है। चीनू को चूमती है और कपड़े बदलती है। भूख दर्द को पीछे धकेलती है, रेवा रसोई में पहुंचती है इस बात से बेखबर कि कोई साया है पीछे। रेवा रोटी और सब्‍जी थाली में परोस रही है, उसकी भूख भड़क रही है। भूख किसी और की भी भड़क रही है। रेवा जल्दी-जल्दी से एक कटोरी में दही निकालती है, कटोरी थाली में रखती है कि एक हाथ गर्दन के पीछे से सांप की जैसे बढ़ता हुआ आता है। रेवा की आत्मा में ज़हर चढ़ा देता है। चौंकती है वह, पीछे देखती है।

'पापा! होंठ बुदबुदाते हैं, आवाज़ दफन हो जाती है।

'देख तू पैसे के लिए इतनी परेशान मत हो, मैं तो बस फीस के पैसे दे रहा था। वो तो नालायक है। तू तो समझदार है ना। रोना बंद कर अब, खाना खा ले।

रेवा की आंखों से नदी निकलती है और सारी आस्थाएं उसमें बह जाती हैं। रेवा ज़ोर से उन्हें धक्का देती है। दरवाज़े के ठीक बाहर रखी स्टूल से वो टकराकर नीचे गिरते हैं। कमज़ोर हो चुकी देह उनसे संभलती नहीं।
गिरने की आवाज़ से भाभी दौड़ी आती है।

'क्या हुआ, वह पूछती हैं।

'कुछ नहीं, मैं अंधेरे की वजह से गिर गया, झेंप मिटाते हुए पापा कहते हैं।

रेवा की आंखें कुछ और नज़ारा बयान करती हैं। पापा अपने कमरे में चले जाते हैं।

'रेवा क्या हुआ? भाभी सहमी नज़रों से उसे देखती है।

भाभी...पापा ने....सारी बातें एक ही सांस में कह जाती है, जो शब्‍द टूटते हैं उन्हें रेवा के आंसू पूरा कर देते हैं।

'रेवा! चुप

'भाभी!, चेहरे की लकीरें सवाल पूछती हैं।

'हां, रेवा चुप, आसपास वाले सुन लेंगे और भूलकर भी ये बात अपने उस पति से मत कहना। अगर वो ही किसी लायक होता तो उसके पिता की इतनी हिम्मत होती?

'और अगर वो न हो तो? पति न हो तो क्या नोच खाएंगे?

'हां रेवा, नोच खाएंगे।

रेवा एकटक भाभी की ओर देखती है।

उनकी आंखों में आंसू नहीं हैं, बस एक खाई ही नज़र आती है, जिसमें दफन हैं सारी चीखें।

रेवा को सुनाई देने लगती है वो सारी खामोश चीखें। थकी हुई, हारी हुई चीखें। उसके कानों से होती हुई चीखें दिल तक उतरती है। रेवा की सांस इनसे उलझ अटकने लगी है।

उसकी सांसों में घुली मैं भी अटक जाती हूं वहां। धीरे-धीरे निकलती हूं और इस समय की चीखें उन आंखों में दफना देती हूं, जिनमें खाई गहरी होती जा रही है। इन हादसों को यही दफन करती मैं निकल जाती हूं। इन बिना आवाजों वाली चीखों का बोझ मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। ...बिलकुल नहीं होता।

 

और हवा खामोश हो गई

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