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तुमसे ना हो पाएगा
तुमसे ना हो पाएगा
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© Neha Rawat

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कोई जो पूछता कि स्कूल क्या है तो आसान से लफ़्जों में कहती खेलने के लिए एक मैदान। अरे क्या कुछ गलत कहा मैंने ?

ये एक मैदान ही तो हैं जहां हम खेलते कूदते हैं, दौड़ कर-गिरकर ज़ख़्मी भी हो जाते हैं लेकिन भागना नहीं छोड़ते। बिल्कुल बे-फिक्र और बेसबर। अगर आप कॉलेज की परिभाषा पूछेगें तो मैं पन्ने रंग दूंगी लेकिन मेरी समझ भी कुछ नहीं आएगा।

कॉलेज का जीवन स्कूल के जैसा ही इतना बे-फिक्री भरा तो नहीं है। हाँ सच में क्योंकि अब यहाँ स्कूल जैसा फार्मूला इस्तेमाल नहीं होता जो कि था-"पढ़ो और अच्छे नम्बर लाओ" ,अब यहां तो सीधा सीधा तरिका है-"पढ़ना है तो पढ़ो वरना भाड़ में जाओ"। अब तो शायद मुझे मुझसे ही कोई‌ ख़ासा उम्मीद नहीं रही। पहले नम्बर कम आते थे मगर आते ज़रूर थे और अब नम्बर नहीं आते बस डरावने सपने आते हैं कि कहीं रिज़ल्ट में उबले अंडे ना मिल जाए। कॉलेज की बात आई है तो वो टोपर लोग के बख़ानों से हम पीछे कैसे रह सकते हैं? ये वही लोग है जो हम जैसे बच्चों का बड़ी खामोशी के साथ क़त्ल करते हैं।

इनकी वज़ह से ही मैं ऐवरेज से गिरकर "बिलो ऐवरेज " की श्रेणी में आ गई हूं लेकिन मुझे कोई ख़ासा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि "आई ऐम ओवर सेटिसफाईड विद सिक्स सी.जी.पी.ऐ। अरे हम वो लोग हैं जो इस हालात में भी किसी टोपर से कम ख़ुशी महसूस नहीं करते क्योंकि लक्षय तो हमारा बस पास होना‌ ही है और वो तो हम शायद होते ही रहेंगे ऐसी ख़ैर उम्मीद तो है मगर क्या बताएं दिल अभी भी कहता है-"तुमसे ना हो पाएगा"।

मैंने पहले जिस कॉलेज में दाख़िला लिया वहां मेरी क्लास में कुल "एक सौ पैंतीस" बच्चे थे। लेकिन कुछ कारणवश मैंने दिल्ली विश्व विद्यालय के ही किसी और कॉलेज में दाख़िला करवा लिया जहां थे तो कुल चालीस बच्चे लेकिन शक्ल बस वो सड़े पड़े पंद्राह-बीस ही दिखाते थे जिनमें कभी कभी मैं भी शामिल हो जाया करती थी। शुरूआती साल तो बहुत अकेलेपन में बीता ना कोई इतना ख़ास दोस्त और ना ही कहीं इतना आना जाना।वो एक वर्ष बहुत ही मुश्किलों भरा था और उस समय लगता था कि स्कूल ही बेहतर है। काश मैं वापस स्कूल जा पाती। कॉलेज जाना भी कम हो गया। बोरियत भरे दिन गुज़रने लगे और अकेलापन ख़लने लगा। फ़िर दूसरे वर्ष में कॉलेज लाइफ़ में एक टविस्ट आया। कुछ क्लास्मेट से दोस्ती बढ़ने लगी और वही लोग अब दिल के करीब हो गए। सोचा नहीं था कि ऐसा भी मोड़ कभी आएगा और फ़िर धीरे धीरे तन्हाई का कोहरा छटने लगा और एक नहीं दोस्ती वाली सहर हुई। इन दोस्तों ने कई अच्छी और बुरी आदतें लगवाई लेकिन फ़िलहाल तो साथ बुरी ही है। मार्कस में साल दर साल कोई ख़ासा फर्क नहीं आया और मेरी स्थिति "कोंस्टेंट" वही बनी रहे-"बिलो ऐवरेज"।

नौवीं के बाद से कभी नकल नहीं मारी‌। कॉलेज में दोस्तों ने कहा कि चिटिंग कर ले, क्यूं नहीं करती। लेकिन अपून को पता था कि किसी नालायक से पूछने के बाद फेल होने से अच्छा है कि ख़ुद के गलत जवाबों से ही फेल हो जाओ। आहह वो क्या है कि उससे अलग ही "सेटिसफेक्शन" मिलती है और चिंटिंग की सोचें भी तो दिल कहता है-"तुमसे नहीं हो पाएगा"।

चलिए चलते हैं अब थोड़ा प्यार कि तरफ़। क्या बताऐं कि प्यार के मामले में दिल की भूमि शमशान बनी हुई है। कॉलेज में दाख़िला लेकर देखिए कुछ भी तो भला नहीं हुआ सिवाए कुछ ख़ास दोस्तों के। मुझे मेरी "गोडमदर मिलीं"। सीरियस्ली लेने वाली बात नहीं है बस इतना है कि वो हम कुछ भूखे-नंगे दोस्तों को खाना खिला देती थी। वो ऐसी शख़्सियत थी और हैं जिन्होंनें शायद मुझे मेरी माँ से भी कुछ ज़्यादा खाना खिलाया होगा चाहे फ़िर वो बाहर का ही क्यों न हो, फ़िर भी इतना कुछ करने के बाद बेज्ज़ती करवाने की क्षमता किसमे हैं? जी बिल्कुल ये मेरे दो-तीन दोस्तों में हैं जो रोज़ सुबह मुँह ऊठाकर आ जाते हैं और मेरी टांग ख़िचाईं के पात्र बनते हैं। कैंन्टीन में रोज़ डोसा खा खा कर हम इतने पक्के हो गए थे कि हम हज़ारों डोसों में अपने कॉलेज का डोसा‌ पहचान सकते थे। वो "पैंतीस रूपये में आनंद की बात थी" जो मैंने तो अक्सर फ्री में ही उठाया था। अब बताइए कॉलेज की जिंदगी में लाल दीवारों के सिवा रखा क्या है?

मैं बताउं? जी एक वाटर कूलर और कैंटीन। इनके बिना तो कॉलेज जीवन बेरंग है।

सच कहूं तो कॉलेज सिर्फ़ इन लाल दीवारों से नहीं बल्कि जिगरी यारों से बनता है, उसके नाम से नहीं उसके काम से बनता है

और कॉलेज जीवन सफ़ल होता है इन दोनों से। इस जीवन की गाड़ी बिन ब्रेक के तो चल ही‌ रही थी और डूबती नईया भी बचाए तो कौन लेकिन हम भी कम नहीं हम लाइफ़ जैकेट पहन कर डूबने वालों में से हैं क्योंकि डूबने वाले को तिनके का सहारा होता है और हमें तो हमारा भी नहीं है। अजी आप ही बताइए अब कि तुक्का लगा या उसे क्या ही कहें मेरे नम्बरों में ना के बराबर बढ़ोत्तरी हुई और मैं पिछले सेमेस्टर में "सात सी.जी.पी.ऐ" तक पहुँच गई। हां अंदर से थोड़ी ख़ुशी भी हुई लेकिन ज़्यादा इस बात का दुख हुआ कि मैं जानती थी कि ये एक मृगतृष्णा है। कभी कभी ऐसे अजूबे हो जाते हैं और मैं जल्द ही "बिलो ऐवरेज़" के कवरेज ज़ोन तक आ ही जाऊंगी। ना चाहते हुए भी मेरा दिल-ओ-दिमाग मुझसे यही कहते थे-"बेटा तुमसे नहीं हो पाएगा"।

कैंटीन दोस्त कॉलेज

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