Participate in 31 Days : 31 Writing Prompts Season 3 contest and win a chance to get your ebook published
Participate in 31 Days : 31 Writing Prompts Season 3 contest and win a chance to get your ebook published

Mridula Srivastava

Others


4.8  

Mridula Srivastava

Others


बात अभी बाक़ी है

बात अभी बाक़ी है

36 mins 14.4K 36 mins 14.4K

 

मद्रास की चौड़ी ख़ूबसूरत  माऊंट रोड। उसी के फुटपाथ पर रात के करीब दस बजे। अपने-अपने घर लौटने को

मज़बूर उन राहगीरों को अँगूठा दिखाती तो कभी उनकी आँखों की चौंधियाती वह काली कॉन्टेसा, नाक की

सीध में हवा से बातें कर रही थी ।कॉन्टेसा शहर के एस०पी० की थी। उसकी अपनी। लेकिन उस दिन उसे

डी.एम.पी.टी.एन. मुत्तुस्वामी ड्राइव कर रहा था। वह वर्दी में न होकर सादे कपड़े पहने था।

बगल में बैठी नल्ली को बीच-बीच में वह अच्छे –ख़ासे गुस्से में घूरे जा रहा था और वह थी कि अस्त-व्यस्त

-सी उसके कंधे पर लुढ़की हुई, नशे में धुत, काफ़ी हद तक होशोहवास में, शायद बरसों पहले खो चुके अपने

प्यार को पाने की लालसा में ।

कभी नल्ली की आत्मा तक से प्यार करने वाला मुत्तुस्वामी पिछले सात सालों से उसकी कुहनी तक के स्पर्श

से बचने की कोशिश करता हुआ आज एक बार फिर उसे लग रहा था। शायद इसीलिऐ  स्टेयरिंग घुमाते हुऐ  भी

वह बराबर नल्ली को खिड़की की तरफ़  अपने कंधे से धकेल रहा था और वह थी कि............।

गोल खंभों के पीछे से झाँकती, लिपी-पुती, चकमी-दमकी किन्तु सहमी उन धंधा करने वाली औरतों की तरह

ही नीली-पीली लुकछिप करती फ्लैश लाइटों से चमचमाती चेन्नै की यह माउंट रोड उस दिन भी नाइट सर्विस

देने के लिऐ  मुस्तैदी से तैयार लग रही थी। इसी रोड से होते हुऐ  कॉलेज रोड और वाया स्टरलिंग रोड होते हुऐ

अन्ना टॉवर पहुँचने  में उसे करीब आधा घण्टा लग गया था। उसे पहले नल्ली को अन्ना नगर छोड़ना था और

फिर ख़ुद  आवड़ी जाना था। सो तिरूमंगलम से ठीक पहले कॉन्टेसा एक झटके से बायीं ओर अन्ना नगर में

घुस गई। अब वह गाड़ी एक तिमंजिले वर्किंग वमून्स होस्टल के सामने आकर रूक गई, ‘चलो उतरो

भी......होस्टल आ गया। नैक्स्ट फ्राइडे फिर रेडी रहना.............ठीक शाम पाँच बजे, पुरिन्जदा-दा ?’ ;समझ

गई न ?द्ध वह तमिल में बोला। पुरिन्जद-पुरिन्जद ;समझ गई-समझ गईद्ध वह कहती, पर उसे लगा कि

ऐसा कहते हुऐ  वह उसे कार उतरने के लिऐ  धकिया रहा है।

‘उफ-ओ, उतर तो रही हूँ.........पहले मेरा पेमेंट........हिसाब तो चुकता करो।’ उसने मुत्तुस्वामी के धक्के को

झटकते हुऐ  तीखी आवाज़ में कहा।

‘पेमेंट...........हिसाब..........आखिर रही न चीप की चीप। एक घटिया औरत।’ इससे पहले कि मुत्तुस्वामी कुछ

कहता वह ‘चीप’ शब्द सुनकर चिल्लाने को हुई।

‘ऐ-ऐ, चीप होगी........;तेरी माँ उसने नही कहाद्ध नैक्सड वीक जब फ्री में वो मुर्गे खिलाऐगा और तुम उसके

जूते पोंछोगे तब पूछूँगी, चीप मैं हूँ, तुम, या वो साला एस.पी..........।’

सरी-सरी ;ठीक है, ठीक हैद्ध । पो-पो ;जाओ-जाओद्ध। ..........चुपचाप ये रूपये रख ले, होस्टल के रैंट और

मैं स चार्जेज़ के लिऐ । पूरे महीने का पेमेन्ट अब की बार वह तेरे काम के लिऐ  तुझे इकट्ठा करेगा। ये ले साड़ी

का पैकेट। सिल्क की है। उसने दी है। अगले फ्राइडे को इसी को पहनियो। और हाँ, ये ले अपनी ताली। अबकी

बार गलती से भी गले में लटका कर चली तो फिर देख........।’ कहते हुऐ  तीन दिन पहले छीने गऐ  नल्ली के

उस मंगलसूत्र ;तालीद्ध को उसने अपने ऊपर की जेब से खींचकर निकाला और नल्ली की तरफ़  उछालने को

हुआ। मुत्तुस्वामी को ताली अपनी ओर उछालते देख, बिजली की-सी गति पता नहीं उसमें कहाँ से आ गई कि

उसे मिट्टी पर गिरने से बचाने के लिऐ  वह बढ़ी और लपक कर पकड़ लिया। ताली हाथ में आते ही वह कुछ

आश्वस्त हुई।

.........और देख, जो चीज़ चाहिए हो, वार्डन से कह देना। ख़बरदार  जो इस होस्टल के गेट से बाहर तो क्या,

अपने कमरे की खिड़की तक से बाहर भी झाँका तो.......टाँगें तोड़ दूँगा । समझी ? मुत्तुस्वामी ने कहा तो नल्ली

एकबारगी नशे में भी काँप गई। फिर अचानक एस.पी. की कार के तीन बार बजे उस तेज़ हार्न की आवाज़ से

वह और भी डर गई। अपनी उसी ताली को गले में डाल, साड़ी का पैकेट और रूपयों की गड्डी पर्स में डाले

बिना, वह होस्टल के विशाल लोहे के जालीदार गेट में घुसने को हुई।

‘ओ मैं डम, फाइन पोड्ड.......मुप्पद रूबाय ;फाइन दो.......तीस रूपयेद्ध वाचमैं न की कड़कड़ाती आवाज़ सुन कर

वह एक बार फिर सहम गई। बचा-खुचा नशा उसे हवा होता लगा।

‘मुप्पद रूबाय ? किस बात के ? अभी तेा आठ बजने में पाँच मिनट है।’ बहकी हुई - सी वह तमिल में बोली।

‘पाँच मिनट आठ बजने में नहीं मैं डम, ग्यारह बजने में है।’ ग्यारह शब्द सुनते ही उसके काँपते पैर कुछ

ठिठक गऐ । रिसेप्शन पर टँगा वाल क्लॉक, गेट से साफ़ दिख रहा था। क्या कहती ?

‘अच्छा तो आज उस साले एस.पी. ने........’ और वह बस ज़िंदा  लाश वह बड़बड़ायी और अभी मुट्ठी में फँसी

उसी गड्डी में से बीस के दो नोट कुर्सी पर ऊँघ रही रिसेप्शनिस्ट के सामने पटक कर, सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

अपने कमरे की तरफ़  बढ़ते हुऐ  वह सोच रही थी।

नया सोमवार, नई लड़की शुक्रवार तक के लिऐ .........पहली मंज़िल पर उसके कमरे के उसी कोने वाले तीसरे

बेड पर होगी। सोचते ही उसे अपना सिर पहले से ज्यादा भारी लगने लगा। चौदह-बाई-सोलह का वह कमरा

नल्ली के जीवन का अंतिक पड़ाव है, कहना मुश्किल है। कमरे का बरामदे में खुलता दरवाजा और ठीक उसके

सामने कम चौड़ी किन्तु मोटी सलाखों वाली सड़क की तरफ़  खुलती खिड़की होस्टल के गेट के ठीक ऊपर है।

शेष दोनों दो अलमारियाँ और तीसरी अलमारी खिड़की वाली दीवार के कोने में कुछ आगे को निकली हुई।

दूसरे कमरों की तरह इस कमरा न० ३२ में भी तीन ही बेड पड़े हुऐ  हैं। पतले - लम्बे भारी भरकम लोहे के

स्प्रिंग वाले तीन अलग-अलग दिशाओं में पसरे पड़े, ये सिंगल बेड कमरे में आने वाली हर उस लड़की का

उपहास करते दिखाई देते हैं, जो या तो अपने पति को छोड़ आई या फिर जिसको उसके पति ने छोड़ दिया

है। पर नल्ली तो इन दोनो कैटेगरी में नहीं आती तो फिर आखिर कैसे वह पूरे सात साल इस बेड पर गुज़ार

गई ?

कमरा न० ३२ । एक बेड उसका है। दूसरे का किराया भी उसकी मार्फ्त मुत्तुस्वामी भरता है। पर तीसरा बेड ?

मात्र रविवार से शुक्रवार तक के लिऐ  ही किसी नयी लड़की को अलॉट होता है। डी.एस.पी. मुत्तुस्वामी की वार्डन

को दी गई विशेष हिदायत के तहत। नल्ली का व्यक्तिगत जीवन कम से कम किसी के सामने लाने का एक

यही तरीका शायद मुत्तुस्वामी की समझ में आया होगा। वार्डन को छोड़ इस होस्टल में रहने वाली दूसरी मेट्स

को यह जानने की ज़रूरत  भी क्या है कि केवल कामकाजी महिलाओं के लिऐ  बने इस होस्टल में मात्र नवीं

फेल नल्ली झूठा सैलरी सर्टिफिकेट जमा करके रह रही है और तो और होस्टल से एस.पी. की कोटी तक जाने

-जानने के अलावा मद्रास के किसी दूसरे दफ्तर में जाना तो दूर दफ्तर का नाम तक वह नहीं जानती। बस

वार्डन का फोन और मुत्तुस्वामी गेट पर। सुबह ५ से ६ बजे के बीच मॉर्निंग कॉफी, सात से आठ के बीच ब्रेक

फॉस्ट लेने के लिऐ लड़कियों या औरतों की एक लंबी कतार हाथों में अपनी-अपनी थाली पकड़े हुऐ । फिर लेडी

कुक ज़ोर से कॉल - बेल दबाती । बेल सुनते ही ‘सापाड़ रेडी’ ;खाना तैयारद्ध लड़कियाँ चिल्लाते हुऐ  कमरों

से बाहर निकलती और जल्द से जल्द कतार में लगने के लिऐ  बिना स्लीपर के ही भाग पड़तीं। यूँ लगता

मानों भोजन पर चालीस परसेंट की सेल लगी है, जिसके साथ लेडी कुक द्वारा तमिल में दी जाने वाली

गालियाँ मुफ़्त  मिलने जा रही है। यानि बाई वन गेट वन फ्री।

नल्ली के कदमों में न कोई तेज़ी होती न तत्परता। सिल्क की साड़ियों में लिपटी दूसरी लड़कियों को देख वह

जल जाती। बिना मन के नहाना-धोना, कमरे के बाहर अल्पना बनाना उसे बेहद खलता और न चाहते हुऐ  भी

मैंचिंग साड़ी और पर्स लटकाए झूठ-मूठ ही सही वह इतराती नीचे उतरती और आँख बचाकर बजाये गेट से

बाहर निकलने के चुपचाप अपने कमरे में वापस ऊपर चढ़ जाती। अपने इसी कमरा नं० ३२ में शाम चार बजे

चाय शुरू होने के समय तक पड़ी रहती। दूसरे पलँग  पर बिफरी पड़ी सिल्क साड़ी उसकी नियति पर मुस्कुराती

या फिर उसकी मूर्खता पर ठहाके लगाती। हद हो गइर्, मैं तो फर्स्ट फ्लोर पर जाने की बजाऐ छत के दरवाजे

तक पहुँच  गई। अपनी मूर्खता पर वह खिसिया गई।एक बार फिर अपने कमरे तक जाने के लिऐ  सीढ़ियाँ

उतरने लगी। एक मंजिल तक उतर कर वह बायीं ओर मुड़ी।

एक लंबा सूना बरामदा। मानों उसी के इंतेज़ार  में जागता हुआ-सा लग रहा था। उसका कमरा सामने ही था,

दायीं ओर। कमरे से बाहर आती चालीस वाट के बल्व की रौशनी  को देख उसने अपने क़दमों की गति धीमी

की। इस कमरे तक आते-आते उसके क़दम ही नहीं ज़िन्दगी तक थम कर रह गई है। फिर भी वह उसकी ओर

बढ़ती गई। कमरे के बाहर कोई हलचल नहीं, कोई उत्साह नहीं। एक़दम अन्त में बने इस कमरे के आगे अगर

कोई दुनिया है तो वह आठ बाथरूम, आठ शौचालय और एक अदद कॉमन वाटर टैप की ।इन सबके सामने

आते ही उसे अपने क़दम आखिर न चाहते हुऐ  भी रोक देने ही पड़ते हैं।फिर इतवार की रात है। कमरे में

घुसना उसकी नियति जो है। सो हमेशा की तरह अपने समस्त विचारों को झटक एक अजीब-सी दिखावटी

झटकेदार तर्ज़ में वह बिना खटखटाऐ कमरे में घुस ली है। एक नई लड़की सामने वाले बेड पर बैठी होगी, वह

जानती है। पहले ही क्षण उसे डरा देने का उसका सही तरीका था। लड़की सचमुच सामने बैठी थी।

‘हैलो’, सामने वाली लड़की सकुचाते हुऐ  उठी।

‘हूँ । हाय, आपकी तारीफ़ ?’ नल्ली के स्वर में तेज़ी थी।

‘मैं.........मेरा नाम एस.आर. जयन्ती नटराजन है। मेरा मतलब स्याली रामामृत जयन्ती नटराजन।’ अपनी चौड़े

बार्डर वाली कांजीवरम् पट्टू ;सिल्कद्ध साड़ी को ठीक करते हुऐ  उसने कहा।

‘और आपका ?’ वह आगे पूछ बैठी।

‘मेरा ? ......क्या करोगी मेरा नाम जानकर तुम। बस इतना जान लो कि मेरे बारे में कुछ भी जानने की, तुम्हें

ज़रूरत  नहीं है। फिर, तुम मेरी रूममेट हो, मैं तुम्हारी नहीं। ठीक है ? यह कमरा तुम्हारा नहीं, मेरा है

इसलिऐ  प्रश्न केवल मैं पूछ सकती हूँ तुमसे, तुम नहीं। समझी ?’

‘जी, वार्डन ने मुझे पहले ही सब कुछ......।’

‘वार्डन ने ? क्या बताया तुम्हें वार्डन ने ?’ कहते हुऐ  नल्ली ने अपनी घबराहट तेज़ स्वर तले दबा दी।

‘कुछ नहीं ,  यही कि मुझे आपकी मर्ज़ी के हिसाब से ही इस कमरे में........।’

‘अच्छा-अच्छा, फिर ठीक है।’ कुछ आश्वस्त - सी होती हुई अपनी उसी ढीली सेंडिल को बिना खोले पैर को

उछाल कर उसे पलँग  के नीचे फेंकते हुऐ  नल्ली बोली।

‘आप विश्वास कीजिऐ आपको मेरी वजह से कोई तक़लीफ नहीं होगी।.......अगर आप वार्डन से मुझे यह बेड

परमानेन्ट देने की सिफारिश.......।’ जयन्ती अटकते हुऐ  बोली।

‘शटअप, इट इज़ इमपॉसिबल।’ वह चीखी।

समय के थपेड़ों ने या फिर एस.पी. और डी.एस.पी. की संगति ने नवीं फेल नल्ली को अंग्रेजी बोलकर दूसरों

पर हावी होना सिखा दिया था।

कुछ क्षण के लिऐ  दोनों चुप हो गई। कुछ सोच नल्ली फिर बोली,‘कहाँ की रहने वाली हो ?’ पूछने का अंदाज़

अभी भी झटकेदार था।

‘यहीं की।’

‘यहीं की ? मतलब मद्रास की ?’

‘नहीं, मेरी माँ का घर तो स्याली गाँव में है लेकिन.....’

ख्

‘और पति........?’

‘जी पति......।’ जयन्ती कुछ सहम सी गई।

‘अच्छा-अच्छा ठीक बताने की ज़रूरत  नहीं। तुम्हारे जैसी चमक-दमक कर रहने वाली औरतों के चेहरों की

उतरती लकीरों पर चढ़ना उनको पढ़ना और उन पर से उतरना बख़ूबी जानती हूँ मैं। खैर.......यहाँ कैसे आना

हुआ ? पहली बार होस्टल में आई हो या फिर पति ने बहुत पहले ही घर से निकाल दिया ? नई शादीशुदा

लगती हो ?’

‘जी, इससे पहले मैं कोडम्बाक्कम के एक होस्टल में रहती थी। वहाँ का मील्स......।’ जयन्ती ने सफ़ाई देनी

चाही।

‘मुझे समझ नहीं आता तुम्हारी जैसी लड़कियाँ घर से निकल कर या निकाले जाने के बाद मील्स की तरफ़

ध्यान कैसे दे पाती हैं........? मुझे देखों, मैंने तेा आज तक ये कभी नहीं देखा कि मैं क्या खा रही हूँ । बस

खाती हूँ क्योंकि खाना है। जीती हूँ क्योंकि जीना है।’ नल्ली का बोलना जारी था ।

‘.........पर देख, ऐ लड़की, क्या नाम है तेरा ? हाँ, जयन्ती। देख जयन्ती, मैं तेरे से हर तरह से बेहतर हूँ। तेरे

आदमी ने तुझे छोड़ दिया होगा। पर मेरे घरवाले ने मुझे छोड़ा नहीं है। न कभी छोड़गा। हफ्ते में दो दिन, दो

रात साथ रखता है मुझे। एक पति का अपनी पत्नी को इतना समय दे देना क्या काफ़ी नहीं हैं?’

जो ज्यादा बोलते हैं अक्सर झूठ की हिफ़ाजत के लिऐ  । यह बात जयन्ती अच्छी तरह जानती थी, इसलिऐ

बस सुने जा रही थी, जो कुछ नल्ली बोल रही थी। पर अपने पति नटराजन को लेकर कुछ भी सुनना अब

उसे बर्दाशत नहीं था, सो पूछ बैठी, ‘तो फिर आप क्यों होस्टल में रहती हैं?’

‘शटअप, तुम कौन होती हो, मुझसे ये पूछने वाली......? मैंने कहा न, ये कमरा मेरा है यहाँ सिर्फ़  मैं  बोलती

हूँ, दूसरी लड़की को बस सुनना होता है और सहना होता है ।

‘जी’ । जयन्ती एक बार फिर डरते हुऐ  बोली - बीच-बीच में वह नल्ली के उस घटिया तरीक़े से लिपेपुते चेहरे

को विशेष रूप से ताके जा रही थी। शायद ज़रूरत से ज्यादा बोलने का कारण भी वह ढूँढना चाह रही थी।

‘जी-जी, क्या लगा रखी है। अच्छा लाइट बंद करो और सो जाओ। बारह बजने वाले हैं.....रूको मैं पहले कपड़े

बदल लेती हूँ।’

‘मैं लाइट बंद कर देती हूँ तब कपड़े बदलिऐ ।’ जयन्ती नहीं चाहते हुऐ  भी उससे बोली। यूँ तो उसने सोच लिया

था कि वह अब इस घटिया औरत से बात नहीं करेगी।

‘तुम फिर बोली ?........मुझे पूरी लाइट में किसी के भी सामने कपड़े बदलने की आदत है। मर्दों के सामने भी

?’ जयन्ती कुछ बोलती इससे पहले ही नल्ली ने आधी खुली कीमती साड़ी को उतार कर दूसरे खाली पड़े

खाली बेड पर फेंक दिया। नीचे सेंडिल, ऊपर बिखरी पड़ी साड़ी देखकर जयन्ती मुस्काई पर दूसरे ही क्षण

अचंभित हो गई, जब उसने देखा कि नाईटी की डोरियाँ बिना बाँधें नल्ली ने ज्यों ही पर्स रखने के लिऐ  ताला

लगी अलमारी खोली, रूपयों की कई गड्डियाँ धड़ाम-धड़ाम नीचे गिरने लगी।

‘देख क्या रही हो, अपना काम कर।’ मुँह मोड़कर बैठी किन्तु कनखियों से सब कुछ देख रही जयन्ती पर वह

चीखी। गड्डियाँ जल्दी-जल्दी समेटकर अपने उसी रेशमी बिस्तर पर धम्म से लुढ़कते ही वह ज्यों ही बिस्तर

पर लेटी स्प्रिंग तेजी से चूँ-चूँ करने लगे। जयन्ती फिर मुस्कुराई लेकिन नल्ली ने करवट ले ली।

थोड़ी देर यूँ ही बैठी रही जयन्ती ने लाइट बंद की और बिना कुछ बिछाऐ खाली बेड पर धीमे से लेट गई।

बिछाती क्या ? कुछ था ही नहीं उसके पास बिछाने को। सब कुछ तो छोड़ आई थी वह अपनी छोड़ी हुई

ससुराल में।.....। तब से यूँ ही बिना बिस्तर के ज़मीन पर चटाई बिछाकर पिछले कई बरसों से वह सोती आ

रही है । जयन्ती की आँखों में अभी नींद कहाँ ?वह सोच रही है । रात के गहराते ही वह अपना नया दिन

शुरू करती है। बस इंतेज़ार  होता है तो रूममेट के सोने का।

लेकिन फिर सुबह उसे जिस रूप में सबके सामने आना पड़ता है, वह क्या उसकी मूर्खता है? दुनियावादी

वर्जनाऐं.....मर्दों की वासनापूर्ण नज़रें.......और तो और नटराजन के प्रति अपनी आस्था की रक्षा के लिऐ  भला

और कौन-सा कवच वह धारण करती ? सोचते-सोचते वह उठी और गले में पड़ी पीले धागे की ताली

;मंगलसूत्रद्ध को अलमारी में रख, सूटकेस में से सफ़ेद  साड़ी ढूँढने  लगी। सोने से पहले नहाना, जयन्ती नहीं

भूलती थी। देखते ही देखते वह गहरी नींद में आ गई।

अगरबत्ती और ताज़े मोतियों के फूलों की गंध से अचानक नल्ली की नींद जब खुली तो जयन्ती के खुले बिखरे

धुले बालों से उस समय पानी टपक रहा था। कमरे में फैले उस अजीब से सूनेपन से काँप कर नल्ली बिस्तर

से उठ बैठी। कोने वाली खिड़की से आती चाँद की रौशनी  में कमरे की हर चीज़ उसे बेहद साफ दिख रही थी।

उसने देखा सफ़ेद  साड़ी में पानी टपकते बाल खोले कोई लाश मानों पसरी पड़ी है। वैधव्य की साक्षात् प्रतिमा,

बड़प्पन के बोझ को ढोती एक पतली दुबली छरहरी युवती।

जयन्ती गहरी नींद में थी। सफ़ेद  साड़ी, सूनी धुली  माँग, कोरा शून्य मस्तक, नाक, कान, गला ही नहीं हाथ

तक भी खाली। नल्ली कुछ समझ नहीं पा रही थी । घड़ी देखी। रात के तीन बजे थे। उसे लगा जयन्ती के

चेहरे पर छाई मासूमियत उसके भीगे ललाट पर बिखरे तेज के साथ द्वन्द्व में है।

‘अभागी..........सामान के नाम पर एक सूटकेस के अलावा कुछ है ही नहीं। देखूँ, अलमारी में क्या है ?

........सोचते हुऐ  उसकी खुली पड़ी अलमारी की तरफ़  बढ़ने की बजाय पलँग  के नीचे पड़े अधखुले सूटकेस को

उलटने-पलटने लगी। चार कांजीवरम् की सिल्क साड़ी और चार सफ़ेद  साड़ियाँ। ये कैसा विरोधाभास? अचानक

उलटने-पलटने पर हाथ लगी डायरी को वह ज्यों-ज्यों पढ़ती जाती, पति नटराजन के प्रति जयन्ती की आस्था

का एक अजीबोग़रीब रूप उसके सामने उभरने लगा।

कभी-कभी कई साल एक रात में सिमट जाते हैं और वह रात एक रहस्य बन जाती है। साल-दर-साल लंबी

रात खत्म होने को ही नहीं आ रही थी।

अब वह उसकी अलमारी की तरफ़  बढ़ी। इस बेधड़क खुली पड़ी अलमारी के मुकाबले, बड़े से ताले से बंद की

गई अपनी अलमारी नल्ली को पता नहीं क्यों बेहद बौनी लग रही थी। बीच के खाने में सामने रखी उस

ख़ूबसूरत  नौजवान की तस्वीर और उस पर टँगी मोतियों के ताज़े  फूलों की माला और आधी जल चुकी

अगरबत्ती........।

बस सब कुछ अजीब....। उसे लगा एक विस्तृत आस्था उसकी आँखों के सामने सफ़ेद  साड़ी में लिपटी करवटें

बदल रही है। इतनी विराट आस्था, वह भी एक मृत व्यक्ति के प्रति। और मेरी आस्था......? वह क्या मात्र

एक.....? नहीं, वह कोई ढकोसला नहीं है। ढकोसला तो ये कर रही है। मेरी आस्था एक जीवित व्यक्ति के

प्रति हैं। भले ही......। कुछ भी हो, इसकी आस्था में....। उसे अपनी आस्था के बंधन कुछ ढीले होते लगे।

जयन्ती अपने को धोखा दे रही है। लेकिन मैं ......... ? मैं तो आज भी मुत्तुस्वामी से उतना ही प्यार......।

उसने अपने गले में पड़ी ताली को टटोला, चूमा।

वह कुछ आश्वस्त हुई। उसकी नज़र एक बार फिर अलमारी में जल रही अगरबत्ती के पास रखी जयन्ती की

ताली पर पड़ी। इसका मंगल सूत्र ;तालीद्ध रोज़ रात को उतरता है, लेकिन मेरा ? हर शुक्रवार की शाम पाँच

बजते ही उस हॉर्न के तीन बार बजने के साथ ही वह उसे कसकर जकड़ लेती है उसे उतारने के आंतक के

साथ ही। होस्टल के गेट से बाहर आते-आते वह उसे फिर निहारती, चूमती है। इससे पहले कि कॉन्टेसा के

काले शीशे नीचे हों और काले चश्मे में से दो आँखें उसे घूरें, उसे अपना मंगलसूत्र झट से उतार कंधे पर लटके

उस पर्स की किसी जेब में घुसा देना पड़ता है और कॉन्टेसा फिर उसी माऊँट रोड पर हवा से बातें करने लगती

है।सवा घण्टे के भीतर कार एस.पी. की कोठी के गेट के सामने और वह ख़ुद  एस.पी. के सामने.......उसके

निजी कक्ष में। एक विवाहिता का अविवाहित दिखने और चीप टाइप औरत होने में जितना समय लगता है

बस उतना ही समय लगता था नल्ली को। मुत्तुस्वामी ने ठीक कहा था-चीप टाइप घटिया औरत। एस.पी. की

नज़रों में वह एक मात्र एक अविवाहित लड़की..........चीप टाइप औरत नहीं तो और क्या है? लेकिन मुत्तुस्वामी

की नज़र में भी वह क्यों चीप टाइप औरत है, वह इसका कारण आज तक समझ नहीं पाई।

नल्ली ने एक गहरी साँस छोड़ी और एकबारगी पता नहीं क्यों जयन्ती को बहुत प्यार से निहारने लगी।

अलमारी बंद कर जयन्ती की डायरी उसने फिर से सूटकेस में रख दी, उसी जगह सफ़ेद और रंगीन सिल्क की

साड़ियों के नीचे।

दरअसल जयन्ती अब उसके लिऐ  एक रहस्य थी, एक ऐसा रहस्य जिसने नल्ली की अपनी आस्था-उसकी

आत्मा तक को हिला कर रख दिया। उस पहली रात नल्ली ने जयन्ती की आस्था को अपनी आस्था के

मुकाबले खड़ा पाया तो पता नहीं क्या सोच वार्डन से यह बेड परमानेंट जयन्ती को दिलवाने के लिऐ  सिफ़ारिश

करने का मन उसी समय बना लिया।

जयन्ती के साथ नल्ली को रहते पूरे दो साल बीत गऐ  थे। आश्चर्य! किसी के भी साथ तीन दिन से अधिक

समय न बिता पाने वाली नल्ली, आखिरकार कैसे जयन्ती के साथ पूरे तीन साल बिता गई, सोचकर नल्ली

स्वयं हैरान थी।

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

मरीना बीच। जयन्ती के विशेष आग्रह पर नल्ली आज दूसरी बार मरीना बीच घूमने आई है। पहली बार वह

यहाँ मुत्तस्वामी के साथ आई थी। वह स्वयं क्या से क्या हो गई ? लेकिन मुत्तुस्वामी और यह समुद्र। बिल्कुल

ज्यों के त्यों।

समुद्र की लहरे अठखेलियाँ करती हुई कभी नल्ली को तो कभी जयन्ती को छूने को आतुर हो उठती थीं।

रोज़ की तरह उस शाम भी दूर-दूर से आए पर्यटकों ने मद्रास महानगर की इस रेतीली सीमा रेखा के विशाल

पटल पर कुकुरमुत्तों की-सी गति लिऐ  उगना शुरू कर दिया था। रेत के बने, एक नहीं अनेक महल दूर-दूर तक

उन दोनों को दिख रहे थे। एक लहर आती ओर रेत का मन्दिर, घर,महल न जाने क्या-क्या कहाँ लुप्त हो

जाता। नल्ली और जयन्ती हँसतीं  और खूब हँसतीं । ताली बजा-बजा कर, उछल-उछल कर। पर पता नहीं क्यों,

अचानक जयन्ती का मन आज बहुत भारी होने लगा है। नटराजन उसे बहुत याद आ रहा है।

‘नींगल पातेदिल रोम्बो संताषम् ;आपसे मिलकर बेहद ख़ुशी हुईद्ध नटराजन से जब वह पहली बार मिली तब

नटराजन ने उससे यही कहा था। यही वह क्षण था जब उसकी आत्मा नटराजन के प्रति पूर्ण समर्पित हो गई

थी।

‘नटराजन क्या सचमुच तुम मुझसे ........? क्या तुमने मुझसे पहले किसी और से कभी इस रूप में

प्यार..........?...........हाँ जया, तुम मेरा पहला प्यार हो। तुमसे पहले मैंने कभी किसी लड़की के बारे में सोचा

भी नहीं।’

‘तो फिर हमारी शादी धूमधाम से होगी ? तुम्हारे माता-पिता, घरवाले भी शादी से ख़ुश   होंगे न ?

‘नहीं जया, मैं बिल्कुल सादे ढंग से शादी करूँगा।’ कोई रिश्तेदार हमारी शादी में नहीं बुलाया जाऐगा। लेकिन

तुम्हारे माता-पिता तो पसंद करते हैं न मुझे ?’

‘नहीं नटराजन, मुझे तुमसे शादी, रात के अँधेरे में नहीं, दिन के उजाले में ही सही, पर अपने पिता का घर

हमेशा-हमेशा के लिऐ  छोड़कर करनी होगी। मतलब घर से भागकर। फिर जब तुम मेरे साथ हो तो इन बातों

का मेरे लिऐ  कोई अर्थ यूँ भी नहीं है।’

बेहद सादी रीति से कल्याण मण्डपम् की छाया तले उन दोनों का विवाह हो गया था। कहीं इसलिऐ  तो नहीं

कि नटराजन की पहली.........।

नटराजन के घरवालों तक ने नहीं बताई यह बात.....। क्यों बताते? बेटे का घर बसता है तो बुरा क्या है

?बस डर था तो पहली......।

‘मैं रहूँ  न रहूँ  जया, तुम्हें हमेशा सधवा बन कर रहना होगा। मेरे लिऐ , अपने नटराजन के लिऐ । वरना मेरी

आत्मा तुम्हें कभी.....।’ नटराजन ने उस पहली ही रात जयन्ती से जब कहा तो जयन्ती ने बात पूरी होने से

पहले ही उसके मुँह को हथेली से ढक दिया था। फिर कुछ सोचकर आगे बोली -

‘ये कैसे संभव है नटराजन, एक औरत के लिऐ , वह भी उसके लिऐ , जिसका पति.........?’

‘क्यों संभव नहीं है ?’ नटराजन पूछ बैठा। ‘फिर किसी का’........वह आगे बोला। ‘‘कोई अधिकार नहीं कि एक

औरत से लोग मात्र एक आदमी के लिऐ  उसके सजने – सँवरने का अधिकार छीनें। ....................और फिर

देख नहीं रही हो इस समाज को ? विधवा और परित्यक्ता सोसायटी में कैसा स्थान पाती है ? और सधवा ?

मजाल क्या कि कोई पुरूष उसकी ओर आँख उठाकर......। पर शर्त यह है कि सुहाग चिह्न सामने दिखने

चाहिए, शरीर के हर हिस्से पर दूर से ही.......।’’ कहते हुऐ  नटराजन उस दिन उसके गले में लटकी ताली को

अन्दर से निकाल साड़ी के ऊपर करने में व्यस्त हो गया था, यह देखना भूलकर कि इस बात को सुनकर

जयन्ती के चेहरे पर शर्म की ललाई का स्थान एक अज्ञात चिन्ता ने ले लिया है। सो पूछ बैठी - ‘मगर तुम्हारे

बिना इस मंगलसूत्र को पहनने का क्या अर्थ ?’

‘‘अर्थ ? अर्थ तो हमे स्वयं खोजने होंगे। हमें अपने जीवन मूल्यों को बदलना होगा जयन्ती। एडवोकेट होने जा

रही हो, समय आने पर इतना भी स्टैंड नहीं ले सकती ?.......अच्छा छोड़ो, मैं तुम्हें अपनी एलबम दिखाता हूँ।

पर देखो, होशियार रहना इसमें एक बम है, विस्फोट होगा। कहीं इसमें तुम्हारी सौतन न हो।’’ और फिर पता

नहीं कब वे दोनों उस मोटी-सी एलबम को देखना शुरू करने से पहले ही हँसते-खिलखिलाते नींद की गहरी

वादियों में खो गऐ  थे।

‘पोगों-पोगों’, ;चलो -चलो आगे बढ़ो द्ध किसी ने पीछे से कहा जो जयन्ती मानों उसी गहरी नींद से जागी हो।

वह कुछ सहम-सी गई। देखा, नल्ली दूर रेत में अकेली बैठी टीला बना रही है।

‘चलो अक्का, आगे चलते हैं।’ जयन्ती अब नल्ली को बड़ी बहन मानकर ‘अक्का’ कहने लगी थी।

‘नहीं डर लगता है।’ रेत में कठोरता से पाँव धँसा, नल्ली पहली बार यहाँ आने पर मुत्तुस्वामी से इसी तरह

बोली थी।

‘मेरी बाँह कस कर थाम लो....। और फिर नल्ली ने मुत्तुस्वामी की वह बाँह सचमुच थाम ली थीं

‘कितना भयानक होता है न, समुद्र ?’ जयन्ती ने आगे पता नहीं क्यों कह डाला ?

‘हाँ, मेरे और तुम्हारे जीवन से ज्यादा नहीं।’ नल्ली कहना चाहती थी पर चुप रही। अनायास पता नहीं उसे

क्या हुआ, जयन्ती की बाँह छोड़ वह अकेली ही दूसरी तरफ़  बढ़ ली।

जयन्ती समझ तो रही थी। यूँ तो नल्ली ने कभी उसे अपने बारे में नहीं बताया था, पर हर शुक्रवार को

होस्टल के गेट पर आने वाली काली कॉन्टेसा और उसका रंग-ढंग देखकर शुरू से ही समझ गई थी। दलदल में

फँसी, अतीत की स्मृतियों में गहरे डूबते देख नल्ली से उसने कुछ कहना ठीक नहीं समझा, और रेत में से

सीपियाँ ढूँढने में व्यस्त हो गई।

दो साल, छः महीने। बस दो साल छः महीने लगे मुत्तुस्वामी के नाम की ताली को नल्ली के गले में आने और

गले से उतर पर्स के किसी कोने में पहुँचने में। मात्र पन्द्रह बसन्त देख चुकी नल्ली को अपने सपनों का यह

राजकुमार कोडैकैनाल की उन ख़ूबसूरत  वादियों में घोड़े पर सवार नहीं बल्कि नागार्जुन थियेटर के बाहर ब्लैक

में टिकट बेचता हुआ पहली बार मिला था। स्कूल में आते-जाते पता नहीं किन परिस्थितियों के रहते गले में

रूमाल बाँधे उस गलीच से अपनी उम्र से पाँच वर्ष अधिक आयु के युवक को वह उभरती कन्या चाहने लगी

थी। दो साल के भीतर मुत्तु ने नल्ली को अपनी माँ के जेवर चुराकर कोडैकैनाल से मद्रास भाग आने के लिऐ

राज़ी कर लिया था। पार्थसारथी कोविल ;मन्दिरद्धके उस प्रांगण में यूँ ही खड़े - खड़े मुत्तु के हाथों उस पीले

धागे वाली ताली ;मंगलसूत्र द्धके बँधते ही ऐसा क्या हो गया कि...........?

तीन साल बीत गऐ  और नल्ली अट्ठारह की हो चली। इन तीन सालों में ताली बाँधने का अर्थ मुत्तुस्वामी के

लिऐ  भले कुछ भी रहा हो पर नल्ली के लिऐ ........। नल्ली उस मंगलसूत्र को छाती से चिपका कर रखने में

अजीबोग़रीब सुख का अनुभव करने लगी थी। शायद इसीलिऐ  नल्ली के पैरों तले की ज़मीन उस रोज़

कँपकँपाई ज़रूर थी, पर खिसकी फिर भी नहीं थी, जिस रोज़ उसने जाना कि ब्लैक टिकट बेचने का धंधा कब

का छोड़ चुका आठवीं फेल उसका पति, अब अवैध लाटरी बेचने और सफ़ेदपोश अफसरों तक लड़कियाँ पहुँचाने

का नया धंधा करने लगा है।

उसके मानसिक दुःखों का अंत अभी नहीं हुआ था। सास के जेवर बेच-बेचकर अब तक घर का ख़र्चा चला रहे

मुत्तुस्वामी की अस्थाई प्रवृत्ति में स्थाई नौकरी पाने की इच्छा पता नहीं कहाँ से और क्यों कर बलवती होने लगी

और इसी प्रवृत्ति के रहते कहीं से मैं ट्रिक का जाली सर्टिफिकेट प्राप्त कर लिया । ढील ढौल तो अच्छा था ही

सो, पुलिस जैसे महक़मे में हवलदार की नौकरी पर चुन लिया गया।

‘चलो, अक्का, अब लौट चलें।’ जयन्ती ने विचारों में डूबी नल्ली के कंधे पर हाथ रखकर कहा तो नल्ली कुछ

संयमित होकर बोली, ‘नहीं अभी जी नहीं करता। इस बीच उसका ध्यान सामने की ओर गया। एक विराट

समुद्र। अनायास उसे लगा एक भयानक लहर उसकी ओर तेज़ी से बढ़ गई। वह एक बार फिर डर गई उसके

डर को कुछ हद तक कम करने के लिऐ  ही सही, पर जयन्ती बोल पड़ी, ‘देखो अक्का, कितनी सुन्दर, सतरंगी,

सीढ़ीदार लहर.........’ नल्ली के मुख से किसी प्रकार का उत्तर न पाकर वह आगे फिर बोली, ‘बिल्कुल मेरी और

तुम्हारी तरह। है न ?’ और फिर खिलखिला पड़ी।

‘हाँ ठीक कहती हो’ नल्ली ने लम्बी साँस खींचते हुऐ  कहा। ‘दूर-दूर तक बिखरी हुई........छोर का कहीं अता-

पता नहीं।’ उसने अपनी बात पूरी की थी।

‘नहीं अक्का, नहीं दूर-दूर तक बिखरी हुई, छोर का कहीं अता-पता नहीं, फिर भी कितनी अनुशासित, अपनी

- अपनी आस्था के प्रति नतमस्तक।’

‘आस्था, कैसी आस्था और किसके प्रति......मैं कुछ समझी नहीं।’ नल्ली अब तक सँभल गई थी।

‘बनने की कोशिश मत करो अक्का, मैं सब कुछ जानती हूँ और रही बात आस्था की, तो लहर की आस्था

समुद्र के प्रति , और क्या ?’ जयन्ती ने मानों बात को उड़ाते हुऐ  कहा।

‘लहर, आस्था, समुद्र, ये सब तो ठीक है जयन्ती, पर नटराजन ? वह.....क्या तुम्हारे जीवन का सत्य नहीं,

ऐसा सत्य जो असत्य का लबादा ओढ़े है। अगर नहीं कहो ,तो जानूँ।’

नल्ली आगे पता नहीं क्या कहती रही,जयन्ती ने सुनना नहीं चाहा।

‘वन्नै प्लेट अंज रूबाय, रैण्ड प्लेट येट्ट रूबाय।

ओर ओ इरम पार वइले,

उन पर वययई नान अरिवेन..........उन कालड़ी..........।

दूर एक ठेले पर, एक मुछआरे को मछली के पकौड़े बेचते और गीत सुनकर जयन्ती का ध्यान टूटा। उसने

देखा, नल्ली चुपचाप खड़ी दूर तक उस गहरे नीले सागर को घूरे जा रही है। शायद उसका किनारा खोजने की

कोशिश कर रही है। लहरें आतीं और नल्ली को भिगोकर लौट जाती। नल्ली थी कि अपनी जगह से हटने को

तैयार ही नहीं थी।

‘क्या हुआ अक्का ? तुम नहीं डूबोगी। मैंने तुम्हें पकड़ जो रखा है।’ बात का रूख पलटते हुऐ  जयन्ती नल्ली

का हाथ पकड़ बोली।

नहीं री। मैं डूब चुकी हूँ बहुत गहरे। इतना गहरे कि अब पार पाना भी मुश्क़िल है। बोलो, कहीं दिखता है तुम्हें

इन लहरों का किनारा ?’ लम्बी साँस  खींचते हुऐ  नल्ली ने कहा।

पर अक्का, मुझे देखो, मैं नहीं खड़ी क्या ?’

‘हाँ तुम खड़ी हो। पता नहीं कैसे इन वर्जनाओं के सागर में ? पर मैं.........मैं दुनिया की नज़र में भले ही......।

पर अपनी ही नज़र में........?’

‘अच्छा छोड़ो अक्का, तुम भी पता नहीं किन चक्करों में अटक गई ? वह देखो मछली के गरमागरम पकौड़े।

चलो खाते हैं। मुझे तो बड़ी भूख है। चलो न.......।’

‘उफ ओ, चल तो रही हूँ। खींच क्यों रही हो ? फिलहाल ऊपरी-सी अटकती हँसी हँसते हुऐ  नल्ली बोली।

‘ओर आ इरम......’ मछुआरे की आती आवाज़ की दिशा में वे दोनो चलने को हुई। इतने में अचानक एक तेज़

लहर फिर आई और दोनों को ऊपर तक भिगो गई।

‘लहर लौटी तो जयन्ती पैरों की तरफ़  देखकर कुछ चीखी-सी।

‘देखो अक्का ?’

‘अरी क्या हुआ ?’

‘देखो अक्का कितना बड़ा गड्ढा। हमारे पैरों का कमाल है। पता ही नहीं चला और समय की रेत न जाने पैरों

तले से कब खिसक गई।’

.........और शेष रह गया है एक विराट शून्य, पैरों तले ही नहीं, जीवन तले भी.........।’ जयन्ती ने मानों नल्ली

की बात पूरी करनी चाही।

‘क्या मतलब ?’ नल्ली पूछ बैठी।

‘हाँ अक्का......। जयन्ती नल्ली से सब कुछ कह देना चाहती थीं पर कुछ सोचकर चुप रही।

‘जयन्ती, क्या हुआ तुझे ?चुप क्यों हो गई ? पकौड़े नहीं खाने है क्या ?’ कहते हुऐ  नल्ली अबकी बार जयन्ती

को खींच रही थी।

‘ओर आ इरम......’ मछुआरा अभी भी गीत गाने में व्यस्त था। साँझ हो चली थी शायद इसीलिऐ  इक्का-दुक्का

लोग ही वहाँ केले के पत्ते पर पकौड़े खा रहे थे।

‘ओं थम्बी।’ जयन्ती अब तक कुछ सँभल गई थी।

‘वांगो-वांगो, ;आइऐ आइएद्ध मेमसाब, एक़दम ताज़ी मछली है। अभी-अभी उस सामने वाले किनारे से पकड़ी

है।’

‘रैण्ड प्लेट कुडि ;दो प्लेट दोद्ध ’ जयन्ती ने कहा तो नल्ली ने देखा कि ठेले के पास ही बेंत के गलीच से

बदबूदार टोकरे में कुछ दस-बारह छोटी-छोटी मछलियाँ तड़प रही है।

‘सॅरि ;ठीक हैद्ध मेमसाब।’ कहते हुऐ  मछुआरे ने देखते ही देखते एक तड़पती मछली को झटके से उठाया और

बर्तन में घुले बेसन में लपेटकर खौलते तेल की कढ़ाई में डाल दिया। नल्ली को पता नहीं क्या हुआ यह दृश्य

देखकर वह चीख उठी। उसे लगा कि मछली अभी भी तड़प रही है। एस.पी. का बेडरूम और वह........।

‘क्या हुआ अक्का ?’ जयन्ती, नल्ली के पीले पड़ गऐ  चेहरे को देखकर डर-सी गई। पर फिर भी उसे समझते

देर नहीं लगी।

ऐ थम्बी, अक्ल नहीं है क्या ? कोई दिल है कि नहीं? क्या ज़रूरत  है ज़िन्दा मछली के........।’

‘पौ-पौ ;जाओ-जाओद्ध मेमसाब, तुम क्या जानो ज़िंदा  मछली के पकौड़े खाना ? मरी मछली का पकौड़ा

खाया भी तो क्या । ये ज़िंदा  मछलियाँ तो सिर्फ़  मर्दों के खाने की चीज़ है।’

‘तुम क्या जानो उस औरत का दर्द ?’ कहना चाहते हुऐ भी जयन्ती ने तेज़ी से, ‘हूँ’ किया और नल्ली के पीछे

भागी। उसने देखा नल्ली रेत में पैर धँसाती अपनी शक्ति से कहीं ज्यादा तेज़ भाग रही है। साड़ी पैरों में

फँसती, वह गिरने को होती। फँसती साड़ी से पैर खींच, लुढ़कती -पटकती वह जितना तेज़ चल सकती थी,

चली।

एम.जी.आर. की समाधि के सामने से निकलती उस चौड़ी व्यस्त सड़क से अन्ना नगर के लिऐ  उन दोनों ने

बस पकड़ ली। दोनों चुप थीं। बस तेज़ी से अपने गतव्य की ओर दौड़े जा रही थीं। नल्ली का चेहरा अभी भी

सामान्य नहीं हो पा रहा था। जयन्ती ने इस समय कुछ बोलना ठीक नहीं समझा। आखिर कहीं एक पीड़ा वह

भी तो अपने अंदर समेटे है।

सब कुछ खत्म हो गया था उस दिन । जिस दिन एक ट्रकवाला सड़क के किनारे वाली उनकी कोठी के गेट के

सामने, देखते ही देखते गेट में मोटर साइकिल पर घुसते नटराजन को कुचल गया था। फिर भी वह रोई नहीं

थी। रोती कैसे ? नटराजन ने उसे पहले से ही मानसिक रूप से विधवा होने के लिऐ  तैयार जो कर दिया था।

‘अरी नासपीटी, रोती भी नहीं। पति मर गया है और तू है कि ताली अभी तक गले में लटकाऐ बैठी है ।

पिछली भाग गई इसकी गंभीर बीमारी देखकर और तू.........तूने तो उसे ही भगा दिया अपनी ज़िन्दगी से।

कुलच्छनी, सब तेरे ही फूटे भाग से हुआ है।’ अन्तिम दो वाक्य जयन्ती की सास, न चाहते हुऐ  भी दिल में ही

बोली, ‘‘उतार इसे.....इन चूड़ियों को.........ये सिल्क की लपेटी साड़ी, तेरा क्यों न क़फन बन गई ?’’’वह आगे

चिल्ला रही थी।

‘ख़बरदार , जो किसी ने मेरे शरीर और इसकी किसी भी चीज़ को हाथ लगाया तो.......। ख़ून पी जाऊँगी एक-

एक का।’ उसने अपने को कमरे में बंद कर लिया था। करीब चार घंटे बाद सूजी आँखें लिऐ  दुल्हन-सी सजी

वह कमरे की दहलीज़ पर खड़ी थी। एक पल को तो सारे नाते-रिश्तेदार डर गऐ  पर उसकी सास का एक

इशारा मिलते ही पति की तेरहवीं होने से पहले ही जयन्ती को धक्के देकर घर से बाहर कर दिया गया था।

पर ताली ? ताली उसने किसी को भी छूने नहीं दी थी।

चार सिल्क की साड़ियाँ, नाराज़ पिता की नज़रों से बचाकर शादी के समय माँ के हाथों मिले पाँच हजार

रूपये, अपनी निजी डायरी और अभी तक अनदेखी वही मोटी - सी एलबम के साथ अपने सुहाग के समस्त

सामान को सहेजती, पिता के घर जाने की बजाय, पता नहीं क्या सोच, कोडम्बाक्कम के उस पुराने होस्टल

की तरफ़  मुड़ चली थी। एक हफ्ता रही उस होस्टल में। फिर उसके बाद से इस अन्ना नगर के हॉस्टल में है।

‘मैंने तुमसे प्यार किया है, सिर्फ़  तुमसे......। तुमसे पहले किसी लड़की.....।’ नटराजन के कहे शब्द अभी भी

उस दिन उसके कानों में गूँज रहे थे और उसी क्षण पूरा जीवन उसी की यादों के सहारे.....।बस तब से आज

तक दिन के प्रकाश में नटराजन के विश्वास की रक्षा करती और रात के अँधेरे में अपने वैधव्य से नियमित

साक्षात्कार करती आई थी वह ।

जयन्ती के मन की तरह बस भी भागी जा रही थी। जयन्ती नल्ली को गहरी सोच में पड़ा देख सोचने लगी।

पता नहीं किसके लिऐ , ये नल्ली ये सब कुछ कर रही है? नल्ली का चेहरा अभी भी पीला पड़ा हुआ था। वह

सड़क पर भागते खंभों को सूनी आँखों से ताके जा रही थी। कौन - सा पति, कैसा पति ? काली कॉन्टेसा के

नीचे खिसकते काले शीशों में से जब उसने मुत्तुस्वामी को होस्टल की खिड़की में से देखा तो उस दिन तो

एडवोकेट जयन्ती के पाँव तले की जमीन खिसक कर रह गई थी।न जाने अब तक कितनों की कोर्ट मैं रिज

करवा चुकी थी जयन्ती। उसे क्या पता था कि जिस मुत्तुस्वामी की उस काली -सी औरत से शादी वह करवा

रही है वह इसी नल्ली का पति है और तो और नल्ली ने एक दिन उसे बताया था कि मुत्तुस्वामी से उसकी

शादी की कोई तस्वीर कोई प्रमाण- पत्र तक उसके पास नहीं है। मुँह-अँधेरे किसी के गले में ताली बाँध देने से

क्या कोई उनकी शादी को मानेगा ? कानून तो सबूत माँगता है। अब इस मूर्ख को कौन समझाऐं ? मुत्तुस्वामी

दूसरी बीवी रखे मज़े से घूम रहा है और ये बेचारी उसी की आस्था से बँधी.........। इसी ऊहापोह के बीच बस

ने उन दोनों को अन्ना नगर पहुँचा दिया था।

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

सेन्नए वानोली निलयम ;यह आकाशवाणी चेन्नै है द्ध। यैट्ट मणि मुप्पद नीमिडम ;समय आठ बजकर तीस

मिनट द्धसुनते ही नल्ली की आँख खुल गई। देखा जयन्ती हमेशा की तरह कोर्ट के लिऐ  सुबह ही निकल

चुकी थी। मेज़ पर रखी खड़ी तीन खानों वाली थाली अब नीचे झूठी पड़ी थी। एक थाली ढकी रखी थी। ठंडे

हो चुके दो डोसे और साथ में पनीला साँभर। पास ही एक टिफिन में ठूँस -ठूँस  कर भरे हुऐ  लेमन राइस । आम

का आचार और कच्चे केले के छह-सात चिप्स। जयन्ती जाते-जाते उसके लिऐ  अक्सर ब्रेक फास्ट और लंच

इसी तरह मेस से लाकर रख जाती थी।

नल्ली के पेट में चूहे कूद रहे थे। होस्टल का यह खाना उसे बेहद बुरा लगता था पर पाँच दिन तो उसे यही

खाना होता था। दूसरी होस्टल मेट्स तो पास के रेस्टोरेंट से ख़ुद  ले आती थी, पर वह चाहकर भी होस्टल की

इस चारदिवारी से बाहर नहीं जा सकती थी। मुत्तुस्वामी के आदेश से वार्डन का उस पर सख़्त  पहरा जो था।

नहाने का उसका मन नहीं था, फिर भी बाल्टी, मग, साबुन, हल्दी की डिब्बी, तौलिया और कपड़े उठाकर

कमरे के पास बने उन्हीं आठ बाथरूमों में से एक में घुस गई। करीब एक घंटे तक खूब नहाई। समुद्री खारे

पानी से उसका शरीर चिपचिपाने जो लगा था। हल्दी-चन्दन का उबटन लगा उसका काला चेहरा भी दही की-

सी चिकनाई लिऐ  अब चमक रहा था।

बाल झाड़कर उसने अलमारी खोली और फिर पता नहीं क्या सोचा मुत्तु के साथ स्टूडियो में खिंचाई, सहेज कर

रखी एकमात्र फोटो को वह निहारने लगी। वह स्वयं भी नहीं जानती कि यह कैसी आस्था है जिससे वह बँधी

है। सोचते-सोचते आखिर तनाव की गहरी लकीरें उसके चेहरे पर फिर उभरने लगी।

उसे याद है उस दिन नल्ली पुलिस थाने में मुत्तु को गर्मागर्म भोजन से भरा हुआ टिफिन देने गई थी। एस.पी.

थाने का राउण्ड लेने आया था। उसने तभी मुत्तु से पूछा था, ‘मुझे पता चला है कि तुम्हारा सर्टिफिकेट जाली

है, बोल साले कहाँ से बनवाया है ?’

‘बचा लो साब, अब तो मेरी नौकरी आपके हाथों में हैं। किसी से मत कहना साब। मैंने फिजीकल टेस्ट तो पास

किया है । साब दौड़ता भी कितना तेज हूँ।’ मुत्तु एस.पी., टी.एन. पार्थसारथी से गिड़गिड़ाकर गुहार कर रहा था।

तभी एस.पी. की नज़र दरवाजे के पीछे से झाँकती काली, लेकिन तीखे नयन-नक्शों वाली नल्ली के माँसल

शरीर पर ऊपर से नीचे तक दौड़ गई। नल्ली सहम कर पीछे हट गई और टिफिन दरवाजे के पास ही नीचे

एक तरफ़  रख उल्टे पैर रख घर की ओर भाग गई थी।

‘ये कौन थी ? मुझे बस......।’

‘डेफिनेटली सर, मैं समझ गया सर। बिल्कुल समझ गया बिल्कुल कुँवारी  है सर। हमारे पड़ोस में रहती है,

पिता नहीं हैं। मुत्तु अपनी नवविवाहिता पत्नी नल्ली को लेकर एक के बाद एक झूठ बोले जा रहा था उसने

आगे कहा, ‘‘भाई के साथ रहती है। भाई का ट्रांसफर होने वाला है। अब होस्टल में रहेगी। सर मुझे बड़ा

मानती है। मैं जो कहूँगा करेगी साब।’’

‘लेकिन किसी को कानों कान..........।’

‘क्या सर, आप भी शर्मिन्दा करते हैं ? बस अब आप मुझ पर छोड़ दीजिऐ।’ इसी के साथ जाली प्रमाण - पत्र

की बात न जाने कहाँ खो गई। एस.पी. जीभ लपलपाता हुआ रात होने के इंतेज़ार  में अपने कार्यालय की ओर

बढ़ गया था।

‘नहीं मुत्तु, ऐसा मत करो। प्लीज, ऐसा मत करो। तुम्हें और कोई नौकरी मिल जाऐगी............क्या अपनी

नौकरी बचाने के लिऐ  ?’

‘नल्ली, तू समझती क्यों नहीं? एस.पी. मेरा फ्रॉड जान चुका है। तू क्या चाहती है मैं फिर से उसी गलत धंधे

में लग जाऊँ ?’

नहीँ मैं यह भी नहीं चाहती, लेकिन.......।’

‘लेकिन-वेकिन कुछ नहीं, जैसा कह रहा हूँ तुझे वैसा ही करना होगा, मेरे लिऐ  प्लीज़।’

‘मुत्तु, मैंने तुमसे सच्चा प्यार किया है आज भी करती हूँ। मेरी आस्था, मेरे विश्वास पर इतना भयंकर

कुठारघात मत करो। मैं  ऐसा सोच भी नहीं सकती............।’

‘सौदा नहीं कर रहा हूँ, मैं तेरा। समझौता कर रहा हूँ , और रही बात प्यार की , तो वह तो आज भी मैं

तुझसे उतना ही करता हूँ।’ फिर एस.पी. भला आदमी है। रात को खाना बनाने और बर्तन सफाई के लिऐ  ही

तो बुलाया है कोठी पर। खा थोड़े ही जाऐगा तुझे।

‘चाहे कुछ भी हो जाए, मैं एस.पी. की कोठी पर नहीं जाऊँगी। ’

‘जाऐगी कैसे नहीं ? मेरी नौकरी जाती रही तो सड़क पर आ जाऐगी तू । अगर तू वहाँ उनकी ख़ुशी का काम

करती रही तो कल को डी.एस.पी की बीवी कहलाऐगी।’

‘सर, कल रात के लिऐ  माफ़ी चाहता हूँ सर।आज रात उस लड़की को लेकर जरूर आऊँगा। हाँ सर, बिल्कुल

कोरी है। डेफीनेटली सर, वही कपड़े पहनेगी जो आपने भेजे हैं सर।’

मुत्तुस्वामी फोन पर नंबर मिलाता रहा और नल्ली के पैरों के नीचे की ज़मीन धीमे-धीमे खिसकती रही। दोपहर

होते-होते नल्ली के शरीर पर मुत्तु की वर्दी की काली बेल्ट के बकल की मार के निशान नील बनकर उभरने

लगे थे। न जाने क्या-क्या सोच कर शाम के सात बजते-बजते वह भारी क़दमों से उठी। वाशबेसिन में सिर

झुकाकर उसने माँग का सिन्दूर धोया, माथा रगड़ा और देखते-देखते वह सुनहरी तिल्ले वाली सादी -सी धोती

उतार एस.पी. की भेजी हुई उस ख़ूबसूरत  सिल्क की पीले-लाल बार्डर वाली साड़ी में लिपट गई। ताली को उतार

चूमकर आँखों से लगा पर्स में रखते हुऐ  वह आखिरकार फूट-फूट कर रो ही पड़ी।

‘चल-चल, गाड़ी आ गई है, वह देख सामने वाली कॉन्टेसा। देर हो रही है। चल जल्दी जा।’

मुत्तुस्वामी उसे दरवाजे से बाहर धकियाते हुऐ  कह रहा था। मुत्तु ने देखा, अब नल्ली सचमुच एक ख़ूबसूरत

कम उम्र लड़की लग रही थी।

फिर पता नहीं क्या हुआ। उस रोज पहली ही रात वह अपना सब कुछ लुटा आई थी। मुत्तु ने यह कहकर कि

तुझे बर्तन साफ़ करने भेजा था या एस.पी. के साथ मौज-मस्ती करने, अगले ही दिन से उसे तिरूमंगलम के

इसी होस्टल की चारदीवारी में वार्डन की देख-रेख में नज़रबन्द कर दिया। शहर में अकेली असुरक्षित नल्ली

सब सहती चली गई। उसने यही सोच पाल ली कि वह जो कुछ कर रही है अपने पति के लिऐ  कर रही है।

मुत्तु की तरक्की हो गई थी। अब वह डी.एस.पी. बन गया था । फिर वही शुक्रवार की शाम से रविवार की रात

तक सब कुछ बिना नागा। मुत्तु हर शुक्रवार की शाम एस.पी. की काली कॉन्टेसा लेकर होस्टल आता और

रविवार को देर रात छोड़ जाता। एस.पी. के डंडे का डर दिखाकर तो उसने अच्छे-अच्छे काबू कर लिऐ  थे फिर

वार्डन तो चीज़ ही क्या थी।

जयन्ती शाम को कोर्ट से लौटी तो देखा नल्ली का शरीर बुखार से जल रहा है। उसने ठंडे पानी की पट्टियाँ

रखनी शुरू की तो नल्ली के कराहने की आवाज़ से जयन्ती भी घबरा गई। नल्ली ने आँखें खोली तो जयन्ती

को सफ़ेद साड़ी में देखकर घबरा गई। सफ़ेद साड़ी वह भी दिन के उजाले में

‘तुम तो सफ़ेद साड़ी, रात में.........?’ ‘उसने धीमी आवाज में पूछना चाहा।

‘हाँ अक्का ? ये देखो भैया-भाभी की चिट्ठी । कोडैकैनाल से आई थी परसों।’

‘तुमने मुझे बताया नहीं ?’

‘क्या बताती ? बताने लायक है भी क्या ?

‘क्या लिखा है ?’

‘कुछ नहीं और बहुत कुछ। इतना भयानक कि अब ऐसा लगता है जब नटराजन जब मुझे छोड़कर इस दुनिया

से चला गया था तब मेरी ज़िंदगी  इतनी नहीं उजड़ी थी जितनी अब उजड़ी है।’

‘क्यों आखिर क्या हुआ ?’ नल्ली ने अपनी बुझी आँखों को खोलने का प्रयास करते हुऐ  कहा।

‘कुछ नहीं। भैया ने जो कुछ लिखा, पता नहीं क्या सोचकर । पर यह बात उन्होंने मुझसे क्यों छुपाई ? उस

समय तो उन्होंने सोचा होगा कि अगर यह नटराजन से शादी करना चाहती है तो करे, अच्छा हैं। हमें कुछ

नहीं करना पड़ेगा। और आज लिख रहे हैं तुम्हारा नटराजन तो पहले से ही शादीशुदा था। उसने तुम्हें धोखा

देकर शादी की थी। ये देखो शादी की फोटो भी भेजी है। सुना है, तुमने तीन लाख रूपये बतौर मुआवज़ा

उसकी मौत के ज़िम्मेदार ट्रक वाले से ले लिया है और तुमने एक नया फ्लैट भी खरीद लिया है। चिन्ता मत

करो तुम्हें वहाँ अकेले नहीं रहना पड़ेगा, हम तुम्हारे भैया-भाभी भी वहीं शिफ्ट हो जाऐंगे । तुम होस्टल कब

छोड़ रही हो, लिखना।’ जयन्ती ने पत्र पूरा पढ़ा और मुट्ठी में फ्लैट की चाबी को भींचे रही। नल्ली उसकी

बात सुनते-सुनते एक बार फिर नीम बेहोशी में चली गई।

शाम के आठ बज रहे थे। सापाड रेड्डी -सापाड रेड्डी ;खाना तैयार है द्ध की पुकार मैं स लेडी, वासम्मा लगा

रही थी। पर जयन्ती सुनते हुऐ  भी इस आवाज को सुनना नहीं चाह रही थी। अक्का के लिऐ  खाना लाकर

क्या करे। उसे ख़ुद  भी कुछ खाने की इच्छा नहीं है।वह एक और सत्य का बोझ जो ढो रही है, उसे आज

अक्का को जल्द से जल्द बताना ही होगा।

मुत्तुस्वामी को दिन में ही उसने पेरिस-कार्नर के पास अपनी दूसरी काली कलूटी पत्नी और एक बच्ची के साथ

देखा था। मूर्ख अक्का, पता नहीं किस आस्था से बँधी अपनी आत्मा तबाह कर रही है। अक्का सोचती है कि

मुझे कुछ पता नहीं कि हर शुक्रवार की शाम काली कॉन्टेसा में उसका पति उसे लेने आता है या फिर

डी.एस.पी. की वर्दी में पति के रूप में कमीना दलाल । जयन्ती ने नल्ली को बुखार में ही मुत्तुस्वामी की

असलियत बता दी थी।

शुक्रवार की शाम। सिर दर्द की दवा खाने के बावजूद नल्ली का बुखार उतरने को नहीं आ रहा है। दोपहर के

दो बजने को है। यह जानने के साथ ही, कि मुत्तु एक बच्ची का बाप भी है, नल्ली पत्थर हो गई है। शाम की

चाय का समय होने के साथ-साथ हॉर्न की आवाज़ का भी समय पास आने लगा है। नल्ली धीमे-धीमें पलँग  से

उठते हुऐ  पास की अलमारी से कांजीवरम् सिल्क की साड़ी खींच रही है। ‘क्या कर रही हो अक्का ?’

‘कुछ नहीं जयन्ती, बात अभी बाक़ी है।’ नल्ली ने कहा और काँपते पैरों से धीमे-धीमे दीवार पकड़ते हुऐ

हॉस्टल की सीढ़ियाँ उतर ली।

बुखार में तपती लाश को ढोती काली कॉन्टेसा अब बहुत दूर तक जा चुकी थी बहुत दूर।

 

 

 


Rate this content
Log in

More hindi story from Mridula Srivastava