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दोस्त
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© Alok Mishra

Children Stories Drama

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अभी तुम्हारा फोन आने से पहले कितना उदास था मन। हर साँस किसी बोझ की तरह सीने में सरक रही थीं। कुछ बहुत कीमती चीज खो जाने का विषाद लिये धड़कनें बेतरतीब तरीके से चल रहीं थीं। लगता था कितनी बड़ी गलती कर दी मैंने तुमसे मिलने का फैसला लेकर। कम से कम बचपन की दोस्ती की खूबसूरत यादें इस तरह बिखर तो न जातीं, वो तुम्हारी तस्वीर जो मेरे मन में अंकित थी वो टूट तो न जाती। लगता था एक दोस्त ही नहीं बल्कि मैंने आज अपने बचपन का बड़ा हिस्सा ही खो दिया है, सिर्फ तुम्हारे उदासीन व्यवहार की वजह से।    

अभी सुबह की ही तो बात है जब मैं तुमसे मिलने जा रहा था। इतनी हर्ष-मिश्रित बेचैनी मुझे कभी नहीं हुई थी। हर पल हर क्षण अजीब-सी सिहरन मेरे रोम-रोम में दौड़ लगा जाती थी। कभी लगता था रास्ता लंबा हो गया है, कम्बख्त कट ही नहीं रहा और कभी लगता चलो ठीक ही है, कम से कम कुछ समय और मिल गया है सोचने को कि 'मिलकर पहले क्या कहूँगा, क्या करूँगा, कैसे शारीरिक हाव-भाव से अपनी मिलने की खुशी तुमसे जाहिर करूँगा... तुम भी तो मुझे देखकर खुशी से पागल ही हो जाओगे, तुम्हें भी तो अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होगा...अच्छा हुआ मोबाइल नंबर मिल जाने के बावजूद मैंने तुम्हें आने की सूचना नहीं दी...सरप्राइस का मजा ही कुछ और है।'

  मन में जल्दी-जल्दी बचपन की यादें आ जा रहीं थीं। कितने पक्के वाले दोस्त थे हम दोनों। कक्षा में साथ बैठना, एक-दूसरे के साथ खेलना, पढ़ने-लिखने का काम करना, कभी देर हो जाने पर एक- दूसरे के लिये अपनी बगल की सीट पर कब्जा बनाये रखना, उसके लिये और साथियों से लड़ जाना, गैर हाजिरी से बचाने के लिये एक-दूसरे के रोलनंबर पर यस सर बोल देना, पता चल जाने पर डांट खाना, कभी-कभी एक दूसरे के घर भी जाना जो कि अलग-अलग गाँव में थे और अपनी माँ से मिलवाना, इतनी गाढ़ी दोस्ती देख कुछ सहपाठियों का मजाक में सलाह देना कि तुम दोनों एक-दूसरे से शादी भी कर लेना...सोचकर होठों पर हँसी तैर जा रही थी।   

बाइक चलाते हुए इतने विचार आना कोई अच्छी बात नहीं थी...यह सोचकर रास्ते पर ठीक से नजरें टिका लेता था मैं। पर मन फिर उन्हीं बीते दिनों की यात्रा करने लगता...कितना मनहूस दिन था न जब पिता जी ने घर में दादा-दादी और चाचाओं से होने वाले झगड़े से तंग आकर मुझे दसवीं कक्षा में पढ़ने के लिये अपने गाँव से काफी दूर मौसी के गाँव भेज दिया था और खुद माँ और छोटी बहन को लेकर दिल्ली चले गये थे। कितना रोया था मैं, एक ही झटके में माँ-बाप, परिवार और दोस्तों से बिछड़ कर। हालाँकि कुछ दिनों में नई जगह पर भी कुछ नये दोस्त बन गये और मन लग गया पर वो बात नहीं थी। तुम्हारे बिना नये स्कूल में उतना अच्छा नहीं लगता था...पर क्या करता? उस समय तो मोबाइल भी नहीं था जो तुमसे कुछ कह सुन पाता। खैर उसी साल बड़ी दादी की मरने पर उनके ब्रह्म भोज में मौसा जी के साथ अपने गाँव आना भी हुआ था, लेकिन तीन-चार घंटे के बाद ही उनके साथ लौटना भी था। इसलिए तुम्हारे गाँव आकर तुमसे मिलना संभव ही नहीं था। गाँव के ही एक सहपाठी सुनील ने तुम्हारे बारे में बताया था कि तुम मुझे बहुत याद करते हो। तुमने उससे कहा भी था कि 'जब भी मैं गाँव आऊँ और उससे मिलूँ वह मुझे तुमसे मिलने आने को कहे।' उसने कहा भी मुझसे। पर बहुत मजबूर अनुभव कर रहा था मैं उस दिन...मौसा जी भला क्या समझते। वो तो साँझ होने से पहले घर पहुँच गाय दुहने की चिंता में ही जल्दबाजी मचाये हुए थे...वह गाय भी तो अजीब ही थी। मौसा जी को ही दूध दुहने देती थी। खैर मैंने उनसे कुछ कहा भी नहीं, मन मार कर रह गया।

दसवीं की परीक्षा पूरी होते ही पिता जी ने मुझे आगे की पढ़ाई के लिये वहीं से अपने पास दिल्ली बुला लिया। सालों तक गाँव आना-जाना नहीं रहा। घर वालों से नाराजगी के चलते पिता जी ने उनसे संपर्क पूरी तरह से काट लिया था। यह संबंध फिर जुड़ा भी तो पाँच साल बाद, दादा जी की मृत्यु की खबर सुनकर। माँ और पिताजी गाँव गये और फिर आना जाना शुरू हो गया। लेकिन तब तक मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा के लिये रम चुका था। नये दोस्त और नया परिवेश अब पराये न लगकर बहुत अपने लगते थे। गाँव, बचपन और उससे जुड़े दोस्त याद रहते हुये भी प्राथमिकता में बहुत पीछे हो चुके थे। इधर नौकरी प्रतियोगिताओं की तैयारी और फिर नौकरी लग जाने और उसकी व्यस्तताओं ने और भी बाँध लिया था। गाँव जाता भी तो बस एक दो दिन के लिये, आने की जल्दी लगी रहती। अपने गाँव के कुछ स्कूली दोस्त मिलते तो पर वो बात नहीं लगती। सब अपनी दुनिया में व्यस्त और मस्त थे। तुम्हारा गाँव भले ही मेरे गाँव से छः किलोमीटर ही दूर था, पर कभी गया नहीं। शायद लंबे समय से बिछुड़े रहने के कारण अब उतनी ललक बची भी नहीं थी। वो तो भला हो हमारी क्लास में ही पढ़ने वाले इनायत का, अरे वही जिसे हम दोनों ने एक बार खूब पीटा था हमें चिढ़ाने के कारण। अब वह दिल्ली में ही रहता है। इतना दिन बीत जाने के बाद भी पिछले महीने अक्षरधाम मंदिर में घूमते हुये उसने मुझे पहचान लिया था। उसने ही तुम्हारे बारे में बताया था। यह पता चला कि गाँव जाते वक्त पड़ने वाले नजदीकी कस्बे में तुमने मेडिकल स्टोर खोला हुआ है, मन उसी समय उछल पड़ा कि अगले महीने साले की शादी में ससुराल जाना ही है, तब जरूर मिलकर आऊँगा। वैसे तो उसने तुम्हारा मोबाइल नंबर भी दिया था, पर मैं तुमसे सीधे ही मिलकर तुम्हें चौंकाना चाहता था।

खैर... यह सब सोचते-सोचते भनवापुर कस्बा आ चुका था। अपने ससुराल बस्ती से सत्तर किलोमीटर दूर इस कस्बे की दूरी मैं नाप चुका था। चौधरी मेडिकल स्टोर का पता पूछने पर किसी ने बताया कि अगली ही गली में है। सच कहता हूँ खुशी और उमंग के मारे मेरे हाथ पैर कांपने लगे थे। गली में घुसते ही तुम्हारी दुकान का बोर्ड नजर में आ गया था। बाइक की रफ्तार न जाने क्यों बहुत कम हो चुकी थी। फिर सोचने लगा था कि मिलकर क्या कहूँगा? मैंने दुकान के सामने ही बाइक खड़ी की। दुकान में तुम ग्राहकों को दवाइयाँ देने में व्यस्त थे। वैसे तो तुम्हारे चेहरे-मोहरे में काफी अंतर आ चुका था, पहले काफी दुबले-पतले थे अब शरीर भरा हुआ था, पर तुम मुझे पहचान में आ चुके थे। पुष्टि के लिये मैंने बहुत धीमे स्वर में तुमसे पूछा था, "राजकुमार चौधरी?" और तुमने हाँ कहकर मेरी ओर देखा था। कोई प्रतिक्रिया न मिलता देख मैंने ही कुछ सेकेंड बाद कहा, "मैं संजय, तुम्हारे स्कूल का दोस्त।" तुमने मुझे आवाक होकर देखा। मुझे उम्मीद थी कि तुम खुशी से उछल पड़ोगे, मुझे गले से लगा लोगे, खूब सारी बातें करोगे, आज न जाने की जिद करोगे, फिर उसी खेल के मैदान, स्कूल और काली मंदिर पर ले चलोगे जहाँ से हमारी खूब सारी यादें जुड़ी हैं। वैसे तो दुकान का वो काउंटर बीच में न होता तो मैं खुद ही तुम्हारे गले पड़ चुका होता। ...पर ये क्या...मेरा नाम, परिचय सुनने के बाद भी तुम 'स्थितिप्रज्ञ' बने रहे। बजाय बढ़कर हाथ मिलाने के तुम काउंटर से दवायें उठाकर अलग-अलग रैक में रखने लग गये। मैं हतप्रभ था ऐसे ठंडे व्यवहार से और सच बताऊँ तो खुद पर लज्जित भी। आखिर मैंने खुद में क्यों इस दोस्ती को इतना ऊँचा मुकाम दे रखा था? समय-उम्र-जिम्मेदारी-भूमिका बदलने पर दोस्ती भी तो वैसी नहीं रहेगी, ऐसा क्यों नहीं सोचा मैंने? ...अपना यह काम निपटाकर तुमने पूछा, "कैसे हो संजय, माँ और छोटी बहन कैसी है?" सुनकर तसल्ली मिली कि चलो तुम्हें कुछ याद तो है। मैंने कहा, "सब ठीक हैं, तुम सुनाओ।" तुम सिर्फ मुस्कुराये। कुछ पल चुप्पी ही छाई रही हमारे बीच। तुमने औपचारिकता बस चाय के लिये पूछा, मैंने मना किया और तुम मान भी गये। बीच में एक ग्राहक आया तो उसे दवा देने लगे। सच में बहुत अपमानित और उपेक्षित महसूस कर रहा था मैं और स्वयं को कोस भी रहा था। खुद को मजबूत करते हुये मैंने कहा, "अच्छा चलता हूँ।" तुम तो पूरे संगदिल निकले। मेरी इस बात पर स्वीकृति में सर हिला दिया। मैं चलने को मुड़ा तो तुमने कहा, "अपना मोबाइल नंबर दे दो।" मन तो नहीं था पर वहीं काउंटर पर पड़े नोटबुक पर लिख दिया, और चल पड़ा। तुम फिर बोले, "फिर आना, जब भी दिल्ली से आओ, मिलने आया करो।" मैं मुस्कुरा दिया और मन ही मन बोल पड़ा, "नहीं कभी नहीं, अब तो कभी भी नहीं, मैंने इसी बार आकर बहुत बड़ी गलती कर दी।" वहाँ से नजदीक ही पड़ने वाले अपने गाँव आ गया। अगले दिन की दिल्ली वापसी की टिकट थी इसलिए शाम को ससुराल फिर वापिस आ गया। ससुराल से रेलवे स्टेशन बहुत नजदीक है और फिर पत्नी-बच्चों को भी साथ ले जाना था। वैसे तुमसे मिलने आने से पहले मैं सोचकर आया था कि तुम रोकोगे तो यह रात तुम्हारे घर बिताऊँगा और खूब सारी बातें करूँगा, घूमूँगा-फिरूँगा फिर सुबह चला जाऊँगा। पर सोचा कब पूरा होता है।

ससुराल आया तो अंधेरा हो चुका था। खाना खाकर छत पर बिछे बिस्तर पर आ गया। पत्नी पूछने लगी कि, "क्या बात है? इतने गुमसुम क्यों हो?" मैं उसे टाल गया। क्या बताता? तारों को एकटक देखता जा रहा था, मन में बिखरा हुआ बचपन कराह रहा था और चेहरे पर ओढ़ी हुई शांति पसरी हुई थी। तभी फोन बजा। अरे तुम्हारा नाम स्क्रीन पर चमक रहा था। मन और सोच को समेटते हुये मैंने फोन उठाकर हेलो कहा। भर्राई हुई आवाज में तुमने हेलो न कहकर कहा, "दोस्त...मैं राजकुमार। तुम कहाँ हो ? अपने गाँव में न?" मैंने रूखे स्वर में कहा, "नहीं, मैं अपने ससुराल आ गया हूँ। कल दिल्ली वापसी की टिकट है।" तुम उधर से सुबक पड़े, "तुम आये और मैं ढंग से तुमसे मिल भी न सका। मैं ठीक से तुमसे बात भी नहीं कर पाया...जानते हो तुम्हें देखकर मुझे कुछ भी सूझना और समझना बंद हो गया।...सालों से मैं सोचता रहा था कि तुमसे मिलूँगा तो ये करूँगा, वो करूँगा, खूब बातें करूँगा, तुम्हें कुछ दिन जाने नहीं दूँगा...पर जब तुमसे मिला, सब भूल गया, मैं खुशी से पागल हो गया। मुझे कुछ याद न रहा। तुमने जाने को कहा तो तुम्हें रोकना तक न सूझा...तुमसे गले तक न मिल पाया। तुम्हें बहुत बुरा लगा होगा न?"

मैं इतना ही बोल पाया, "हाँ बुरा तो लगा, क्योंकि ऐसी उम्मीद नहीं थी मुझे। पर...।"

"अब मैं तुम्हें फोन करता रहूँगा। तुम जब भी दिल्ली से गाँव आना कुछ दिन मेरे साथ मेरे गाँव रुकना, हम साथ घूमेंगे, फिर स्कूल चलेंगे अपने टीचरों से मिलने, दोस्तों से मिलेंगे,बातें करेंगे... "

अब तुम फोन पर मेरा वर्षों पुराना सपना ही नहीं दुहरा रहे थे, बल्कि मेरी बिखर चुकी उम्मीदों, छिटक चुके बचपन और डूब रहे दोस्ती को सहेज, संवार और पुचकार रहे थे। हमने लंबी बात की। अब फोन रख चुका हूँ। दिल अब भी उछल रहा है, पर खुशी और उमंग से। नींद अब भी गायब है पर जिंदा हो चुके सपनों की वजह से।

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