नेताजी सुभाष चंद्र बोस
नेताजी सुभाष चंद्र बोस
द्वितीय विश्वयुद्ध विरुद्ध के दिनों ही भारत के क्रांतिकारी नेता #सुभाषचंद्रबोस अपनी योजना के अनुसार, ब्रिटिश जासूसों की आंखों में धूल झोंककर अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी जा पहुंचे जब विश्वयुद्ध दक्षिण पूर्व एशिया में शुरू हुआ और अंग्रेज जापानियों से हारने लगे तो सुभाष चंद्र बोस जर्मन से जापान होते हुए सिंगापुर पहुंच गए तथा आजाद हिंद आंदोलन के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिया, उन्हें नेताजी के संबोधन से पुकारा जाने लगा आजाद हिंद आंदोलन के प्रमुख अंग थे-- आजाद हिंद संघ, आजाद हिंद सरकार, आजाद हिंद फौज, रानी झांसी रेजीमेंट, बाल सेना, आजाद हिंद बैंक और आजाद हिंद रेडियोरेडियो।
आजाद हिंद फौज ने कई लड़ाईयों में अंग्रेजी सेनाओं को परास्त किया तथा मणिपुर एवं कोहिमा क्षेत्र में पहुंचने और भारत भूमि पर तिरंगा झंडा फहराने में सफलता प्राप्त की।
अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा एवं नागासाकी नगरों पर परमाणु बम थोड़े दिन छोड़ देने और तबाही के कारण जापान ने हथियार डाल दिए। स्वाभाविक ही था कि नेताजी सुभाष द्वारा भारत की आजादी के लिए किए जा रहे प्रयत्नों का पटाक्षेप हो गया। आजाद हिंद फौज के बड़े बड़े अफसरों को गिरफ्तार करके भारत लाया गया और उन पर मुकदमे चलाए गए , लेकिन जब आजाद हिंद फौज "INA" सिपाही अपने देश प्रेम की उत्कट भक्ति में उठ खड़े हुए थे। तो उस समय की ब्रिटिश सरकार सारे क़ायदे कानून को जानते हुए भी भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव किया। और कानून के साथ दोहरा मापदंड रखा जिसके खिलाफ डॉ हरिसिंह ग़ौर जी प्रिवी काउंसिल लंदन में "INA "सिपाहियों के लिए केस को लड़े एवं मजबूती से कोर्ट में खड़े हुए। डॉक्टर हरीसिंह गौर ने मांग की कि सरकार इन्हें युद्ध बंदी मानकर इनसे वैसा व्यवहार एवं बर्ताव करे न कि इनको बाग़ी या भगौड़ा माना जाए।
