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माँ
माँ
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© Anila Fadnavis

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पता नही क्यों लोग माँ बाबा का श्राद्ध करते हैं? हमारा जिंदा रहना ही तो उनकी निशानी हैं। ओर क्या चाहिये उस आत्मा को जिसने हमें जन्म दिया? एक सृजन का अविष्कार ही तो हैं हम उनके। जब भी मैं मेरे माँ के बारे में सोचती हूँ तो सिर्फ ऐसा लगता हैं कि मैंने उनके जीते जी उन्हें कभी नही बताया की वो मेरे लिये क्या है। शायद मैं ही तब नहीं समझ सकी थी या फिर समझ गयी थी और वो भी इस बातको जान गयी थी।

आमतौर पर पालन पोषण तो सभी माएं एक जैसा ही करती हैं बच्चों का, फिर भी मुझे मेरी माँ की याद कभी ऐसी खिंचती हैं की मै सभी रोजमर्रा के काम छोड़कर केवल उसे याद करने लगती हूँ , झरझर आंसू बहने देने के लिये किसी जगह जाकर बैठ जाती हूँ। गर कोई पूछें, क्या बात हैं? क्याहुआ ? तो बता देती हूँ, माँ की याद आ रही हैं। पूछने वाला सिर्फ हामी भर देता हैं, ठीक ही हैं, यह तो कुदरती हैं। अगर किसी की माँ न हो और याद आ जाए तो ऐसा ही होता हैं। या कोई करूण नजरों से मुझे देखता हैं, बेचारी बिन माँ की हैं, शायद अभी-अभी गुजर गयी हो!

लेकिन बस कुछ ही पल, फिर जीवन में ऐसे कितने मौके आते हें कि मैं मेरी माँ की देन , मेरे कामो में खाना बनाने में, ताश खेलते समय, जाड़े की सुबह सूजी का हलुवा बनाते समय अन्जाने में उजागर करती रहती हूँ। कभी संस्कृत समाचार सुनते समय उनका संस्कृत सिखाना याद आता हैं। जब सगी चचेरी मौसेरी बहने, भाई मिलते हैं तो माँ, मौसी, चाची एकही हो जाती हैं। मगर सबको अपनी अपनी माँ की याद करते समय पुरानी यादों में अपना बचपन दिखता है । अपनी होशियारी के पल याद आते हैं तो कभी जम के खाई मार याद आती हैं।

संदर्भ जुड़ जाते हैं माँ के साथ, पिता की कड़ी नजर कभी माँ की बन जाती थी तो कभी माँ की कड़ी नजर पिता को असहज कर देती थी। लगता था जैसे उनको उनकी माँ याद आ रही हैं।

आजकल अधेड़ उम्र के बड़े, स्कूल की यादे जगाकर दसवी कक्षा के लड़के लडकियां मिलते हैं "रीयूनियन" नाम हैं इस गुट का, यहाँ मैंने महसूस किया मेरी माँ सभी को याद थी, एक वत्सल मूर्ती के रूप में। एक दिन फेसबुक पर मैंने मेरी  एक फोटो पोस्ट कर दी। हमारे मायके के किसी पड़ोसी के बहू का पोस्ट आया तुम्हें देखकर, तुम्हारे आई की याद आ गयी, आँख भर आयी!

एक पुरानी पाठशाला की दोस्त से अमरीका में बात हुयी, पैंतालीस-पचास साल के बाद वह मुझसे कह रही थी, तुम्हारी माँ मुझे अच्छी तरह याद हैं, कितनी सहूलियत देती थी हम लड़कियों को घरमें खेलते समय, ना गुस्सा ना डाँट. हम कितने मजे से तुम्हारे घर आया करते थे, खेला करते थे। अचानक रोने लगी, हमारे माँ पिता ने सिवाय पढ़ाई के किसी बात की इजाजत नही दी घरमें, यह सब तुम्हें मैं कैसे बताऊँ माँ?

तुम महिला मंडल जाती थी, वहाँ गॉसिप  तो चलते ही होंगे मगर मैंने तुम्हे किसी और को उनमें से कुछ सुनाते नही देखा था। शायद ऐसी बातें अनदेखी करती थी तुम। वहाँ भी कुछ सक्रीयता से करना सभी को साथ लेकर, यही देखा करती थी मैं। तुम्हारे पास कितनों की कहानियाँ थी, विश्वास से बताई, मन हलका हो जाता उनका मगर तुम केवल उनकी संदूक बनी रही कभी न खुलनेवाली।

अपने मनपसंद फिल्म देखने तुम यूँ चुपचाप निकल जाती, मैंने तो आजतक अकेले अकेले फिल्म देखने की हिम्मत ही नही की।पहले ऐसी तो हैसियत नही थी, के हर छुट्टीमें निकल पड़ते भारत दर्शन करने।

जिस दिन हम बच्चों के पास नयी कार आ गयी मन ही मन सोचा, कितनी खुश होती थी तुम, जो कहानी उपन्यासों में घुमावदार मोड़ लेकर कहानी के पात्र गाड़ियों से निकलते तुम्हें कितने भाते थे। पर ढलती उम्र में तुम खुश कम, शंकित ज्यादा रहने लगी थी। सड़कों पर होती दुर्घटनाऐँ तुम्हे डरा कर रख देती। जैसे कोई वाहन चलाना खरीदना मृत्यू का निमंत्रण समझने लगी थी। आज बुड्ढी से बुड्ढी औरतें जब मोबाईल पर अपने पोते परपोतों से बातें करती है तब मुझे याद आता है तुम कितनी दूर थी टेलीफोन से कभी कभी जब हमसे बाते करती तब कितनी घबरायी हुयी बात करती थी। बाद में तो तुम पिताजी के जरिये ही बात करने लगी थी। फोन पर बोलना तुम्हें असहज लगता था।

मेरे बच्चों को तुम याद आती हो जब मैं मेरे पोतों के साथ खेल खूद करती हूँ तब। और मेरे पति जिन्हें भरपूर जिंदगी जीने का शौक हैं, तुम्हें याद करते हैं क्योंकी जब भी किसी बात में मैं कंजूसी करती हूँ तब मुझे तुम्हारी तरह हूँ कहते हैं ।

तुमने ज्योतिष विद्याका दो साल का अभ्यास पूरा किया था। हम मजाक किया करते थे, अब क्या जानना चाहती हो तुम? मगर लगता है तुम सच जान गयी थी। मैं और भाई शहर में नही थे कुछ दिनों के लिये, बस उसी वक्त तुम चली गयीं, ताकी हम तुम्हें जाते नही देख सकें। भाई तो पहुँच गया मगर मुझे दस दिनों तक खबर ही नही मिली।

पिताजी अकेले हो गये। लेकिन तुम्हारे साथ ही जीते रहे थे, जब तक जीवित थे। काफी साल तक तुम्हारी तरह फूलदान सजाते रहे हर रोज ताजा फूलों से।

बहुत कम तुम सपनों में आती हो, मैं सोचती हूँ, जो सदा के लिये मन में हैं उसे सपनों में आना जरूरी नही हैं। तसवीरों पर हार चढ़ा कर दीवालों पर लटकाना जाहिर कर देता है कि तुम इस दुनिया में नही हो, बस यह मैं कभी नही होने दूँगी।

यादें

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