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हरी झंडी
हरी झंडी
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© Jitendra Ved

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गर्मी की दोपहर और अकेला व्यक्ति कर ही क्या सकता है। विशेषकर जब वह रिटायर्ड हो और पत्नी को गुजरे कई साल हो गए होंं। बच्चा सपरिवार अमेरिका में सेटल हो गया हो। पहले बाई के हाथ का खाना खाकर अलसाते रहो या बालकनी में बैठकर कूलर की ठंडी हवा खाते हुए इधर-उधर से गुजरने वाले एकाध लोग को देखकर अपने जिंदा होने का अहसास करते रहो। कभी-कभार अपनी पुरानी आदत को बरकरार रखते हुए विविध भारती पर पुराने फिल्मी गीतों का आनंद लेते हुए समय को जाया करने की जुगत भी लगाई जा सकती है या दफ्तर के दौरान का एक व्यसन जिसके लिए सुनिता  हमेशा बड़बड़ाया करती थी - यानी सिगरेट फूंककर समय बिताना। आसपास उठते धुंए को देखना, उसे दूर करने की नाकामयाब कोशिश करना।

समय कुछ लोगों के लिए स्केयर्स कमाडिटी हो, पर मिश्राजी के पास समय ही समय है। उनके लिए समय

काटना उतना ही मुश्किल है, जितना युवा दिनों में ढेर सारी कतर-ब्यौत कर बुढ़ापे के लिए बचत कर सुरक्षित बुढ़ापे की तैयारी करना ।

तो वक्त जाया करने के लिहाज से मिश्राजी, कामवाली बाई के हाथ का खाना समाप्त कर, शेष खाने को शाम के लिए व्यवस्थित रखकर लकड़ी की आराम कुर्सी पर पांव फैलाकर सिगरेट का धुंआ उड़ाते हुए कोई पुरानी पत्रिका पढ़ रहे थे । शायद बीते जमाने की ख्यात पत्रिका धर्मयुग का कोई अंक रहा होगा,जो मिश्राजी की प्रिय पत्रिका थी,साप्ताहिक हिंदुस्तान और वीकली के साथ-साथ। और उन्होंने इन पत्रिकाओं के कई अंक आज भी सहेज कर रखे है। पढ़ते -पढ़ते उन्हें याद आया कि यह आराम कुर्सी उनके बड़े बेटे ने  उनकी 60 वीं सालगिरह पर लाकर दी थी, जब वह अपनी डिग्री पूरी कर पूणे में जाॅब कर रहा था।

सिगरेट के कश लगाते-लगाते अचानक वे सोचने लगे कि बेटे को आईआईटी की हरी झंडी नहीं बतलाई होती तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ते, कामवाली के हाथ की रोटी नहीं खानी पड़ती। पर क्या करें ,समय सबसे ज्यादा बलवान होता है। उस समय तो पुत्र मोह में मरे जा रहे थे। एडमिशन की खबर आते ही पत्नी ने पूरे पांच सेर पेड़े बंटवाए थे,फिर अपना मंगल सूत्र बेचकर फीस की जुगाड़ की थी और खुद ने तो टी टाइम की चाय ही इसलिए बंद कर दी थी कि थोड़े -बहुत पैसे बचेंगे तो पत्नी को भले ही कम वजन का, पर नया मंगल सूत्र तो ला ही देंगे। यह अलहिदा बात है कि वे मरते दम तक नया मंगल सूत्र नहीं बनवा पाए और उनकी ‘धनिया’ एक अदद मंगल सूत्र की आस लिए स्वर्ग सिधार गई।

पहले बड़े बेटे के आईआईटी के चार साल फिर छोटे बेटे के एऩएसडी के तीन साल। उसके बाद बड़े की शादी ब्याह की जिम्मेदारी। छोटे ने मुंशी प्रेमचंद की कुछ कहानियों का नाट्य रूपांतर किया था और मंटो के ठंडा गोश्त का रूपांतरण कर रहा था। चेखोव के कुछ नाटकों का मंचन भी कर चुका था,पर अपने नाटक के शौक में सरकार के खिलाफ क्या नाटक खेला कि भरे बाजार में उसकी मोटर साइकल पर किसी ने कार चढ़ी दी और वह वहीं खतम हो गया। पूरी घटना को दुर्घटना बताकर मामला रफा-दफा कर दिया गया, पर मिश्राजी आज भी उसके बारे में सोचकर ही जब-तब रोने लगते है। उनका कहना है कि उनके बेटे की मौत दुर्घटना न होकर सरकारी हत्या है। शायद व्यवस्था को उनके भ्रष्टाचार पर आघात करने वाले नुक्कड़ नाटकों से डर लग रहा होगा। उस ग़़म में पत्नी इतनी बीमार हुई कि उसकी मौत ही उसको बीमारी से बचा सकी।

बड़ा बेटा, यूं तो समझदार था। अपने छोटे भाई की मौत ने उसे भी आहत किया था, पर अमेरिका की नामी-गिरामी कंपनी का आँफर मिलते ही उसने भी उड़ने में ही अपनी भलाई समझी। दूसरी बार आकर वह जाते-जाते बोला था- पापा आपके रिटायरमेंट की देर है। फिर आप और मम्मी भी वहीं आ जाना। वैसे भी इस देश में कचरों के ढेर, धूल भरी सड़कों और नकली राष्ट्रवाद के अलावा है ही क्या। हमेशा झगड़ों का डर.......

पर कुछ समय में सब कुछ ध्वस्त हो गया। पहले पासपोर्ट की समस्याएं, फिर सुनीता की मौत...और धीरे - धीरे संसार से निर्लिप्तता...। पहले तो पासपोर्ट वाले मानने को तैयार नहीं थे कि वे सरकारी कर्मचारी थे। 

कारण पुश्तैनी मकान नसीराबाद में है और हर जगह सरकारी कागजात में पता वहीं का है, पर अजमेर में पढाई पूरी करने के बाद कभी वहां गए नहीं, मां-बाप की मौत को छोड़कर। नौकरी के दौरान कभी रतलाम में तो कभी बडोदरा में। अंतिम-अंतिम में गौतमपुरा या इंदौर में। इंदौर में मकान भी छोटे बेटे की मौत के पहले,इन्‍कम टैक्स बचाने के लिए उसके नाम पर खरीदा था, जो सरनेम अलग लिखता था, इसलिए कोई पता किसी भी तरह मैच नहीं हो रहा था। आखिरकार बहुत भागदौड़ के बाद बेटे की जान -पहचान का फायदा उठाने के बाद पासपोर्ट मिला तो वीसा के लिए चक्कर लगाकर जूते घिस गए और अमेरिका जाकर कुछ वक्त बेटे के पास गुजारने के स्वप्न हवा। 

हाॅॅल में बैठे-बैठे ,सोचते-सोचते, पढ़ते-पढ़ते, कश लगाते-लगाते कब नींद आ गई, उन्हें पता ही नहीं चला। वैसे उन्हें रोजाना ही ऐसे ही नींद आती है, नौकरी के समय भी और नौकरी के बाद भी।

उन्होंने लगभग पूरी नौकरी रतलाम-इंदौर रूट पर ही की है। कभी गौतमपुरा तो कभी चंद्रावतीगंज, मीटर गेज के इस रूट पर दोपहर सवा बजे एक ट्रेन निकलती थी। इसके बाद अगली ट्रेन शाम को साढ़े पांच के बाद होती थी, इसके मायने है कि लगभग चार घंटे आराम ही आराम। ज्यादातर वे सवा बजे वाली ट्रेन के बाद श्यामलाल को कह देते थे कि मैं खाना खाने के बाद थोड़ा सोऊंगा और चार बजे वापस आऊंगा। कभी कोई मालगाड़ी आने वाली होती तो स्टेशन का कोई आदमी घर पर बुलाने आ जाता। वे इस दौरान या तो झपकियां लेते रहते या सिगरेट फूंकते रहते।

झपकी आते ही उन्हें पता ही नहीं चला कि कब किताब हाथ में से गिर गई और कब जलती हुई सिगरेट भी। गरमी तो थी ही, सिगरेट के कश से किताब के पन्नों को आग पकड़ने में देर नहीं लगी। धुआं निकलता रहा और मिश्राजी खर्राटे भरते रहे-दुनिया से बेखबर। वैसे वे खबर रखे भी क्यों, जब दुनिया अपने में व्यस्त हैं तो उन्हें किसकी पड़ी थी। जब अपने ही बेगाने हो गए तो वे दुनिया वालों पर वे दीवाने कैसे होते?

गरमी की दोपहर में कौन बाहर रहता है। विशेषकर मध्यम वर्ग की कालोनी में पुरुष या तो दुकानों पर या काम पर। जब महिलाएं टीवी पर एकाध सीरियल देखने के बाद कूलर की हवा में निद्रा फरमाना ज्यादा पसंद करती हैं, तब इस बात की संभावना कम ही होती है कि उठ रहे धुएं पर कोई गौर फरमाएं।

जब आग इतनी फैल गई कि सोफा जलने लगा तो रैग्जीन की बदबू लोगों की सांस को रोकने लगी तो पास वाले जैन साहब की बीबी ने बाहर निकलने की जुर्रत की पर बदबू के अलावा उन्हें कुछ नहीं दिखा। फिर वही टीवी और नींद....रोज की माफिक। बीच-बीच में फेसबुक पर अपडेट करने की जुगत। कई आसपास वालों के बारे में सोचकर दुनिया वालों से पीछे नहीं रह जाए।

इसी बीच जैन साब का लैंडलाइन खड़का। मैडम जैन ने सोचा कि किसी आनलाइन शाँपिंग वाले का होगा।

वे जब-तब आर्डर देती रहती हैं और डिलीवरी बाॅॅय उनकी दोपहर की नींद में खलल डालते रहते हैं। पर अब ये सब उनकी आदत में शुमार हो गया है। आर्डर देने के बाद वे पैसा निकाल कर अलग रख देती है और बहू या नौकर को ताकीद कर देती हैं कि फलाना -फलाना पार्सल आने वाला है और पैसे रखे हैंं, देकर डिलीवरी ले लेना। पर आज उन्होंने फोन उठा लिया। पांचवें मकान वाली यादव मैडम का फोन था। उनके हसबेंड डीईओ है।

कभी इसके बच्चे की तो कभी उसके बच्चे की एडमिशन में काम आ जाती है, इसलिए काफी रौब है। बोली- जैन साहिबा, आपके मकान के आसपास से काफी बदबू आ रही है। बाहर आकर देखिये क्या माजरा है?

बाहर आकर जैन मैडम ने देखा तो उनके घर के आसपास काफी भीड़ जमा थी। पुलिस भी आ गई थी गोया कोई अपराध उन्हीं के घर से हुआ हो। लोग उन्हीं को देख रहे थे जैसे कि पूछ रहे हो कि आपको आग का पता क्यों नहीं चला? अब तो बदबू उन्हें भी आ रही थी। रैग्जीन के जलने की बदबू, वार्निश के जलने की बदबू और न जाने कौन-कौन सी दुर्गंध, जो सब एक में एक घालमेल हो गई ती। फायर ब्रिगेड को फोन कर दिया गया था, पर उसका कोई अता-पता नहीं था। पोर्च में खड़ी फियेट जस की तस थी। इसके मायने थे कि आग सिर्फ अंदर को खत्म कर रही थी, बाहर पर उसका कोई रौब नहीं था।

फायर ब्रिगेड के आने के पहले ही जब सामने वाले दरवाजे को तोड़ा गया तो सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। आग काफी भयानक थी, पर मिश्राजी को ज्यादा चोट नहीं आई थी। शायद आग कूलर की हवा के कारण बड़े से हाँल के दूसरे कोने में चली गई थी और सोफे को अपने आगोश में ले लिया था।

मिश्राजी के पांव जल गए थे और वे बेहोश थे। पुलिस वालों के पीछे-पीछे भीड़ अंदर आ गई थी।

पुलिस वालों ने पूछाः ये क्या करते थे। पीछे से आवाज आई-ज्यादा तो नहीं मालूम, पर रिटायर्ड रेलवे स्टेशन मास्टर थे। 5-6 साल पहले यहां मकान खरीदा था। उसके बाद रिटायर हो गए।

घर में कौन-कौन हैं?

कोई भी नहीं। पत्नी 4-5 साल पहले मर गई और लड़का अमेरिका में रहता है। भाई है शायद, पर यहां नहीं रहता है।

तो एफआईआर कौन लिखाएगा?

पता नहीं। आप ही लिख लीजिए।

लोगों की भीड़ कम होने लगी थी। पुलिस के पचड़े में कौन पड़े। फटे में टांग डालकर हड्डी तुड़वाने का शौक किसे है?

बेटे या भाई का पता है या फोन नंबर?

भाई का तो नहीं, पर बेटे का है। पिछले महीने कह रहे थे कि भाई की बेटी के बेटे की शादी है,मायरा

करने जाना है-बीकानेर। बेटे को आने का कह रहे थे,पर उसने ना कह दिया था।

कहां है, फोन नंबर? पुलिस वाले ने आदत अनुसार हड़काने की कोशिश की।

सर, मैं दो-तीन बार लगा चुका हूं, पर कोई उठा नहीं रहा है। शायद वहां रात होगी। सो रहे होंगे।

हां, ऐसा हो सकता है, पर जब बाप यहां है,तब मोबाइल पास में रखकर सोना चाहिए। पुलिस वाला

बोला।

पास वाले मकान में कौन रहता हैै?

इधर जैन साहब और उस तरफ सक्सेनाजी।

कौन हैं ये दोनों?

जैन साब तो दुकान पर होंगे। एमटीएच में दुकान है और सक्सेनाजी फैक्ट्री गए होंगे। उनकी सांवेर रोड पर फैक्ट्री है सीमेंट पाइप की।

जैन साब की वाइफ वो है। एक व्यक्ति उनकी तरफ इशारा करते हुए बोला।

बहनजी आप आइए। एफआईआऱ लिखने में मदद कीजिए।

आपको आग लगने का पता कब चला?

पता नही, मिसेस यादव का फोन आने पर पता चला -तीन बजे। कूलर की आवाज के कारण बाहर क्या होता है, पता ही नहीं चलता।

तो क्या आपको जलने की बदबू नहीं आती?

ऐसा है साब,मैंने सर दुखने के कारण विक्स लाया था, इसलिए पता नहीं चला। दोनों की स्मेल एक जैसी है न।

साहब, इनके लड़के का फोन लग गया है। रिंग जा रही है। आप ही बात कर लीजिए ना। सक्सेनाजी का बेटा बोला।

लाओ दो।

उसने मोबाइल कान पर लगाया। बहुत सारी रिंग बजने के बाद आवाज आई।

कौन?

मैं पुलिस इंसपेक्टर रायकवार बोल रहा हूंं -विजयनगर, इंदौर थाने से। आपके घर में आग लग गई है और आपके पिताजी बेहोश है। अस्पताल में एडमिट कर रहे हैंं।

रायकवार साहब, मैं देवास-उज्जैन में तो रहता हूं नहीं कि आपके फोन को सुनते ही चल पडूं। टाइम तो लगेगा ही। फिर मेरा इंपारटेंट प्रोजेक्ट है, इसलिए अभी तो नहीं आ सकता। अगस्त में आ सकूंगा।

पर आपके पिताजी की हालत गंभीर है?

हां मुझे समझ में आ रहा है, पर मैं मजबूर हूँ। ऐसा कीजिए आप इलाज करवा दीजिए और आपका कोई एकाउंट नंबर बता दीजिए, मैं पैसे ट्रांसफर करवा देता हूं।

मिस्टर मिश्रा, आपके पिता को आपकी जरूरत है। आपके पैसौं की नहीं। वैसे हम पुलिस वालों को  अपनी जेब में से हुए खर्च को निकालना खूब आता है। हम ही कर लेंगे इलाज और चाहेंगे तो वसूल

भी कर लेंगे पाई-पाई। भड़********.....। पुलिस वाले ने एक गंदी सी गाली देकर फोन बंद कर दिया।

तब तक फायर ब्रिगेड भी आ चुकी थी, जो पानी से पूरे मकान को नहलाकर आग बुझाने की कोशिश कर रही थी।

उसी समय कालोनी में रहने वाले डाक्टर शिरवाडकर बोले-मामला सीरियस है। जल्दी से एफ आई आर की कार्यवाही पूरी कर मिश्राजी को वंदना हास्पिटल में भेज दो।

पर वह तो दूर है, लगभग 10 किमी .... पर वहां अच्छी साज संभाल हो जाएगी। आप तो जानते हैं कि इनका यहां कोई नहीं है।

फिर डाक्टर शिरवाडकर ने इंसपेक्टर के कान में कुछ कहा और इंसपेक्टर ने उन्हें वंदना हाॅॅस्पिटल में एडमिट करने की हामी भर दी।

आवाज के कारण कानाफूसी का केवल ‘बड़ी मुर्गी’ शब्द सुनाई दिया और बचे खुचे लोग मिश्राजी को वंदना हाॅॅस्पिटल ले जाने की तैयारी करने लगे।

हरी झंडी

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