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पृथ्वी थियेटर और उमंग
पृथ्वी थियेटर और उमंग
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© Anand Sharma

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आसनसोल से ट्रेन चलने वाली थी, सिर्फ़ पाँच मिनट रह गये थे। मां, पिता जी, छोटे भाई और अपनी छोटी बहन को गले लगा कर उमंग ट्रेन में बैठ गया था। उसके दिल और ट्रेन की धड़कन मानो एक हों। मन में शायद दोनों भाव होंगे, अपने पुराने शहर को छोड़ने का गम और नये शहर मुंबई में जाने की खुशी।

जिस दिन उसकी कंपनी ने उसे मुंबई बुलाया था, वो मानो ज़मीन से सात फुट उँचा कूदने लगा। बचपन से ही उसकी चाह थी मुंबई जाने की।आज तक के जितने भी गीत, जिनमें ‘मुंबई’ या ‘बंबई’ शब्द हों, उसकी ज़ुबान का साथ नहीं छोड़ रहे थे। पर बंबई या मुंबई उसे इतना पसंद क्यों है ? क्या है इस शहर में ? दरअसल, इसका उत्तर बड़ा ही सीधा भी है और टेढ़ा भी...जी हाँ सीधा-टेढ़ा दोनों एक साथ !

सीधा इसलिए कि उमंग को तो “सिनिमा” और नाटकों का शौक है। और टेढ़ा इसलिए क्योंकि उसके इस शौक से घरवालों को शॉक लगता है

बंगाल के इस शहर आसनसोल में उसने छोटी सी नाटक मंडली बनाने का सपना भी देखा था, पर वो सपना मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेने के वरदान और छोटे शहर में कला के प्रति लोगों की उदासीनता की वजह से टूट गया। पर जब भी कभी कहीं नाटक या सिनिमा जैसे शब्दों की ध्वनि उसके कानो में पड़ती, तो मानो गोपियों ने कृष्ण की बाँसुरी की पुकार सुन ली हो। उमंग को यक़ीन था कि एक दिन न जाने कैसे पर शायद ऐसे या वैसे वो एक दिन मुंबई मैया के दर्शन कर ही लेगा।

अपने शहर से २१० किलोमीटर दूर उसने कलकत्ता में एक नाटक देखा था। जब वो उस नाटक के निर्देशक से मिलने बैकस्टेज गया तो निर्देशक एक स्क्रिप्ट लिए बैठा था। निर्देशक ने अपने चश्मे के ऊपर से उसे देखा।उमंग ने जब अभिवादन किया तो निर्देशक खुश हुआ और कहने लगा कि इस तरह के कई नाटक मुंबई में भी होते हैं और अगर नाटक देखने का शौक है तो कभी मुंबई आओ ख़ासकर पृथ्वी थियेटर।

बस उस दिन उस निर्देशक ने उमंग को मुंबई जाने का एक और ठोस कारण दे दिया। जिस तरह अर्जुन की आँखें सिर्फ़ चिड़िया की आँख पर होती थी, उमंग की आँखें मुंबई पहुँचा देने वाली नौकरियों पर होती थी।

अंततः अपने अर्जुन ने चिड़िया की आँख बेध डाली।मुंबई मैया ने उसे बुला लिया। मुंबई की एक आईटी कंपनी में उसकी नौकरी लग गई। शुक्रवार को वो मुंबई पहुँचा और शनिवार को ही पृथ्वी थियेटर निकल पड़ा।

थियेटर के बाहर लाइन बड़ी लंबी थी और बढ़ती जा रही थी।नाटक क्या है ? कौनसा है ? ये पूछने का उसे समय ही नहीं मिला और वो लाइन में खड़ा हो गया। लाइन में उसके आगे एक लड़की थी जिसके बाल घुंघराले, करीब से मोगरे की भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। उसके कानों के लंबे झुमके और उसकी पीली कुरती ने उमंग के मन में श्रृंगार रस का संचार कर दिया था। उमंग ने हिम्मत कर मोहतर्मा से समय पूछा। लड़की ने मुड़कर कहा, “इट'स 4:35.”

उमंग उसके चेहरे को देख मानो कहीं खो गया। मानो अमावस्या की रात ने पूर्णिमा की चाँदनी देख ली हो। उसने वहीं खड़े-खड़े अपने माँ-पिताजी के लिए बहू ढूंढ ली और भाई-बहन के लिए भाभी। नाटक और सिनिमा के प्रति जो उसकी तपस्या चल रही थी वो इस रंभा ने तोड़ दी। एक समय के लिए तो वो किसी बाग में खो गया जिसके चारों तरफ गुलाब ही गुलाब थे। अपने ख्वाब में वो उस रंभा को गुलाब देने ही वाला था कि पीछे से किसी ने उसे गुजराती में कहा -“ए भई, लाइन जोड़े तमे पण आगड़ वधता जाओ ने !”

उमंग ये सुनते ही वास्तविक दुनिया में वापस आ गया और अपने ख्याली पुलाव की खुशबू में मुस्कुराने लगा। आसपास के गुजराती माहौल ने उसके मन से कहा, “वाह, यार ! ये गुजराती लोग तो बड़े कलाप्रेमी निकले ! लोग इनका लोहा सिर्फ़ व्यापार में ही मानते हैं, पर कोई अगर ये दृश्य देख ले तो कहेगा कि गुजराती आदमी कला में भी किसी से पीछे नहीं है।” एक बार उसने मन ही मन गुजरात की धरती को नमन किया और सोचने लगा कि अगर मौका मिला, तो वो कुछ दिन तो गुजरात में ज़रूर गुज़ारेगा। उसी बीच उस लड़की को किसी का फोन आया और लड़की गुजराती में बात करने लगी। बस ये देख उमंग और भी उमंग में आ गया।उसके मन में उस लड़की के प्रति श्रद्धा के भाव जाग गए। वो सोचने लगा कि लड़की कितनी मॉडर्न है, पर बोली वही देसी... क्या मधुरता है आवाज़ में ! धीरे-धीरे लाइन आगे बढ़ी और उमंग टिकट काउंटर तक पहुँच गया।

नाटक का टिकट ५०० रुपये का था, जो कि आसनसोल के सिनिमा से पाँच गुना था। पर उसने सोचा कला के सामने धन का क्या मोल ? पॉकेट से ५०० निकलने के बाद अब १०० ही बचे थे। जेब के हलकेपन ने मन थोड़ा भारी सा कर दिया। फिर भी उस लड़की की तरफ देख उसका मन कंगारू की भांति उछल पड़ा। उसने चाय पीने का सोचा और पृथ्वी कैफे में चाय लेने गया। चाय लेने के बाद जब उसने 100 का नोट दिया, तो चायवाले ने 70 रुपये वापस दिए।

उमंग ने बड़ी शालीनता से कहा, “भैया मेने तो सिर्फ़ एक ही चाय ली।” चायवाले ने उसकी शालीनता का जवाब और भी शालीन ढंग से दिया।“जी हाँ। एक चाय के ही ३० रुपये हुए।”

उमंग को ये उसकी शालीनता का अपमान लगा। उसने तुरंत ही अपनी शालीनता का चोगा उतार फेंका और कहा, “पगला-वगला गये हो क्या ? एक चाय का कौनसा ३० रुपये ?”

चायवाले ने कहा, “देखिए भैया, यहाँ की चाय कला के दूध में नहा के बनती है। यहाँ चाय सिर्फ़ कलाकार लोग ही पीते हैं। ये चाय आपको भी कलाकार बना देगी। जो सबसे लेते हैं, वही आप से ले रहे हैं। ३० रुपया कोई ज्यादा तो नहीं। लोग तो ताज होटल में ५०० तक का चाय पीते हैं।”

उमंग और विरोध करता पर सामने वही गुजराती कन्या आ गयी जिसने उसे गुलमोहर के ख्वाब दिए थे। उमंग ने बड़े ही नवाबी ढंग से ७० रुपये अपनी जेब में वापस रखे। लड़की उसका ये ढंग देख मुस्कुराने लगी।उमंग भी मुस्कुरा रहा था। लड़की ने जब उसकी आँखो में देखा, तो उमंग की अक्ल का ताला बंद हो गया। उसे खोलने के लिए वो बाहर एक पान की दुकान पर बनारसी पान खाने पहुँच गया। पान का बीड़ा चबाते-चबाते उसने देखा एक जगह बहुत भीड़ लगी है। सामने से गुज़र रहे आदमी से, जो कि चाल से यूँ लग रहा था मानो वो अंबानी से भी व्यस्त आदमी हो, पूछा कि भैया ये भीड़ किसलिए ?

उस आदमी ने उन लोगों को एक मूर्खतासूचक शब्द से सम्बोधित करते हुए पागल करार दिया और कहा, “हर शनिवार का यही ड्रामा है। ये लोग अमिताभ के बंगले पास आकर अपनी इसी-तीसी कराते हैं।खड़े रहते है घंटों भर मानो अमिताभ बच्चन इन्हें अपने घर ले जा कर कौन बनेगा करोड़पति खिलाएँगे ।” निया की मूर्खता बताने के लिए वो अपना और भी समय दे सकता था पर उमंग ने उसकी बातों में कोई रस नहीं लिया और अपना उमंग बच्चन के बंगले की ओर यूँ आस लिए भागा मानो हनुमान को राम मिल गया हो, मानो सुदामा अपने कन्हैया के लिए भागा हो।

बच्चन के बंगले के सामने पहुँच कर उसने यूँ चाल बदली जेसे खुद वो ही बच्चन हो। सामने खड़े बंगले के सेक्यूरिटी गार्ड को देख उसने मन ही मन गाया-

"अरे द्वारपालों, कन्हैया से कह दो..."

बंगले के आसपास बहुत भीड़ थी। लोग “बच्चन! बच्चन!” चिल्ला रहे थे।उमंग भी ५ मिनट तक इंतज़ार करने लगा सदी के सबसे बड़े महानायक का, पर कुछ ही क्षणों में उसका वैज्ञानिक मस्तिष्क सवाल करने लगा कि क्यों न पूछ ही लिया जाए कि बच्चन जी कहाँ हैं ?

गार्ड के लाठी पकड़ने के अंदाज़ से समझ आता था मानो वो किसी बहुत बड़े खजाने की रखवाली कर रहा हो। बहुत स्वाभाविक था उसकी मूँछो का ऊपर की ओर तन जाना। उमंग ने द्वारपाल की गर्दन पर यूँ हाथ रखा मानो द्वारपाल उसका मित्र हो। उसने बोला, “अरे भैया, ये बच्चन जी इतना देर क्यूँ कर रहे है आने में ?” द्वारपाल ने बड़े ही भोले मन से कहा, “कहीं बाहर निकले हैं। आएँगे थोड़ी देर में।”

उमंग ने थोड़ा प्रेम दिखाते हुए पूछा, “आप कहाँ से, चाचा ?”

वो बोले, “बेटा हम अलाहाबाद से हैं, अपने साहब की ही तरह ।” और हँसने लगा।

चाचा अपने नए भतीजे को कुछ और बताते कि एक चमचमाती सफेद गाड़ी बंगले में आ गयी। चाचा ने तुरंत भतीजे को रफ़ा-दफ़ा किया और ड्यूटी बजाने लग गये। उमंग ने थोड़ा अपमानित महसूस किया, पर जैसे-तैसे उसे स्वीकार कर लिया। अचानक एक सांवले हाथों वाली गोरी कन्या “अभिषेक! अभिषेक!” चिल्लाने लगी। लड़की इतने अपनेपन से “अभिषेक! अभिषेक!” कह रही थी मानो अभिषेक बच्चन उसके साथ बचपन में घर-घर खेला करता था।

उमंग को लड़की पर थोड़ा गुस्सा आने लगा। उसे ये फ़िज़ूल की दीवानगी रास नहीं आ रही थी। पर उसका अंतर्मन कहने लगा, “तू क्यों इस लड़की से चिढ़ता है ? तू भी तो बच्चन जी का दीवाना है।” मन में ये अंतर्द्वंद्व चल ही रहा था कि अचानक उसी गाड़ी से ऐश्वर्या राय बच्चन निकली। उसे देखते ही उमंग का कवि हृदय मचल उठा। उसे ऐश्वर्या की आँखे नील समंदर से भी नीली लगने लगी। गर्दन सुराही जैसी, मानो रात में चाँद उसी से चाँदनी उधार लेता हो ऐश्वर्या ने जब उसकी ओर देखा तो उमंग मदमस्त हाथी सा झूमता हुआ ऐश्वर्या की ओर भागा। सेक्यूरिटी गार्ड अपना शस्त्र यानि लाठी उठाकर उमंग की ओर भागा। गार्ड की लाठी ने उमंग की पीठ से आलिंगन कर लिया। लाठी चरित्रहीन निकली, पीठ का आलिंगन कर कंधे का चुंबन कर बैठी। पीठ और कंधा दोनों रोने लगे और पैरों ने कहा, “भागो !” ज़ोर-ज़ोर से भागो...

उमंग भागता हुआ सीधे अपने प्रथम प्रेम यानी पृथ्वी थियेटर पहुँच गया।नाटक प्रारंभ हो चुका था। शुरुआत एक भजन से हुई। फिर मंच पर एक नायिका ने नृत्य किया। उसके ठीक बाद नायक और नायिका के बीच संवाद शुरू हुए जो करीब ५० मिनट तक चले। उमंग को कुछ अटपटा-सा लगने लगा क्योंकि अभी तक कुछ भी हिंदी में नहीं कहा गया था। पहले भजन संस्कृत में, नृत्य गुजराती गीत पर एवं संवाद भी गुजराती में बोले गए। मंच में फिर से नायिका बड़ी सुसज्जित होकर आयी। उसने जब दोबारा संवाद गुजराती में दिया तो उमंग के पीठ और कंधे का दर्द सर पकड़ने लगा। उसने अपनी सीट की दाईं ओर देखा तो वही लाइन वाली गुजराती लड़की थी। उमंग ने हिम्मत करके कन्या से पूछा कि क्या ये नाटक गुजरती में है ? लड़की ने बिना बिना उसकी ओर देखे हाँ के संकेत में सिर हिला दि, उमंग की उमंगें हताशा में बदल गईं। जब भी दर्शको में कोई किसी संवाद पर हँसता, उसे लगता मानो वो उसकी ही मूर्खता पर हँस रहा है।

अजीब स्थिति थी। उसकी पीठ और कंधा तो दर्द से कराह रहे थे, पर कुछ समय बाद होठों ने अपनी ही मूर्खता पर मुस्कुराना शुरू कर दिया। पास बैठी कन्या ने जब उसे यूँ देखा तो पूछा, “क्या आपको गुजराती नहीं आती ?”

उमंग ने बच्चे की तरह कहा, “नहीं।”

ये देख लड़की हँसी और उसके हाथ पर अपना हाथ रख कहा, “कोई बात नहीं नाटक ख़त्म होने के बाद कहानी समझा दूँगी। मेरे पिताजी इसके निर्देशक हैं। ये सुन उमंग को यूँ लगा मानो जीवन की व्यंग्यपूर्ण सुबह ने प्रेमपरिपूर्ण संध्या का रूप ले लिया हो।

उमंग की उमंगें फिर जाग उठीं।

थियेटर नाटक बच्चन मुंबई गुजराती प्रणय

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