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सरसों का आलिंगन
सरसों का आलिंगन
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© gopendra kumar sinha

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वसंत ऋतु का समय था सुबह सुबह गौतम गुरु जी नहा धो और भोजन करके विद्यालय के लिए घर से निकले और उनकी साईकिल पगडंडी पर टन टन घंटी के साथ आगे बढ़ने लगी।यह पगडंडी सरसों के क्यारियों के बीच से गुजरता है,जैसे ही साइकिल की घंटी बजाते हुए सरसों के खेतों से होकर गुरुजी गुजरने लगे सरसों के पीले पीले फूलों ने मन पर ऐसा जादू डाला कि उनका मन डोल गया वे साईकिल खड़ा कर सरसों की क्यारियों की तरफ चल पड़े।बसंत ऋतु के आगमन के साथ चारों तरफ सरसों के फूलों की चादर बिछी हुई थी उनके बीच से गुजर रहे पगडंडियों पर चलते हुए किसी भी इंसान का मन डोल सकता है।गुरु जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ आज जब वे अपने विद्यालय की ओर जा रहे थे तो सड़क के दोनों तरफ खिले हुए सरसों के फूलों ने उन्हें मजबूर कर दिया अपने पास आकर कुछ बात करने को।इसी कारण जब वे सरसों के क्यारियों में गये तो सरसों के पीले पीले फूलों को देखकर उनका मन अहलादित हो उठा।जब सरसों के खेतों में वे गये तो लगा मानो सरसों के फूल कह रहे हैं तुम ही प्रीत हो।उनके कोमल कोमल फूलों को छूते ही उनके मन का मयूर नाच उठा।आह कितने कोमल फूल होते हैं सरसों के आनायास उनके मुंह से बोल फूट पड़े,तभी तो भंवरा इनकी कोमलता पर मोहित हो बैठता है और इनके आगे पीछे डोलता रहता है।सरसों के फूल उन्हें अपने पास से जाने नहीं दे रहे थे लग रहा था जैसे कोई सुंदरी अपनी पीले पीले ओढ़नी से उन्हें बांध रही हो।बहुत मुश्किल से उन फूलोंं से पीछा छुड़ाकर गुरुजी विद्यालय पहुंचे।

उनका मन अभी भी कह रहा था कितने प्यारे प्यारे थे वो फूल!उन फूलों की सुवास की मादकता अभी भी गुरुजी सांसों में महसूस कर रहे थे।उन फूलों की चमक आंखों से ओझल नहीं हो पा रहा था।उनकी रंगत गुरुजी को होली के रंगों जैसे भिगों रहे थे।गुरुजी ने जब इतनी बातें मुझे बताई तो मैंं भी सपनों में खो गया।मुझे अच्छी तरह से याद है जब मैं छोटा था अपने साथियों के साथ खेत के तरफ घूमने जाया करता था।जहां सरसों फूलों संग अठखेलियां करता मटर तोड़ तोड़ कर खाता चना,खेसारी की कोमल कलियों को तोड़कर खाने का मजा उस वक्त और बढ़ जाता था,जब हम सब अपने घरों से पिसी हुई काला नमक और लाल मिर्च की गुड्डी लेकर जाते थे,और फिर बड़े मजे से मटर प्याज काली मिर्च काला नमक और लाल मिर्च के साथ घुघनी बनाते और सब मित्र मिल बैठकर खाते थे।वे भी क्या मस्ती भरे दिन थे।कभी कभी दूसरों के खेतों से मटर तोड़कर खाने का अद्भुत आनंद प्राप्त होता था।पूछिए मत बचपन की शरारत आज भी जब याद आता है मन रोमांचित हो उठता है।जब खेतों में चना तैयार हो जाता था तो हम सब चने के पौधों को उखाड़कर उसे एक एक फली को तोड़ तोड़ कर खाते थे अपने मित्रों से बड़े ही अदब से बोलते थे "चल आज तोरा बूट (चना) खिलबऊ।" जब मटर और चने की फसल पक कर तैयार हो जाती थी तो उसको आग में पका कर खाते थे जिसे होरहा कहा जाता हैै।होरहा लगा कर खाना आज के चिकन चिली और चाऊमिन से भी ज्यादा मजेदार था।कभी कभी गेहूं के बालियों को भी पत्ते और पुआल के आग पर पकाकर खाते थे। बहुत मजा आता था जल जाने के बाद भी उसकी मिठास किसी और आधुनिक पकवान नहीं दे सकता। गुरु जी ने अपनी बात सुनाकर मुझेेे भी बचपन के दिन याद करा दिए।काश बचपन दोबारा लौट आता और हम भी उन्मुक्त गगन में विहगों से गमन,करते बच्चों जैसे उछलते कूदते।आज भी सरसों के फूलों को आलिंगन में भर लेने का मन करता है।





ऋतु की यादें वसन्त

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