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टच वुड...
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© Naveen Kumar Ghoshal

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दोस्तों, मेरी महान मान्यता थी कि थुलथुल होने से कहीं अच्छा है सींखचा होना। लेकिन पिछले दिनों मेरे साथ हुए एक हादसे ने न केवल मेरी इस महान मान्यता के टुकड़े टुकड़े कर दिए बल्कि मेरे ज्ञान चक्षु भी खोल दिए।

हुआ यूं कि मुझे लखनऊ से मेरठ जाना था। ट्रेनें कंप्यूटर जी सब फुल दिखा रहे थे, ये बात दीगर है कि उन्हें पटरियों पर खाली ही दौड़ना था और टीटी साहब की जेबें गरम करनी थीं। खैर यह अलग चर्चा का विषय है अभी तो भारतीय रेल की तरह पटरी से न उतरें, यही समय और लेख दोनों की मांग है।

तो साहब, ट्रेन तो बेवफ़ाई कर गई अब बारी आई बसों की, माशाल्लाह उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम की बसें और 12 घंटे का सफर, आप समझ सकते हैं इसका दर्द। खैर भागते भूत की लंगोटी भली, कंप्यूटर में तुरंत बसों को सर्च किया एक बस शाम 7:00 बजे की एसी टू सीटर मिली। कंडक्टर की पीछे वाली 1 सीट तुरंत बुक की और पहुंच गया कैसरबाग बस अड्डे। सोचा था चलो ए सी बस मिल गई है सफर आराम से कटेगा लेकिन यह क्या सामने आई तो जनरथ एसी बस। ना सिटी पीछे हो ना ही टांगे फैला सको बस ठंडे में ऐसे ही अकड़े बैठे रहो। करता क्या ना करता जाना जरूरी था सीट भी बुक हो चुकी थी जाकर अपनी सीट पर बैठ गया। कुछ देर बाद ही मेरे बेटे की ही उम्र का एक थुलथुल नौजवान अपने ही जैसा हैंगिंग बैग लेकर मेरी सीट के पास वाली सीट पर आकर पसर गया। जाहिर है कि उसके शरीर की बनावट के कारण उसने मेरी जगह के क्षेत्रफल पर भी अवैध कब्जा जमा लिया था। सिमटना मेरी मजबूरी हो चली थी। फिर भी मैंने हिम्मत जुटाते हुए उससे सविनय निवेदन किया कि बेटा बैग ऊपर या कहीं और रख दो जगह हो जाएगी। गनीमत यह रही कि उसने मेरी इस रिक्वेस्ट को टाला नहीं और बैग ऊपर वाले रैक पर डालने के लिए खड़ा हुआ लेकिन बैग के साइज के आगे रैक ने जवाब दे दिया था गैलरी में भी जगह नहीं थी लिहाजा बैग को गोद में रखना उसकी मजबूरी बन गई, मैं भी मन मसोसकर रह गया सोचा पता नहीं कहां तक की मुसीबत पल्ले पड़ी है। बेटा कहां तक जाएंगे आप, कुछ नहीं अंकल बस बरेली तक जाना है। बरेली यानी कम से कम 5 घंटे कि मुसीबत रात 12:00 बजे के बाद ही छुटकारा मिलेगा। हमारी तत्पर रहने वाली रोडवेज की बस भी तय समय 7:00 बजे की जगह 7:30 बजे बस अड्डे से खिसकी। लखनऊ पार करते-करते डेढ़ घंटा बीत गया। मौसम सुहावना हो चला था हालांकी एसी बस में मौसम का कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।

हमारी भारतीय संस्कृति और जीवन शैली भी अपने आप में अनोखी है। सफर के दौरान अनजाने हमसफर को भी हम बातों बातों में इतना पास कर लेते हैं जैसे बरसों की जान पहचान हो। फिर भला हम और वो मुंह पर टेप चिपकाए कैसे बैठे रह सकते थे। बातों का दौर शुरू हुआ तो पता चला जनाब का बरेली अभी अभी ट्रांसफर हुआ है एसबीआई में जॉब करते हैं। छूटते ही मैंने कहा

"बहुत अच्छा आप आराम से बरेली का सूरमा लगा कर ध्यान से झुमका खोजिए। बरेली अच्छा शहर है आपको चिंता करने की जरुरत नहीं है।" मेरा इतना कहना था कि उन्होंने मेरा बरेली कनेक्शन पूछ ही लिया। मुझे भी न चाहते हुए भी संक्षिप्त वृतांत सुनाना पड़ा। तभी एक रेलवे क्रासिंग पर हमारी बस रुकी, रुकते ही ठंडा पानी, जामुन, गरम समोसे इत्यादि वाले चढ़ कर लगे गले फाड़ने। मैं अमूमन सफर के दौरान बाहरी चीजों को खाने से परहेज ही करता हूँ, सो हो रहे ध्वनि प्रदूषण यानी नायज पाल्यूशन के अलावा मेरा इससे ज्यादा सरोकार नहीं था। अचानक मेरी नजर अपने सहयात्री पर गई जिनकी नजर गरम गरम समोसे पर थी और जीभ के साथ अनियंत्रित शरीर भी आपा खो रहा था खैर उन्होंने दो गरम समोसे हमारे जिगर के टुकड़े अखबार की कतरन पर ले लिए। उनकी हथेली पर उछलते समोसों को देखकर लगा कि समोसे वाकई गरम थे। लेकिन चेहरे पर बदलते भाव देख कर लग गया था कि दोनों समोसे उदरग्रस्त नहीं कर पाएंगे। मैं कुछ समझ पाता इससे पहले ही उनकी हथेली मेरी तरफ मुड़ गई। अंकल जी लीजिए गरम गरम समोसे हैं। नहीं नहीं बेटा आप ही लीजिए मैं अभी घर से खाना खाकर निकला हूं। अरे ले भी लीजिए मौसम भी अच्छा है समोसे इंजॉय कीजिए। अब साहब करता ना क्या करता, गरम गरम समोसे की महक मेरे नथुने से होती हुई पेट तक दस्तक दे चुकी थी। दूसरों को सफर के दौरान अनजाने आदमी से कोई खाने की चीज ना लेने की हिदायत देने वाला मैं उससे एक समोसा ले बैठा और अपनी लालायित जीभ को शांत करने के लिए एक टुकड़ा मुंह में डाल दिया। दिमाग पर दिल की जीत हो गई थी लेकिन कमबख्त दिमाग भी कहां मानने वाला था एक बार फिर जहरखुरानी को लेकर जोरदार अपील की इस बार उसकी अपील काम कर गई और मैंने समोसे को कागज में लपेट कर बैग में सहयात्री की नजर बचाकर चुपचाप रख लिया लेकिन जो टुकड़ा पेट में चला गया था उसने टेंशन बढ़ा दी। अरे इतने से टुकड़े में भला कितना जहर होगा सोच कर बोतल निकाली और गटागट कई घूंट पानी पी लिया सोचा पानी सब डीजाल्वड कर देगा बाकी राम जाने।

उधर मेरे सहयात्री अपनी संक्षिप्त क्षुधा शांत करने के बाद अब धीरे धीरे निद्रा देवी के आगोश में जा रहे थे। 2 लोगों के सीट पर डेढ़ में वे ही पसरे हुए थे मैं किसी तरह खुद को आधी सीट पर समेटता वह भी विंडो साइड। लग रहा था कि पास में एक बड़ा सा बोरा और उस पर एक अनियंत्रित लोटा रखा है जो बस के झटके के साथ इधर उधर लुढ़क रहा है लेकिन साहब यह क्या, वह लोटा तो सीधे मेरे कंधे पर ही आ लुढ़का। गर्दन के नीचे जिन हसलियों की हड्डी की चाहत के लिए लड़कियाँ मर मिटती हैं, ना जाने क्या क्या जतन करती हैं ईश्वर ने मुझे वह नेचुरली दी हुई हैं। लेकिन साहब उनका भारी भरकम खोपड़ीनुमा लोटा मेरी इन हसलियों पर गिरा तो पूरे बदन की हड्डियों में झन्नाहट के साथ करंट दौड़ गया। 

बड़ी हिम्मत जुटाकर मैंने हाथ से उनका लोटा सीधा किया थोड़ी देर बाद ही अनबैलेंस हो कर वो फिर मेरे कंधे पर था। मैंने फिर उसे नियंत्रित किया लेकिन ढाक के फिर वही तीन पात। मैं करता रहा और वह लुढ़कता रहा यह कवायद कई बार चलती रही परेशान होकर हिम्मत जुटाकर मैंने उनके बोरा रूपी शरीर को हिलाया। बेटा ठीक से बैठो मुझे उलझन हो रही है। सॉरी अंकल और उन्होंने अपने अनकंट्रोल्ड शरीर को थोड़ा टसमस किया और फिर उसी तरह पसर गए। मैं खुद को कोसने लगा, लगा ना जाने क्यों, इसे जगाया क्योंकि अब तो लोटा, बोरा भी मुझ पर लदने लगा था। सच बताउं दोस्तों आज मुझे पहली बार एहसास हुआ की मोटा नहीं थुलथुल होना हजार नियामत है कहीं भी पसर जाओ चिंता की बात नहीं आपका बेडौल शरीर खुद को जगह के हिसाब से एडजस्ट कर लेगा। यहां भी वही हो रहा था मेरे जैसे सींखचे पर वह पूरी तरह एडजस्ट हो चुका था मेरी सांसों की नली घुटने लगी थी और तो और बोरे की गोद में लदा हैंडबैग मुर्गे की टंगड़ी जैसी मेरी जांघों पर आ गिरा था जिससे पैरों का ब्लड सरकुलेशन रुक सा गया था और चीटियाँ जैसी काटने लगी थी वह तो गनीमत हो हमारे छोटेपन के पीटी सर का जो घंटों धूप में खड़े रखकर बोलते थे पैरों के पंजों की उंगलियाँ लगातार हिलाते रहो इससे ब्लड सरकुलेशन बना रहेगा और गश खाकर नहीं गिरोगे। उस समय गुरु जी को भले ही कोसा करते थे लेकिन आज दिल से उनके लिए आभार निकल रहा था क्योंकि मैं यही कसरत अपने पैरों की उंगलियों में कर रहा था लेकिन आखिर कब तक...

सच बताउं दोस्तों मुझे अपने दुबलेपन पर बड़ा अभिमान रहा है। बड़े गर्व के साथ कहता था कि जो जो काम हम पतले कर लेंगे मोटे तो हांफ जाएंगे। आज अपनी पतली हालत देख कर मुझे अपने एक मित्र याद आ गए। दुर्गा पूजा के दिनों में पुष्पांजलि देते समय न जाने किस बात पर हँसी मज़ाक में ही उन्होंने आसपास कोई लकड़ी का सामान ना दिखने पर मुझे छू कर कह दिया टच वुड, यह सुनकर सारी भीड़ खिलखिला कर हँस पड़ी मैं ज्यादा समझ नहीं पाया और मैं भी उस हँसी में शामिल हो गया लेकिन दोस्तों आज उस टच वुड का असली मतलब समझ में आ गया था लेकिन बात तो बात गई अब अपने उस मित्र पर सिवाय गुस्सा उतारने के और कर भी क्या सकता था। इस बार मैं पूरा ज़ोर लगा कर क्रांतिकारी तरीके से उठा और उसको झकझोर कर कहा बेटा ठीक से बैठो मुझे भी दिक्कत हो रही है। जी जी अंकल वेरी सॉरी, कहकर थोड़ा टसमस, लेकिन फिर वही हालात। क्या करता मन मसोसकर रह गया मनाने लगा बरेली जल्दी आए और यह लगेज जल्दी अनलोड हो। लेकिन यह क्या कमबख्त ड्राइवर को भी बरेली से पहले ही ढाबे पर बस रोकनी थी चलो सोचा कुछ खा भी लेंगे और टहलने से शरीर का रक्त संचार भी सामान्य हो जाएगा बस से नीचे उतर कर फटाफट दो रोटी और दाल मंगाकर खाने लगा नजरें सहयात्री को खोज रही थी जो पेट पूजा करके धोकनी झोंक रहे थे। बरेली यहां से अभी करीब डेढ़ 2 घंटे की दूरी पर था। आधे घंटे बाद बस चल पड़ी। मुझे तो नींद आने का सवाल ही नहीं था पर हां मेरे सहयात्री थे गहरी नींद के आगोश में उसी मुद्रा में मुझ पर धीरे-धीरे लुढ़कने का का प्रयास कर रहे थे मरता क्या ना करता मैंने भी इस दशा के लिए मन को तैयार कर ही दिया था दरअसल थुलथुल लोगों का अपने शरीर पर कंट्रोल तो होता नहीं है जिधर चाहे लुढ़क पुढ़क जाते हैं। बहरहाल साहब, हमारे यूपी रोडवेज की जनरथ एसी बस बरेली पहुंच ही गई मैंने जल्दी जल्दी उसको जगाया, बेटा बरेली आ गया है उठो, जी जी अंकल थैंक्यू अंकल आपको रास्ते में मेरी वजह से कोई परेशानी तो नहीं हुई, नहीं नहीं बेटा बढ़ा एंजॉय किया, अच्छा अंकल, बाय बाय बाय बेटा।

गई मुसीबत भगवान अब किसी थुलथुल को पास में ना बैठाना। पर भगवान मेरी भला कहां सुनने वाला था दो लोगों की सीट पर किसी तरह पैर पसारे और थकान दूर करने की कोशिश की खड़े होकर रैक पर अपना सामान ठीक करने लगा ठीक उसी समय सीट पर धम्म से आवाज़ हुई दाईं तरफ देखा तो एक और थुलथुल शरीर सीट पर आ पसरा था लेकिन दोस्तों यहां तो नीम पर करेला चढ़ा हुआ था पसरने वाली एक महिला थी। उम्र रही होगी करीब 30 साल। चलती बस में अब यह नई सवारी कहां से आकर बैठ गई मन में सवाल उठा तो मैंने भी विनम्रता से पूछ लिया कि "आप क्या पीछे बैठी थीं", जी 2 सीट पीछे 3 सीटर पर लेकिन यहां आकर आराम मिला है। मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो उस सीट पर पहले ही दो लकदक बैठे थे जाहिर है तीन का बैठना मुश्किल ही था। मैं मन मसोस कर रह गया चुपचाप रहने के अलावा मेरे पास कोई चारा भी ना था बस केवल दिमाग में यही चल रहा था कि अब इस नई मुसीबत से कैसे छुटकारा पाया जाए।  इसी बीच निद्रा के आगोश में उनका बेडौल शरीर भी मुझ पर लुढ़कने लगा। मेरा दम एक बार फिर घुटने लगा सोचा मेरठ पहुंच भी पाऊंगा या नहीं फिर याद किया पर्स में आई कार्ड आधार कार्ड और पैन कार्ड है या नहीं कमबख्त कम से कम पहचान तो हो। मोबाइल पर मिस कॉल करके सबसे ऊपर घर का नंबर ले लिया। लेकिन साहब अब तो इंतेहा हो चुकी थी उन साहिबा का गद्देदार शरीर मुझ पर पूरी तरह गिर चुका था। बमुश्किल मैंने हिम्मत जुटाई और लोक लाज रखते हुए बड़ी सज्जनता के साथ कहा, 

"मैडम बस में और भी सीटें खाली हैं आप प्लीज वहां जाकर बैठ जाइए मेरी तबियत ठीक नहीं है और मुझे सफोकेशन हो रहा है।" मेरी यह विनती सुन कर वह ना जाने क्या बुदबुदाई, मैं समझ नहीं पाया लेकिन उसके बाद वह सीधे होकर बैठ गई और कुछ देर बाद ही शायद उसका स्टॉपेज आ गया और वह भारी भरकम सामान भी अनलोड हो गया।

तो साहब आज मेरा यह मिथक टूट कर रह गया था कि मोटे होने से अच्छा पतला होना ज्यादा सही है अरे साहब कहीं पर भी पसर जाओ शरीर अपने को एडजस्ट कर ही देता है चाहे किसी के ऊपर या उबड़ खाबड़ सीट पर हर गड्ढे भर जाते हैं। आज मेरे ज्ञान चक्षु खुल चुके थे कि मेरे मित्र ने मुझे टचवुड क्यों कहा था।

बस पतला थुलथुल

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