सवेरा
सवेरा
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उदय हुआ सूरज पूरब में
आसमान में छाई लाली
रही ना रात ना रहा अंधेरा
रही न चंदा की उजियारी।
डाल डाल पर बैठे पक्षी
चहचह - चहचह चहक रहे हैं
खिले फूल मुस्काई कलियाँ
सारे उपवन महक रहे हैं
हवा बह रही धीमी - धीमी
शीतल और सुखदाई
जाग गए हैं खेत बाग वन
पेड़ ले रहे हैं अंगड़ाई
कण कण पर बिखरे हैं मोती
कण कण पर बिखरी हैं मणया
कितनी मनोहर कितनी सुंदर
सुखद सुहानी ये घड़ियां
