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संघर्ष
संघर्ष
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© Nishant Parmar

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जीवन ये अनमोल समय ,पल पल मत खोजो हर्ष

इसको समझो साथियो जीवन है संघर्ष

एक चिड़िया जब दाना लेकर चलती है गिर जाता है,

वो फिर चलती है गिरता है चलते चलते गिर जाता है,

पर्वत जैसे अटल रहो तुम मौसम के अनुकूल बनो,

कलियों की भांति आंधी झेलो एक दिन जाकर फूल बनो।

एक कुम्हार मटका गढ़ता है मटका पल पल टूट रहा,

वो फिर गढ़ता है गढ़ते गढ़ते मटका प्रतिष्ण टूट रहा,

निर्भर हमपर करता है ये सूर्य बने या कीट बने,

पाक पावक पर जला देह को मिट्टी से हम ईंट बने।

बच्चा चलना सीख रहा है चलते चलते गिर जाता है,

वो फिर उठता है गिरता है उठते उठते गिर जाता है,

अब वो बच्चा दौड़ रहा है जो घुटनो पर चलता था,

अब वो टुकड़े बाँट रहा है जो टुकड़ो पर पलट था।

ये शरीर हमको मिल इसके अपने कुछ फर्ज़,

इसको समझो साथियो जीवन है संघर्ष।

लोहा तपता बार बार जब तक आकार नही लेता,

वो फिर तपता है तपता है जब तक वो हार नही सकता,

"हार" जीत का पहला पहेलु "हार" नही है अंत किसी का,

पथिक मार्ग पर रुकते चलते रुकना नही है अंत किसी का।

नदियां रस्ता नही पूछती ना रूकती बहती रहती,

छोटे पत्थर चट्टानों की सब पीड़ा सहती रहती,

तुम नदियां मत रोको खुद को एक छोटे से गागर में,

एक दिन सबको मिल जाना है अपने अपने सागर मे।

 

This poem is all about struggle . Struggle before success .

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