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ज़िंदगी
ज़िंदगी
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© Nazre Imam

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खोने पाने का दौर चलता रहा I
ज़िंदगी, हर शाम तू बदलता रहा I
सबके अपने क़िस्से हैं यहाँ, लेकिन
तू सबका हक़ अदा करता रहा I
सबको है शिकायत तुझसे ढेरों,
तू सबके ज़ख़्मों को मगर सिलता रहा I
तेरा कर्ज़ भला उतारूँ कैसे मैं,
ये सोच कर वक़्त गुज़रता रहा I
ये दिखावा , ये झूठी शान मेरी
उफ्फ् कितनों को आज तक खोता रहा I

nazre imam poetry

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