Sonu Saini

Others


4.8  

Sonu Saini

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विदेशी रंग

विदेशी रंग

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दूसरे देश में घूमना अक्सर सभी को अच्छा लगता है। मसक्वा शहर में रहते हुए रमेश की इच्छा थी कि वह नई-नई जगह देखे और इस शहर को पूरी तरह से अपने क़दमों से नाप ले। एक बार रमेश के दोस्त अन्तोन ने उसे सकोल्निकी पार्क जाने के लिए कहा। अन्तोंन ने उसे बताया कि वह पार्क बहुत ख़ूबसूरत और सूरज की किरणों के आधार पर बना हुआ है। उसके मुख्य द्वार से सूरज की किरणों की तरह सात किरणें अलग-अलग दिशाओं में जातीं हैं।


पार्क की ख़ूबसूरती का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसमें लोगों के लिए कितनी सहूलियत और क़ुदरत के नजारों को सहेज कर रखा है। ख़ैर इस बात को जानकार रमेश ने अगले ही दिन स्कोल्निकी पार्क जाने की ठानी। अगले दिन दोपहर में रमेश एक नए पार्क में घूमने निकल पड़ा। उस दिन मौसम सुहाना था लेकिन ठण्ड कड़ाके की थी। चारों और बर्फ़ की चादर बिछी हुई थी जिसपर चलते हुए चरमराहट की आवाज़ आ रही थी।  घूमते-घूमते रमेश सकोल्निकी मेट्रो स्टेशन से बाहर निकला और अंजान होने के नाते अपना रास्ता ढूँढने की कोशिश करने लग।

वह सोच रहा था कि मसक्वा इतना ख़ूबसूरत शहर है तो बाहर निकलते ही कोई अद्भुत नज़ारा देखने को मिलेगा, लेकिन यह क्या ? हर जगह खुदा है और जहाँ नहीं खुदा वहाँ मज़दूर लगा हुआ है। स्टेशन के बाहर आसपास कुछ निर्माण कार्य चल रहा था। उसकी उम्मीद की पहली किरण वहीं मंद पड़ गई। उसे कोई जल्दी न थी इसलिए वह स्टेशन के बाहर लगे तीरनुमा सफेद रंग के बोर्ड पढ़ने लगा। रूसी भाषा का ज्ञान होने के बावजूद ऐसा लग रहा था कि वह कहीं भूल-भुलैया में फंस गया है। बोर्ड पर कहीं भी सकोल्निकी पार्क लिखा नहीं मिला। उसने सोचा कि बेहतर होगा कि किसी से पूछ लिया जाए। अब शुरू हुई किसी ठीक-ठाक आदमी को रोक कर उससे अपनी मंज़िल का रास्ता पूछने की तलाश।


स्टेशन से लोग बड़ी तादात में अन्दर – बाहर आ-जा रहे थे। सभी लोगों की चलने की गति बहुत तेज़ थी। उनकी चाल देखकर लग रहा था कि ये सभी कहीं जल्दी में हैं। वह सोच रहा था कि मसक्वा शहर में तो ख़ैर हर कोई बहुत तेज़ चाल से चलता है। पता नहीं कहाँ की जल्दी रहती है या समय का तकाज़ा रहता है। ये भी हो सकता है यहाँ सभी पढ़े-लिखे लोगों को समय का सदुपयोग करने की धुन सवार रहती है।

अब जो भी है उसे तो किसी एक से रास्ता पूछना ही था, पर कोई भी ऐसा नज़र नहीं आया जिससे रास्ता पूछा जा सके। किसी को भी रोकने से पहले लगता था कहीं ऐसा न हो कि वह किसी ऐसे इनसान से रास्ता पूछ बैठे या किसी का रास्ता रोक दे जिसे वाकई में बहुत जल्दी हो। इसलिए समय का सदुपयोग करते हुए इन लोगों में से किसी को रोकने की उसकी हिम्मत न हुई। उसने सड़क के किनारे एक ओर आगे बढ़ने का निश्चय किया।


आस-पास निर्माण कार्य चल रहा था। विकास की गाड़ी बड़ी-बड़ी मशीनों की पटरी पर ज़ोरों-शोरों से दौड़ रही थी। आस-पड़ोस के देशों से आए मज़दूर भी बहुत ही जोश में विकास की गाड़ी के पहिये को घुमाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे। काम के चलते पैदल मुसाफिरों के लिए रास्ते बहुत संकरे हो गए थे। लोहे की दीवारों से बनी उन छोटी-छोटी गलियों से गुज़रते हुए रमेश को निजामुद्दीन बस्ती की गलियों की याद आ रही थी। बढ़ते कदम से वह एक चौड़ी सड़क पर निकल आया।

वह मन ही मन सोच रहा था —यहाँ लोग कुछ कम हैं। उसे लगा यहाँ पूछना ठीक रहेगा। पास से गुज़रती हुई महिला से रमेश ने बड़े अदब से रूसी भाषा में पूछा —

"माफ़ कीजिएगा मोहतरमा !"

उन मोहतरमा ने रमेश की तरफ़ देखा और हाथ में लिए हुए अपने पर्स को झटक के दूसरे हाथ की ओर कर उसे बगल में भींच लिया।

उनकी इस हरकत को देखकर रमेश को बेहद बुरा लगा। उसके मन में एक अजीब-सी टीस उठी। लेकिन फिर भी उसने आगे पूछने की हिम्मत की

'क्या आप बता सकती हैं"

उसके सवाल पूरा होने से पहले ही महिला ने घबराते हुए कहा

"मुझे नहीं पता !"

यह कहकर वो महिला तेज़ चाल से आगे की ओर बढ़ गई।

रमेश को उनके जवाब का बिलकुल भी बुरा नहीं लगा । उसने सोचा

हो सकता है कि वो उस इलाके की न हो इसलिये उन्हें कोई रास्ता न मालूम हो। उसे बुरा इस बात का लगा कि किस तरह से उस महिला ने रमेश को देखते ही अपने पर्स को छिपाया जैसे कि वह कोई चोर-उच्चका है और उस महिला से उसका पर्स छीनने आया है। उसने अपने हुलिए और कपड़ों पर एक नज़र दौड़ाई कि कहीं वाकई में तो वह कुछ अजीब नहीं लग रहा या कुछ चोर-उच्चका तो नहीं लग रहा।

नहीं, नहीं, मैंने तो कपड़े भी ढंग के पहने हुए हैं, सुबह दाढ़ी भी बनाई थी।

दाढ़ी का ज़िक्र यहाँ इसलिए किया जा रहा है क्योंकि रमेश रोज़ाना दाढ़ी नहीं बनाता। वह कैसा दिख रहा है इस बारे में अक्सर परवाह नहीं करता। ख़ैर, वह अपने आप को पास में बनी इमारत की शीशे वाली दीवार पर अपने आप को देखने लगा। 


अपने आप को जाँचने-परखने के बाद वह मन ही मन सोचने लगा कि खोट उसके हुलिए में नहीं, बल्कि उस औरत की आँखों में था। हो सकता है उसने चश्मा न लगाया हो या उसकी परखने की शक्ति कमज़ोर हो। वो महिला आगे बढ़कर सड़क पार करने के बाद दूसरे रास्ते चली गई। अपने चेहरे में एक खोये हुए आदमी की तरह शिकन लिए रमेश थोड़ा आगे बढ़ा और एक उम्रदराज़ अम्मा से पूछा

"अम्मा, ये सकोल्निकी पार्क किधर है ?"


अम्मा ने जवाब दिया "सकोल्निकी पार्क ?"

"हाँ, वो तो उस इमारत के पीछे की तरफ़ है।"

"तुम सीधे जाकर इस इमारत के बाद बाएं मुड़ जाना तो तुम्हें पार्क का मुख्य द्वार दिख जाएगा।"

रमेश ने सामने खड़ी इमारत को देखा और फिर अम्मा की ओर देखा। अम्मा ने उसकी उलझन को भांप लिया और रमेश को रास्ता दिखाने उसे लेकर इमारत की ओर चल पड़ी। इमारत के पास जाकर अम्मा ने रमेश को आगे का रास्ता दिखा दिया। अम्मा की दरियादिली देख कर रमेश हैरान हो गया। यदि पहली महिला ने उसके मन को ठेस पहुँचाई थी तो अम्मा ने उस पर ठंडक पहुँचाने का काम किया। रमेश अम्मा को दिल से धन्यवाद देते हुए अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गया।


रमेश ने ख़ुशी-ख़ुशी अभी चंद कदम ही आगे बढ़ाए थे कि थोड़ी देर पहले हुई घटना की उलझन ने उसे फिर से घेर लिया। वह मन ही मन सोच रहा था

"क्या उसकी शकल पर बारह बजे हुए हैं ? क्या वह चोर-उच्चक्का लग रहा है ? क्या उसके पूछने का लहज़ा गलत था ? उस औरत ने ऐसा बर्ताव क्यों किया ?"

रमेश के ऊपर ये सवाल हावी होते जा रहे थे। इन सवालों ने उसकी सोच को पूरी तरह से जकड़ लिया था। उसके कदम तो अम्मा के बताए हुए रास्ते पर बढ़ रहे थे पर दिमाग अभी भी अम्मा से पहले मिली महिला के साथ सवाल-जवाब में उलझा हुआ था। ऐसा लग रहा था कि उसका शरीर किसी के इशारे पर चल रहा था और मन किसी और से हाथापाई कर रहा था।'

इमारत से थोड़ा आगे बढ़ते ही अब उसे वो ख़ूबसूरत पार्क दिखाई देने लगा था। पार्क के बाहर मुख्य द्वार के सामने बहुत बेहतरीन सजावट थी। हरी-हरी पत्तियों से 2019 साल लिखा हुआ था जिसपर रंग-बिरंगी बत्तियां टिमटिमा रही थीं। हालाँकि नए साल को तीन महीने बीत गए थे। अब शाम का समय हो चला था।

पार्क का मुख्य द्वार बहुत मनमोहक लग रहा था। अब रमेश अपने आसपास के ख़ूबसूरत कुदरती नज़ारों में गोते लगा रहा था। पार्क के अन्दर जाकर देखा तो वहाँ की सूरज की किरणों की तरह बने उसके दूर तलक जाते हुए रास्ते दिखाई दिए। पार्क की इस बनावट को देखकर उसके मन में बचपन का एक खेल छुपम-छुपाई खेलने का मन हुआ लेकिन अभी वह अकेला था। कुछ ही देर में उसका दोस्त अन्तोन वहाँ पहुँच गया।


अन्तोन मसक्वा में काम करता है और इस पार्क के पास रहता है। वह हिन्दी बहुत अच्छी बोलता है। अन्तोन ने आते ही उस पार्क की ख़ूबसूरती का बखान करना शुरू कर दिया। रमेश उसकी बातों से असहमत नहीं था लेकिन मैं उसकी बातों पर ध्यान नहीं दे पा रहा था। रमेश क़ुदरत के समुद्र से बाहर निकल वापस उस महिला के बारे में सोचने लगा। ऐसा लग रहा था की वह अन्तोन के शब्दों की बौछार से उस महिला द्वारा दिए गए उलझन भरे छाते के नीचे खड़ा आनंद नहीं ले पा रहा है। अन्तोन को भी ज्यादा देर नहीं लगी इस बात को समझने में की उसका दोस्त कहीं खोया हुआ है। शायद उसने रमेश के चेहरे पर पड़ी शिकन और उसकी बातों पर उसके अनुरूप प्रक्रिया न मिलने पर ये जान लिया कि रमेश देख तो उसकी तरफ़ रहा है लेकिन उसकी बात समझ नहीं रहा।

अन्तोन उसने पूछा

"अरे भई ! क्या हुआ ? तू परेशान क्यों है ? कुछ हुआ है क्या ? माफ़ करना यार मुझे आने में थोड़ी देर हो गई। तू नाराज़ है क्या ? या तुझे ठण्ड लग रही है?"

अन्तोन की बातों की तरह उसके सवाल एक के बाद एक आगे कूच कर रहे थे।

रमेश ने उसे रोक कर कहा

"अबे रुकेगा भी या ख़ुद ही ख़ुद बोले जाएगा ? थोड़ी साँस तो ले ज़रा !'

रमेश ने अन्तोन को महिला और उसके बीच घटी घटना के बारे में बताया। अन्तोन ने रमेश की बात ध्यान से सुनी। कुछ सोच कर अन्तोन ने कहा


"दोस्त, बात ऐसी है कि हो सकता है वह महिला किसी बात की वजह से डर गई हो और कोई जवाब न देना चाहती हो। दरअसल बात यह है कि राजधानी में बहुत विदेशी लोग आकर बसने लगे हैं। इसी वजह से अपराध की वारदातें भी बढ़ने लगी हैं। आए दिन अखबारों, टेलीविज़न या रेडियो पर ख़बरों का ताँता लगा रहता है कि एक विदेशी ने किसी रूसी का ये सामान लुट लिया तो दूसरे ने किसी का कुछ चुरा लिया।

अन्तोन की शब्दों की बौछार फिर से शुरू हो गई थी। वो फिर पूरे जोश के साथ रमेश को समझाने की कोशिश कर रहा था कि उस महिला ने ऐसा बर्ताव क्यों किया होगा।

मुझे लगता है कि जिस तरह से एक मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है उसी तरह से किसी इक्के-दुक्के की ग़लत हरकत की वजह विदेशियों या खासकर एशियाई देशों से आये लोगों को लेकर रूसी लोग थोड़ा सचेत रहते हैं। ऐसा अक्सर हर जगह, हर देश में होता है।


अन्तोन की इस बात को सुनकर रमेश को कुछ-कुछ समझ में आने लगा था लेकिन फिर भी पूरी तरह से उसकी उलझन सुलझी नहीं थी। इसके बाद वह अपने देश के बारे में सोचने लगा कि क्या उसके यहाँ भी आज विदेशियों को इसी नज़र से देखा जाता है ? उसे एहसास हुआ कि हाँ, भारत में भी तो कुछ विदेशियों को अक्सर शक की नज़रों से देखा जाता है और कुछ को इज़्ज़त दी जाती है। अब रमेश अन्तोन के पीछे जलने वाली उन रंगबिरंगी बत्तियों को टिमटिमाते हुए देखने लगा और विदेशी रंग के बारे में सोचता हुआ पार्क में आगे की ओर बढ़ गया। 



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