उसकी कहानी जो इंसान ही नहीं
उसकी कहानी जो इंसान ही नहीं
सर्दी की सुबह, उत्तरी हवा। मैं बस स्टैंड पर खड़ी थी! सूरज आसमान में चमक रहा था। एकाएक नजर गई भोज घर के सामने कूड़ेदान की ओर।
कूड़ेदान में झाँक रहा है एक बूढ़ा कौआ। पर बात क्या है ?? मैं उस दृश्य की ओर आगे बढ़ने लगी ! फटे हुए थे उसके पंख शरीर पर जख्मों के निशान !
वह था एक जीवित कंकाल कुछ कुत्ते भी है इस दृश्य में सब एक साथ मिल कर खाना ढूंढ रहे हैं।
जैसे ही कुछ मिलता है खुशी चमक उठती है उसकी आंखें। खुद भी खा रहा है और उसके दोस्त कुत्तों को खिला रहा है! जैसे की नरक में पिकनिक, मैं उदास हो गई।
बगल वाली दुकान से ख़रीद ले आई बिस्कुट और रोटी। उसे सौंप दिया उसके हाथों पर। वह आश्चर्यचकित हो गया। रोशनी फैल गई उसके चेहरे पर।
हम वापस बस स्टैंड की ओर चल दिए। कुछ दूर जाने के बाद ऐसा लगा कि पीछे से कोई आ रहा है। मैंने पलट कर देखा कि वही बुद्ध कौवा गिरते भागे आ रहा है या वह आवाज में मुझे अजीब आवाज में मुझे बुला रहा है।
मुझे डर लगने लगा एक दौड़ में बस स्टैंड लेकिन, क्या हुआ? क्या हुआ? आसपास के लोगों ने जानना चाहा।
मैंने हांफते हांफते पूरी घटना बयां किया। कर्कश कौवा वही हाज़िर हो गया। सब चिल्लाने लगे उसपर उसने अजीब तरह से बढ़ा दिया अपने गंदे, हमारे हाथ चमक रही थी मेरी छोटी सी पर्स।
