सही बंटवारा
सही बंटवारा
सरोजिनी के दो बेटे थे। दोनों की उम्र में एक साल का ही अंतर था और कद काठी लगभग समान थी। दोनों को नाश्ते में आटा ब्रेड खाना बहुत भाता इसीलिए एक दिन पहले, शाम को ब्रेड लाने की जिम्मेदारी उन्हीं दोनों पर थी। शुरुआत में सरोजिनी ब्रेड स्लाइस का बराबर बटवारा करती, यानी 15 में से प्रत्येक को साढ़े 7 ब्रेड मिलती।
चूंकि दुकान से पाकेट लाने में कोई फायदा नहीं था, ब्रेड बराबर बनती थी, इसीलिए उनमें विवाद होता रहता। बड़ा भाई कहता की छोटे को काम करना
चाहिए, जबकि छोटा कहता कि उसे बार बार दौड़ना नहीं चाहिए, रोज रोज के इस विवाद से तंग आकर सरोजिनी ने नियम बना दिया कि जो पैकेट लाएगा
उसे आठ ब्रेड मिलेंगे और दूसरे को सात। अब दोनों भाई दुकान जाने को लेकर लड़ते। बड़ा कहता कि वह ज्यादा जिम्मेदार है, इसीलिए काम उसे ही करना चाहिए। छोटा कहता कि दूध ब्रेड जैसी छोटी मोटी चीजें लाने की जिम्मेदारी छोटी की होती है।
सोरोजिनी अब भी इस चिकचिक से तंग थी। उसने इस बात की चर्चा अपनी सहेली से की, तो उसने कहा , 'तुमने बंटवारा ही गलत किया है। बंटवारा फायदे का नहीं, जिम्मेदारियों का होना चाहिए। फायदे में ज्यादा फायदे की मंसा से ज्यादा जिम्मेदारी लेने की चाह परिवार के साथ साथ देश के लिए भी घातक हो रही है। अधिकांश लोगों को बड़े पद की चाह बड़ी जिम्मेदारियां निभाने के लिए नहीं, बल्कि ज्यादा कमाई के लिए होती है।'
अब बात सरोजिनी की समझ में आ गई। उसने तय कर दिया कि एक दिन एक भाई पैकेट लाएगा, दूसरे दिन दूसरा और नाश्ते में दोनों को पहले की तरह साढ़े 7 ब्रेड मिलेगी। अब न दुकान जाने को ले कर विवाद होता है, न ब्रेड स्लाइस की संख्या को लेकर।
