प्रेम आजकल (व्यंग्य)
प्रेम आजकल (व्यंग्य)
प्यार होना कोई दोष नहीं है कभी भी किसी को भी हो सकता है, ऐसा मैं भी उन दिनों में सोचता था। उन दिनों मेरी सोच ही प्रेम पुजारी सी थी तो मेरे साथ प्रेम का अनुभव होना लाजिमी था, तो मैं भी प्रेम के सागर में डूबा। मेरे जैसे प्रेम पुजारी के लिए एक बार प्रेम के सागर में डूबना सब कुछ अथवा आदि या अंत नहीं था। इसके कारण मुझे केवल एक बार ही नहीं, बल्कि बार-बार प्रेम हुआ, सच कहूँ तो चार बार हुआ।
प्रेम... (एक)
बात उन दिनों की है जब स्कूल की शिक्षा पूरी कर कॉलेज में प्रवेश लिया तो सातवे आसमान पर था। जब आप बहुत खुश होते हैं तब या तो आप प्रेम में होते हैं या फिर लोग आपके प्रेम में आ जाते हैं आपकी खुशी उनसे……. यहां मैं प्रेम में नहीं था लेकिन होते वक़्त नहीं लगा कारण था खुशी का माहौल जिसमें में खुशनुमा जिंदगी जी रहा था, मेरी खुशी के इजहार के तरीके से पता नहीं कब कर दिया किसी ने प्रेम का इजहार। यह भी पता नहीं चला पर मन इस प्रेम के इजहार से पहले उछाले मार दूसरे के वश हो गया और मैं कुए का मेढक हो सीमित क्षेत्र में गोते मारने लगा।
घर से दूर शहर में आप अकेले हो वो भी उन दिनों में जब कैसेट वाली टैप के अतिरिक्त आपके पास मनोरंजन का कोई साधन ना हो तो टैप को तेज आवाज में बजाना आपका शौक हो जाता है या कुछ और पर जो भी हो आपकी टैप की आवाज आपकी कॉलोनी में तेजी से गूँजती है तो साथ ही आपके मनपसंद गाने की आवाज भी सबके कानो में जाती है, टैप के जरिए से।
मेरा भी मनपसन्द गाना था, ओ लाल दुपट्टे वाली।।
एक दिन कॉलोनी की एक छात्रा जो हाई स्कूल में पढ़ती थी और उम्र में हमउम्र ही प्रतीत हो रही थी, मेरे कमरे में आ धमकी। ऐसा नहीं था उसे पहली बार देख रहा था, देखता तो इसे पहले भी था और आज भी देख रहा था, लेकिन आज अचानक हुए हमले से देखने का भाव बदल गया मेरा। आज आंखे कुछ ज्यादा ही झुक गई थी जिसके कारण उसके मुखमंडल को स्पष्ट नहीं देख पा रहा था, जैसे दो माह से उसे स्कूल जाते सब्जी लाते उसकी छत पर झूमते या तेज आवाज में मेरे मनपसंद गाने को सुनते हुए उसे टकटकी लगाकर देखता था…आज थी सामने बीच ना कोई दीवार और ना ही बाजू वाली आंटी के रुप में पांचवी और छठी आँखों के द्वारा चार आँखों में बाधा डाल पूरे मोहल्ले में ढोल बजाने का डर, फिर भी आंखे टकटकी लगाने को तैयार नहीं हो पा रही थी। जिह्वा तो जैसे भूल ही गई हो कि उसका भी इस शरीर में कोई काम है भावनाओ को शब्द देना। लेकिन ऐसा लंबा नहीं चला, आवाज सुनते ही शर्माने का सिलसिला खत्म हुआ…
लड़की - हे , नीलम।
मैं - हाँ।
लड़की - हाँ, क्या?. नाम…. नाम…
मैं - नीलम…
लड़की - हाँ, तो नाम.. तुम्हारा नाम।
मैं - हाँ, नीलम ही कह सकती हो…
लड़की - (इस बार हाव भाव बदलते हुए) हाँ, मेरा नाम नीलम .. नीलू हैं, तुम्हारा नाम क्या है?
मैं - ओ, तो तुम्हारा नाम भी नीलम है..
लड़की - (बात को काटते हुए) तुम्हारा भी से क्या मतलब…किसी और का भी नाम नीलम है…कौन…किसका?
मैं - किसी और का नहीं। मेरा ही नाम नीलम है… राम…नीलकमल।
लड़की - अरे, तुम्हारा नाम भी नीलम है। वाह क्या बात है.. मेरा ही नाम रख लिया।
मैं - नहीं…नहीं.. मेरा नाम यही है। (सामने पड़ी किताब को उठाते हुए) यह देखो यही नाम है, यकीन नहीं है तो.. (कॉलेज आईडी कार्ड की तरफ इशारा करते हुये)..
लड़की - ठीक है…मैं तुम्हारे आईडी कार्ड को देखने नहीं आई।
मैं - हाँ ठीक है तो…
लड़की - (कमरे में पड़ी इकलौती कुर्सी पर कब्जा जमाते हुए) मैं आज तुम्हारी वो कैसेट तोड़ने आई हूँ.. जो तुम सुबह-सुबह शुरु कर देते हो… मेरी सहेलियां (रुक कर) वो कैसेट कहाँ हैं?
मैं - कौनसी, कैसी कैसेट?
लड़की - वही जो तुम सुबह-सुबह ही मुझे देखकर चला देते हो…. ओ, लाल दुपट्टे वाली… ऐसा क्या है मुझमें (कभी लाल दुपट्टा ओढ़ लूं तो तुम…कैसेट दो…
अब यहां बात समझ आई मेरे मनपसंद गाने और घूरने के परिणाम लेकिन वो जो भी हो मैं ना तो यह स्वीकार कर पाया कि यह तुम्हारे लिए नहीं और ना यह कि यह तुम्हारे लिए ही है। खुद को समय और परिस्थिति में डालकर उसके साथ कदमताल करने के लिए तत्पर कर दिया, ताकि समय का फायदा उठा, मैं भी अपने दोस्तों के साथ शेखी मार सकूं की मेरी भी.. गर्लफ्रेंड है ।
सिलसिला बढ़ता गया… पुरानी की बजाय अब नई कैसेट आ गई जिसमें एक ही गाना 5 बार दोनों साइड रिकार्ड कर दिया ताकि कैसेट को बात-बार पीछे करने का झंझट खत्म और कॉलेज और स्कूल एक रास्ते में होने से कॉलेज के गेट पर टकटकी से…गुल्फी की दुकान का। कुछ पत्रों का आदान प्रदान और कसमें वादे सबसे छुपकर।
प्यार में उबाल मारता दिल भी कब तक सहता सब आ गया… धूप में छत पर किताब.. बिना काम के ही दुकान पर जाना और…. अनायास ही एक ही कैसेट का बजना।
य़ह सिलसिला परीक्षा के दिनों तक आ पहुंचा। परीक्षा के बाद काली रात की भांति 2 महीने की छुट्टी और गाँव का प्रस्थान। पर उत्साह कम नहीं था। कॉलेज का प्रथम वर्ष ही था तो दो महीने बीतने का इंतजार और वापस शहर आने का समय 2 साल जैसा लगा, लेकिन गांव तो जाना ही था चला गया।
दो महीने बाद वापस आ गया कैसेट की आवाज से कॉलोनी को आगाह किया कि मैं छुट्टी बिताकर वापस आ गया हूँ, छत को भी एहसास हो गया कि ढलती जुलाई के दिनों में वो धूप में अकेली नहीं है कोई है जो अब उसके साथ है…लेकिन…
वो नहीं दिखी…
कॉलोनी में किसी से पूछने की हिम्मत नहीं हुई। पर बाते तो बाते होती है, आप कितना भी छुपकर कुछ भी करो पर क्या पता कौनसी आंखे आपको निहार रहीं हैं आपको क्या पता? जब ऊँच-नीच हो जाए तो उन आँखों वाले शायद आपको ही ढूंढते हुए दो चार मिलाकर आपको बहुत कुछ सुना देते हैं। ऐसा मेरे साथ भी हुआ..
बाजू वाली भाभी जी ने रोकते हुए कहा, वो जो लड़की थी ना.. जो तुम्हारे कमरे पर आती रहती थी। (मेरी जमीन हिल गई, पर खड़ा रहा) किसी के साथ भाग गई…मुझे लगा तुम ही थे पर बाद में पता चला उसकी क्लास का कोई लड़का था, जो अपनी कॉलोनी में नहीं रहता है। अब उसके पिता ने उसकी शादी कर दी और अपना परिवार गांव में ही शिफ़्ट कर दिया ताकि ऐसी बाते रिश्तेदारों के कानो में ना पड़े।
आज मेरी और मेरी टैप की दुर्दशा हो गई। दोनों में शब्द नहीं थे, छत का भी धूप में साथ देने वाला कोई नहीं था। टैप कोने में पटक दी और खुद को कमरे में बंद कर किताबो से खेलने लगा। दिल का बोझ किताबे कम नहीं कर सकती थी फिर भी टैप और खुद को अलग कर दिया। कैसेट के तारो से कॉलोनी के बच्चों को खेलते देखा जो कैसेट कब मैंने ही फेंक दी कब कि मुझे भी पता नहीं था…अब कमरा भी खाए जा रहा था तो कॉलेज की राह ली ताकि खुद को तरोताजा कर सकूं।
कॉलेज में कई चेहरे मेरे से भी ज्यादा उतरे थे, लेकिन मेरे चेहरे का उड़ा रंग साथियो से नहीं छुपा, उनके लिए कौतूहल का विषय था। वो यह जानना चाहते थे कि मैंने क्लास को टॉप किया फिर भी ऐसा क्यों? उनके तो एक-दो विषय छूट गए फिर भी वो ज्यादा खुश है। खैर, कोई तो था जिसने चेहरे की भावना पढ़ ही ली..
दो… (प्रेम)
निशा - (प्रथम वर्ष की सहपाठी) यार मेरी तो सप्लीमेंट्री आ गई, वक़्त बहुत कम है, समझ ही नहीं आ रहा कैसे पढ़ाई करूँ।
मैं - अरे, इसमे क्या है, मेरे नोट्स पढ़कर तुम पास हो सकती हो।
निशा - मुझे भी ऐसी ही उम्मीद थी, तभी तो तुम्हारे पास आई हूँ, किसी और से नोट्स ले भी लूः और समझ ना आए तो, इसी वज़ह से तुम्हारे पास आई, तुम्हारे पास अगर हो तो..
मैं - हाँ, है मैंने खुद ही बनाए, वही है।
निशा - हाँ, यह ठीक है, कल तुम ले आना मिलती हूँ, तुमसे। हाँ, याद रखना भूल मत जाना, नहीं तो कल वापस घर जाना होगा।
उसे क्या पता था? मैं महिलाओं का कितना सम्मान करता हूँ और उनकी बातों को कितना याद रखता हूँ भूलने का तो भूल से भी सवाल ही पैदा नहीं होता था तो अगले दिन सारे नोट्स प्रस्तुत कर दिए। नोट्स के बदले में मधुर आवाज में मंद सी धन्यवाद की आवाज सुनाई दी और साथ ही कल कॉलेज में मिलने का अनुमोदन भी।
मिलने के अनुमोदन को अस्वीकार किया जाना मेरे वश में नहीं था, अगले दिन कॉलेज में पुनः मिलना हुआ। उसके कुछ डाऊट थे, विषय संबंधी जिनका निराकरण करने के लिए एकांत ढूँढा गया जो कॉलेज के गार्डन में मिल ही गया। उसके डाऊट को मेरे ज्ञान के क्षेत्र से परे उठकर और अति परिश्रम से समाधान किया।
अब यह सिलसिला आगामी 15-20 दिन तक उसकी परीक्षा तक चला, इसके लिए मुझे भी प्रथम वर्ष किताबों के पन्ने वापस दोहरे उत्साह और जिज्ञासा से पलटने पड़े, शायद ऐसी जिज्ञासा से मेरी परीक्षा से पहले पलटे होते तो कक्षा तो क्या विश्वविद्यालय में टॉप कर लिया होता। ज्ञान चर्चा में दिन बीत गए और उसकी परीक्षा हुई, यह मेरे लिए अच्छी खबर थी कि एक बार हम पुनः सहपाठी हो गए उसकी परीक्षा पास होने से।
परीक्षा पास होने के बाद भी मिलने का सिलसिला जारी रहा। अब यह गार्डन की ज्ञान चर्चा कॉलेज के कैन्टीन में होने लगी और अक्सर चाय की चुस्की और पेस्ट्री 🥧 का बिल जेब पर पड़ने लगा। इस खर्च के बावजूद चेहरे पर खुशी इस बात से छाई रहती, नीलम तुम भी, आज तो मैं बिल चुका देती।
निशा की मीठी बाते कमरे के एकांत पलों में भी खुशमिजाज रखती जिससे टैप और लाल दुपट्टे की खाली जगह भर गई थी, पर अब रोमांचित मन कॉलोनी का हाल चाल जानने के लिए छत पर ले जाता और बाजू वाली भाभी जी छत पर खड़ा देख चौकन्ना हो जाती और चुपके से पूरी कॉलोनी की निरिक्षण कर देती। तो कभी पूछ लेती इतना भी क्या पढ़ते हो, कभी बोर हो रहे हो तो मेरे घर भी आ जाया करो।
अब कॉलेज में निशा के बिना खुद को अधूरा महसूस करने लगा किन्तु इजहार नहीं कर पा रहा था, बिना किसी इजहार और अनजाने डर से यह मामला चलता रहा।
एक दिन निशा कुछ ज्यादा ही संवर कर कॉलेज आई। उस दिन क्या ग़ज़ब कहर ढा रही थी, मुझ पर। जो पहले से दिल में समाया हो और जब किसी दिन कुछ ज्यादा ही खुद को संवार दे तो कैसा लगता है, आप समझ सकते हैं। आज इस संवरने के साथ कुछ बैंड और कार्ड्स भी ले आई थी, जो उसके हाथ में ट्रांसपेरेंट बैग में साफ दिख रहे थे। इन्हें देख मेरी उत्सुकता काफी बढ़ गई और मैंने पूछ ही लिया आज तो….
कहने लगी हाँ, आज। पता नहीं कितने दिनों से मेरा मंगेतर बोल रहे थे आज आऊंगा कल आऊंगा। पर आज वो आ रहे हैं और मैं भी घर से कॉलेज का बोल कर आ गई, आज वो कॉलेज से थोड़ी दूर एक रेस्तरां में मिलने वाले हैं लेकिन उन्हें आने में थोड़ा वक्त लगेगा इस कारण मैं कॉलेज आ गई।
मैंने उससे मंगेतर वाली बात पर पूछा, तो क्या तुम्हारी सगाई हो गई?
वो बोली हाँ, हो गई? पिछले वर्ष ही हो गई थी, लेकिन तुम क्यों पूछ रहे हो..
मैंने कहा - तुमने कभी बताया नहीं,
वो - तुमने कभी पूछा नहीं तो क्यों बताऊँ?
मैंने उसे उपरी मन से बधाई दी और उज्जवल भविष्य की कामना की।
य़ह वो वक़्त था तब मैं फिर टूटकर बिखर गया। कमरे में भी मन नहीं लगता था, अब तो शाम के वक़्त गार्डन में घूमने का प्लान कर दिया। नित्य घूमना होता और कुछ मेरे जैसे उबाऊ जीवन वाले लोगों से मुलाकात होने लगी।
तीन…. (प्रेम)
एक दिन बाजू की कॉलोनी में रहने वाली एक सुशील कन्या से मुलाकात हो गई थी, कन्या बहुत ही सुंदर और सुशील थी। संयोग से वह मेरी ही कक्षा की विद्यार्थी थी, किंतु नियमित नहीं थी। दिन में पार्ट टाइम जॉब करती थी, और शाम के समय गार्डन घूमने आ जाती थी। साथ ही प्रेम में उसका बड़ा विश्वास था, वह अरेंज मैरिज की बजाय प्रेम विवाह में विश्वास रखने वाली कन्या थी।
प्रेम में इतना अटूट विश्वास रखने वाली कन्या से जल्द ही प्रेम हो जाना क्या बड़ी बात है? मुझे भी जल्द उससे प्रेम हो गया और उसे भी।
दुध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है, मेरे साथ भी ऐसा ही था। फिर कोई मंगेतर ना निकल आए इसलिए जल्द ही उसकी पूरी जानकारी प्राप्त कर ली गई। जानकारी में किसी प्रकार का भ्रम नहीं था और सामने प्रेम का अथाह सागर। प्रेम के सागर में किसका मन डुबकी लगाने का नहीं होता है, सबका होता है। मैंने भी डुबकी लगाने की ठान ली… इजहार हो गया और स्वीकृति भी प्राप्त हो गई।
इस बार कुछ ज्यादा ही सीरियस हो गया प्रेम में। शाम को नित्य मेल मिलाप शुरु हुआ। नित्य सही समय पर कमरे से निकलना और दो घंटे बाद वापस आना पड़ोसन भाभी जी के लिए भी शायद शोध का विषय बन गया था, लेकिन उसने अपने कामों के चलते कभी पीछा कर तहकीकात की कोशिश नहीं की। किंतु उसके प्रश्न और चाय का अनुनय-विनय सदैव होता रहता था। मैं यह समझ इसे नकारने के भाव से कल पर छोड़ देता कि कंही वो नियत समय पर समय पर गार्डन (बाहर) जाने का भेद तो ना पूछ ले या जानने के कोई अतिरिक्त प्रयास ना कर ले।
अब प्रेम परवान चढ़ा, गार्डन की भीड़ बाधा थी। मन चंचल था पर हाथ पैर और शरीर के अंग परिस्थितियों और भीड़ के चलते नियंत्रित थी, किंतु मैं बहुत सजग था प्रेम को लेकर कभी समय को नहीं भूला ना वो भूली नित्य मुलाकात होती रही उसकी नियमित दिनचर्या के बावजूद।
एक दिन वो नहीं आई, मेरा मन सिहर उठा किसी अनहोनी की आशंका हो उठी। मन अनियंत्रित था किंतु कोई संकेत नहीं था तो मन को कल की तस्सली दे शांत कर दिया। पर यह दिन बैरी नहीं था दूसरे दिन वो मिल ही गई। आज थोड़ी उदास थी… पर मैं उसे देख खुश था। उससे कल के नहीं आने का कारण जाना तो पता चला कि उसकी कंपनी ने उसे दो महीने से तनख्वाह नहीं दी जिसके कारण उसे किराया देना मुश्किल हो गया। दो महीने से किराया नहीं दिया और ना ही किराने की दुकान का बिल दे पायी, कल वो किसी परिचित से पैसे लेने गई, किन्तु परिचित नहीं मिला। उसे कल तक किसी भी हालत में किराया देना जरूरी है, अन्यथा मकान मालिक उसे रहने नहीं देगा। फिर मैं लड़की ऐसा घर कहाँ ढूंढ सकूंगी। साथ भी बिना एडवान्स दिए कोई अपना घर क्यों उसको किराये पर देगा।
अब मेरे लिए सभी राह बंद हो गई है, एक तुम ही हो जो मेरी कोई मदद कर सकते हो। मेरे पास इतने पैसे कहाँ थे लेकिन मेरी फीस के और कुछ आगामी शिक्षा की प्रवेश परीक्षा के 20,000 थे। मेरे सामने दो विकल्प थे शिक्षा या प्रेम।
प्रेम के सागर के सामने प्रेम को नकार देना मुझ जैसे प्रेमी को मंजूर नहीं था, मैंने प्रेम को सुना। आखिर उसका कारण भी था, इतना प्रेम करने वाली दूसरी लड़की कहाँ मिलेगी, और यह भी है प्रेम की सागर इसे भी दूसरा प्रेम ढूँढने में कितना वक़्त लगेगा, दिक्कत तो तब होती है, जब सामने वाला प्रेम की परिभाषा भी नहीं जानता हो, लेकिन जो जानते हैं उन्हें इस संसार में अगला प्रेम ढूँढने में क्या वक़्त लगता है।
मैने अगले दिन उसे 15000 दे दिए ताकि वो अपना बकाया चुका सके। उसने दिल से धन्यवाद दिया और कल पुनः मिलने के वादे के साथ तनख्वाह मिलते ही पुनः चुकाने का भी वादा किया।
लेकिन उसके बाद वो मुझे कभी नहीं मिली, मैं उसका नित्य इंतजार करता रहा। कुछ दिन बाद मैं उसके मकान मालिक से पूछने और उसे देखने के लिए गया तो उसने बताया कि वह तो मकान छोड़ कर बिना किराया दिए रात में ही फरार हो गई, कमरे में लगे पंखे और कुछ अन्य आइटम को लेकर, कभी उसका पता चले तो मुझे बताना।
इस बार कोई गहरा धक्का नहीं लगा अब तो सब कुछ वार्षिक था, जैसे किसी कक्षा को पास किया वैसे ही कोई फुर्र हो गया, लेकिन अब एक और विकल्प खुल गया..
चार….. (प्रेम)
आज भाभीजी बाहर ही मिल गई, भाभी जी ने चाय के लिए बोला। अब कोमल कलियों से मन भर गया था, आज समय के थपेड़े खाए अनुभवी भाभी जी के यहाँ चाय पीना स्वीकार किया। घर काफी अच्छा था। मैं घर को निहार ही रहा था कि भाभीजी चाय लेकर उपस्थित हुई। वो आकर मेरे से सटकर सोफ़े पर सटकर बैठ गई।
बड़े प्रेम से चाय दी और मुस्कराते हुए बाते करने लगी। आज उनकी मुस्कराहट पर मर मिटा और उनसे प्रेम हो गया। वो प्रेम से बाते करने लगी जैसे मेरे प्रेम मे उनके प्रेम भाव समागम हो गए हों। चाय की चुस्की की आवाज ऐसी प्रतीत हो रही थी जैसे कोई माहौल को खुशनुमा करने के लिए संगीत बजाया जा रहा हो।
पूछने लगी वो जो भाग गई उससे कुछ मिला कि नहीं। मैंने झेपते हुए कहा क्या? वो बोली - वही जो आपको लेना था, मैंने फिर पूछा, क्या?
भाभीजी बोली नासमझ मत बनो मैं सब जानती हूँ, बाजू वाले रिंकू के पापा और सोनिया के चाचा जो मेरे पास लेने आते हैं, वही? कभी-कभी किराणे की दुकान वाला जीतू तो कभी भोलू नाई भी लेने आते हैं, कभी कोई और भी। बस 500 लगते हैं।
मैं स्तब्ध था चाय खत्म हो गई मैं जाने को भाग रहा था, लेकिन भाभीजी पूछे जा रहीं थीं 500 हो तो आ जाना, चाय भी मिलेगी बाकी… समझ गए होंगे।
मैंने जरूरी काम का बोल अपना रास्ता लिया।
आज कमरे में आ कसम ले ली, अब किसी से प्रेम नहीं करूंगा।
