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Mradul Kumar Kulshrestha

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2.6  

Mradul Kumar Kulshrestha

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मेरे जीवन की खट्टी मीठी यादें

मेरे जीवन की खट्टी मीठी यादें

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जिस समय हम लोग बड़ौदा रहते थे तब एक बार मैं और मेरी पत्नी नीलम शापिंग करके घर लौट रहे थे। रास्ते में सड़क पर सामने से बारात आ रही थी जिसके कारण मुझे अपना स्कूटर वहाँ रोकना पड़ा। थोड़ी देर बाद जब बारात आगे निकल गई तो मैं अपना स्कूटर आगे बढ़ा कर निकल गया। रास्ते में एक काशी विश्वनाथ शिव मन्दिर पड़ता था जहाँ हम लोग कभी कभी दर्शन करने आया करते थे। जब हम मन्दिर के नज़दीक पहुंचे तो मैने नीलम से पूछा कि दर्शन करने के लिए रुकना है क्या ? मुझे कोई उत्तर नहीं मिला तो दोबारा कहा " अरे मैं तुमसे ही पूछ रहा हूँ। फिर भी कोई उत्तर नहीं मिला तब मैंने अपना स्कूटर रोक कर पीछे देखा तो श्रीमती जी पीछे की सीट पर नहीं थीं। मैं समझ गया कि जहाँ बारात के कारण स्कूटर रोका था ये लगता है वहीं स्कूटर से उतर गई होंगी। मैने तुरन्त यू टर्न लिया और वापस लौटा। लगभग एक किलोमिटर चलने पर ये सामने से पैदल आती दिखीं। मुँह गुस्से से व धूप के कारण लाल हो रहा था। मैने यू टर्न लेकर स्कूटर उनके सामने खड़ा कर दिया। वे चुपचाप स्कूटर पर बैठ गईं। फिर दोबारा वही मन्दिर पड़ा लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि दर्शन करना हैं क्या। खैर घर आकर पूछा कि तुमने आवाज़ क्यों नहीं लगाई कि तुम स्कूटर पर बैठ नहीं पाई थी। गुस्से से बोलीं तुम सुनो तब ना। मैने कहा कि बारात के शोर के कारण शायद सुनाई नहीं दिया होगा। आज भी याद करके हँसी आती है।       



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