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Children Stories Classics Inspirational

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करण और जादुई संदूक

करण और जादुई संदूक

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टूनपुर बहुत ही सुंदर गाँव हैं,। गाँव के चारों ओर ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ हैं और बीच में हरे-भरे खेत लहलहाते हैं, बहुत समय पहले गाँव में एक लड़का रहता था, जिसका नाम था करण। करण इतना आलसी था कि सुबह सूरज निकलने के बाद भी खर्राटे भरता रहता था!

उसके पिता, जो एक मेहनती किसान थे, अक्सर उसे डाँटते रहते थे। "करण, उठ जा! देख, सूरज सिर पर आ गया और तू अभी भी सो रहा है। ऐसे कैसे चलेगा रे मेरे लाल?"

उसके आलसीपन और निकम्‍मेपन के लिए सिर्फ उसके पिता ही नहीं बल्कि गॉंव के सभी लोग उसको ताने मारते रहते! उससे कहते !अरे करण तुम्‍हारा तकिया कहॉं है, "तुमसे ज्यादा मेहनत तो तुम्हारा तकिया करता है!" "भाई, तुम्हारी तो नींद भी तुम्हें देखकर ऊब जाती होगी!"

 एक दिन, उसे भला बुरा कहते-कहते पिताजी ने डाँटते हुए घर से निकलने की धमकी दे डाली, इस बार की डांट कुछ ज़्यादा ही पड़ गई, तो करण गुस्‍से में गाँव की सबसे पुरानी पहाड़ी की ओर चल पड़ा।

यह पहाड़ी 'बूड़ी पहाड़ी' कहलाती थी, क्योंकि यहाँ गाँव के सबसे पुराने पेड़ और एक छोटा-सा मंदिर था। करण वहाँ जाकर एक बड़े से पत्थर पर बैठ गया और अपनी किस्मत को कोसने लगा।

वह भगवान को दोष देते हुए कह रहा था, "भगवान ने सबको टैलेंट दिया, मुझे बस नींद देने में ज्यादा उदार हो गए!" "भगवान ने ही तो सब लिखा है न! तो अगर मैं सो रहा हूँ, तो ये भी उसी की मर्ज़ी है!" मुझे ऐसा बाप और ऐसा परिवार क्‍यों ही दिया भगवान, क्‍या में इतना बुरा हूं |

तभी, उसकी नज़र एक चमकती हुई चीज़ पर पड़ी। पत्थरों के बीच, मिट्टी में आधा गड़ा हुआ, एक पुराना-सा लकड़ी का संदूक था। वह दिखने में तो मामूली था, लेकिन उससे एक हल्की-सी चमक निकल रही थी।

करण ने उत्सुकता से उसे खोला। जैसे ही ढक्कन ऊपर उठा, एक सुनहरी रोशनी निकली और चारों ओर फैल गई! उस रोशनी के साथ एक मधुर, धीमी आवाज़ गूंजी, "मैं वो शक्ति हूँ जो बिगड़े काम बनाती है। लेकिन याद रखना, मेरा दुरुपयोग मुझे कमज़ोर कर देगा।"

करण पहले तो डर गया, लेकिन फिर उसकी आँखों में चमक आ गई। "बिगड़े काम बनाना?" उसने सोचा। अगले ही दिन, उसने इस शक्ति का पहला प्रयोग किया। गाँव के एक किसान, रामू चाचा, की बैलगाड़ी का पहिया कीचड़ में फँस गया था।

करण ने रामू चाचा से कहा- चाचा मैं कोई मदद करूं! तो हंसते हुए बोले रहने दे बेटा, तेरे आराम के देवता कहीं नाराज न हो जाए....

करण को उनका यह मजाक बुरा लगा लेकिन तभी उसने संदूक को याद किया, और देखते ही देखते, जोरदार बारिश होने लगी, बारिश के पानी से सारा कीचढ़ बह गया, और पहिया बाहर आ गया!

रामू चाचा खुशी से झूम उठे। लेकिन उन्‍हें अब तक करण के जादू का अहसास नहीं हुआ, धीरे-धीरे, करण ने गाँव के लोगों की मदद करना शुरू कर दिया। किसी की गाय खो गई थी, तो किसी के खेत में पानी नहीं आ रहा था।

करण संदूक की शक्ति से सब ठीक कर देता। जल्द ही, उसकी ख्याति न केवल पूरे टूनपुर में, बल्कि आसपास के सभी गाँवों में फैल गई। लोग उसे "जादूगर करण" कहने लगे।

लोग करण को मनचाहा इनाम देते। उसे कई लोग अपनी ज़मीनें तक दान में देकर चले, और उसने गाँव के बाहर एक बड़ी-सी पशुशाला बना ली, जिसमें बहुत सारे जानवर जानवर रहते थे।

अब वह पहले जैसा आलसी करण नहीं रहा था, बल्कि गाँव का सबसे धनी व्यक्ति बन गया था।

समय के साथ, करण के अंदर अहंकार आ गया। वह अब छोटे लोगों के बीच बैठना या उन्हें समय देना पसंद नहीं करता था। वह केवल अमीर लोगों के काम करता, जो उसे और धन देते थे।

जैसे-जैसे उसका लालच बढ़ता गया, संदूक की शक्ति धीरे-धीरे कमज़ोर होती चली गई। रोशनी हल्की पड़ने लगी और आवाज़ धीमी हो गई।

एक शाम, जब संदूक से कोई रोशनी नहीं निकली, तो करण घबरा गया। वह दौड़ता हुआ उसी 'बूढ़ी पहाड़ी' पर वापस गया।

जब वह शक्ति को फिर से जगाने की कोशिश कर रहा था, तो उसके मन में वो सारे गलत काम घूमने लगे जो उसने किए थे। उसे महसूस हुआ कि उसने शक्ति का सदुपयोग करने के बजाय, उसका उपयोग सिर्फ अपने लालच को पूरा करने के लिए किया था। उसका मन पश्चाताप से भर गया और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

उसने संदूक के पास बैठकर कांपते हाथों से कहा, “ओ अद्भुत शक्ति! अगर तू मेरी आवाज़ सुन सकती है… तो मुझे एक बार और माफ़ कर दे। मैंने गलती की… बहुत बड़ी गलती। मैं भूल गया कि शक्ति का अर्थ दूसरों से ऊपर उठना नहीं, बल्कि दूसरों को ऊपर उठाना होता है।”

अचानक संदूक से हल्की रोशनी निकलने लगी। वह रोशनी पहले नीली, फिर सुनहरी हो गई। हवा में वही मधुर स्वर गूंजा —
“करण, शक्ति का अर्थ दया है, और दया का अर्थ विनम्रता।
तूने जब लोगों के लिए किया, तब मैं पूर्ण थी;
जब तूने अपने लिए किया, तब मैं मौन हो गई।”

करण की आँखों से आँसू झरने लगे। उसने हाथ जोड़कर कहा, “अब मैं सिर्फ दूसरों के भले के लिए काम करूंगा, बिना किसी लालच के।”
इतना कहना था कि संदूक चमकने लगी — धड़ाम! — और फिर शांत हो गई।

अगली सुबह जब करण ने आँखें खोलीं, तो पहाड़ी पर कोई संदूक नहीं था — केवल एक छोटी-सी चमकीली चाबी और एक पत्ते पर लिखा संदेश था:
“सच्ची शक्ति उस दिल में रहती है जो दूसरों के लिए धड़कता है।” ''तुम्‍हारी मेहनत ही वह शक्ति है''|

करण उस दिन से गाँव लौट आया। उसने मेहनता करना चालू कर दिया, अब वह लोगों की मदद अपनी मेहनत से करता, वह अपनी संपत्ति से जरूरतमंदों की मदद करता, अपनी पशुशाला को गॉंव के सभी जानवरों को चारागृह बना बना दिया, जहाँ बीमार जानवरों का मुफ्त इलाज और गॉंव के सभी जानवरों को भरपूर चारा मिलता रहता

उसने सबको सिखाया — “शक्ति चाहे जादू की हो या ज्ञान की, उसका मूल्य तभी है जब वह सबके भले में लगे।”

गाँव के बच्चे उसे अब "करण भैया" कहकर बुलाते थे, क्योंकि वह अब सबकी मदद करता था और हमेशा मुस्कराता रहता था।
और जब भी कोई पूछता — “भैया, वो चमत्कारी संदूक कहाँ गया?”
करण मुस्कराकर कहता —
“अब वो संदूक मेरे दिल में रहता है… और शायद तुम्हारे दिल में भी!”
और इस तरह, आलसी करण, एक सच्चा और दयालु व्यक्ति बन गया, जिसने सीख लिया कि सच्ची खुशी स्‍वयं की मेहनत और दूसरों की मदद करने में है।


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