काग़ज़ का नोट
काग़ज़ का नोट
खेलते वक़्त 5 साल के कृष्ण ने नीले आसमान में लाल पतंग उड़ते देखी तो वो अपने आप को रोक नहीं पाया और लाला जी की दुकान पर पतंग लेने चल पड़ा।
"क्या चाहिए बच्चूआ?" लाला जी बोले।
"मुझे लाल पतंग चाहिए," कृष्ण शर्माते हुए बोला।
लाला जी ने लाल पतंग निकाल कर नन्हे कृष्ण को दे दी। कृष्ण पतंग देखकर खुश हो गया और दुकान से बाहर निकलने लगा।
"अरे, 10 का नोट तो दे!" लाला जी ने पीछे से बोला।
"नोट? ये क्या होता है?" कृष्ण मासूमियत के साथ बोला।
"अरे, नोट मतलब पैसा," लाला जी थोड़ा चिढ़चिढ़ाते हुए बोले।
"मेरे पास तो कोई नोट नहीं है। ये नोट कैसा दिखता है?" कृष्ण ने पूछा।
"अरे, नोट काग़ज़ का होता है रे! तुझे इतना भी नहीं मालूम?" लाला जी झुंझलाहट के साथ बोले।
"काग़ज़ का? लेकिन ये पतंग भी तो काग़ज़ की है। तो दोनों में भला क्या अंतर?" कृष्ण अपनी उत्सुकता छुपा न सका।
"पतंग के काग़ज़ का कोई मोल नहीं, लेकिन काग़ज़ का नोट भूखे को खाना भी खिला सकता है, समझा? चल भाग यहाँ से! जब नोट मिल जाए, तब पतंग ले जाना।" ये कहते हुए लाला जी ने कृष्ण से पतंग छीन ली।
कृष्ण दुखी मन से घर पहुँचा।
"क्या हुआ लल्ला?" माँ ने कृष्ण को पुचकारते हुए पूछा।
"मुझे लाल पतंग चाहिए थी, लेकिन लाला जी ने मुझे नहीं दी," कृष्ण रोते हुए बोला।
"बस इतनी सी बात? ला, मैं तेरे लिए काग़ज़ से पतंग बना देती हूँ और साथ में नाव भी बनाकर देती हूँ," माँ मुस्कुराते हुए बोली।
"क्या आप मेरे लिए काग़ज़ का नोट भी बनाकर दे सकती हो माँ? लाला जी ने बोला, उससे तो खाना भी लाया जा सकता है।" कृष्ण उछलते हुए बोला।
"नहीं लल्ला, काग़ज़ का वो नोट बनाया नहीं जा सकता, बल्कि कमाया जाता है," माँ ने समझाते हुए कहा।
"कमाना? ये कमाना क्या होता है माँ? क्या मैं भी कमा सकता हूँ?" कृष्ण ने एक के बाद एक सवाल पूछ डाले।
"बस ये समझ लो कि जब आप कोई मेहनत से काम करो किसी की मदद के लिए और बदले में आपको कुछ मिले, वही होता है कमाना। और हां कमा सकते हो, लेकिन अभी नहीं। उसके लिए तुम्हें पहले खूब पढ़-लिखकर काबिल होना पड़ेगा। इसलिए मैंने तुम्हारा दाखिला स्कूल में करवा दिया है। वहाँ तुम दिल लगाकर पढ़ाई करना," माँ ने कृष्ण को प्यार से समझाया।
"वाह! अब मैं भी खूब कमाऊँगा और मेरे पास भी बहुत सारे काग़ज़ के नोट होंगे। फिर मैं खूब सारी पतंगें लूँगा—लाल, नीली, पीली!" कृष्ण नाचते हुए बोला।
"हाँ, लेकिन लल्ला, काग़ज़ का नोट दुनिया भर के सामान ख़रीद सकता है, पर खुशियाँ नहीं। वो ख़ुशी तुम्हें हमेशा दूसरों की मदद करने पर ही मिलेगी। इसलिए वो काग़ज़ का नोट सिर्फ़ अपने खाने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों की मदद के लिए भी इस्तेमाल करना," माँ ने प्यार से कृष्ण के सिर पर हाथ फेरा।
कृष्ण ने खुशी से अपने सिर को हाँ में हिलाया और अपनी काग़ज़ की नाव से खेलने लगा और उसने स्कूल के लिए अपना बस्ता भी तैयार कर लिया।
(समाप्त)
यह कहानी मेरा स्वरचित है।
Name: Pooja Varshney
gmail: poojavarshney19@gmail.com
