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Veerpal Negi

Others

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Veerpal Negi

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झुर्रियों में लिखा जीवन।

झुर्रियों में लिखा जीवन।

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बुज़ुर्ग : जहाँ मेरा कल आज भी साँस लेता है

उत्तराखंड  के गढ़वाल, कुमाऊँ के  उन सभी सम्मानित   बुज़ुर्गों को सादर समर्पित, जिन्होंने हमें बोलना सिखाने से पहले इंसान बनना सिखाया।
— वीरपाल सिंह नेगी
बहुत समय बाद आज फिर मैं अपने गाँव लौटा था।
 दूर कहीं किसी गाय के गले में बँधी घंटी की मधुर आवाज़ सुनाई दे रही थी। किसी घर से चूल्हे का धुआँ धीरे-धीरे आसमान की ओर उठ रहा था।
सब कुछ वैसा ही था...
लेकिन फिर भी कुछ बदल गया था।
घर के आँगन में कदम रखते ही मेरी नज़र अनायास उस पुरानी दरी (बकरी के बालों से बना आसन) जिसे "कौंठ" कहा जाता था वह आज भी वहीं था। समय ने उसके रंग को फीका कर दिया था, किनारों को घिस दिया था, लेकिन वह अब भी उसी गरिमा के साथ  खड़ा था।
फ़र्क केवल इतना था कि...
आज उस दरी/ कौंठ पर कोई नहीं बैठा था।
जिस पर कभी मेरे दादाजी बैठते थे। सफ़ेद दाढ़ी, झुर्रियों से भरा शांत चेहरा, आँखों में अपार स्नेह और माथे पर जीवन भर के संघर्ष की चमक। उनके हाथों की नसें भले उभर आई थीं, पर उन्हीं हाथों ने न जाने कितने लोगों को सहारा दिया था।

अचानक ऐसा लगा जैसे आँगन फिर से भर गया हो...
दादाजी उसी आसन पर बैठे हैं।
दादी रसोई से आवाज़ दे रही हैं—"पहले बाबूजी को खाना परोस दो।"
पिताजी बाहर से लौटते ही बिना कुछ बोले दादाजी के चरण छूते हैं। माँ पीतल के लोटे में पानी रखती हैं। हम बच्चे दौड़कर दादाजी की गोद में चढ़ जाते हैं और वे मुस्कुराकर कहते—
"अरे... पहले साँस तो लेने दो।"
उस समय समझ नहीं था कि यह केवल एक परिवार नहीं, बल्कि संस्कारों का संसार था।
हमने कभी किसी विद्यालय में नहीं पढ़ा कि बड़ों का सम्मान करना चाहिए। हमने केवल अपने घर में देखा कि पिताजी अपने पिता के सामने कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं करते थे। मतभेद होते होंगे, पर मनभेद कभी दिखाई नहीं देते थे।
तभी शायद हमारे भीतर भी सम्मान बिना पढ़ाए उतर गया।
उत्तराखंड के पहाड़ी गाँवों की सबसे बड़ी पहचान उनके घर नहीं थे, उनके बुज़ुर्ग थे।
वे किसी परिवार के सबसे वृद्ध सदस्य भर नहीं होते थे; वे चलते-फिरते इतिहास थे। उन्हें देखकर मौसम पहचाने जाते थे। उनकी आँखें बादलों का मिज़ाज पढ़ लेती थीं। उनके अनुभव खेतों को बताते थे कि बीज कब बोना है। उनकी सलाह झगड़े समाप्त कर देती थी। उनकी चुप्पी भी शब्दों से अधिक असर रखती थी।
गाँव में जब भी कोई निर्णय होना होता, लोग पहले किसी बुज़ुर्ग के आँगन में बैठते थे। वहाँ कानून की किताबें नहीं खुलती थीं, जीवन के अनुभव खुलते थे। निर्णय केवल सही नहीं होता था, न्यायपूर्ण भी होता था। शायद इसलिए गाँव छोटे थे, पर रिश्ते बहुत बड़े थे।
आज सोचता हूँ...
वे लोग इतने पढ़े-लिखे नहीं थे, फिर भी जीवन को हमसे कहीं अधिक समझते थे।
उन्होंने कभी "व्यक्तित्व विकास" की किताबें नहीं पढ़ीं, लेकिन उनका पूरा जीवन ही चरित्र निर्माण का विद्यालय था।
शाम ढलती थी, तो घर के आँगन में चूल्हे की आँच के साथ पूरा परिवार भी एकत्र हो जाता था। दादी ऊन कातती रहतीं, दादाजी किसी पुरानी घटना का ज़िक्र छेड़ देते। हम बच्चे गोल घेरा बनाकर बैठ जाते।
उनकी कहानियों में राजा कम होते थे, इंसान ज़्यादा होते थे।
वे हमें यह नहीं सिखाते थे कि जीवन में कितना कमाना है; वे यह सिखाते थे कि जीवन में कितना बचाए रखना है—अपना चरित्र, अपना विश्वास और अपने रिश्ते।
आज दुनिया बहुत आगे बढ़ गई है।
हमारे पास पहले से बेहतर घर हैं, तेज़ गाड़ियाँ हैं, बड़े विद्यालय हैं, दुनिया को जोड़ देने वाला इंटरनेट है।
लेकिन कभी-कभी मन पूछता है—
क्या हमारे बच्चे उतने ही भाग्यशाली हैं, जितने हम थे?
उन्हें खिलौने अधिक मिले हैं, लेकिन क्या उन्हें दादा की उँगली मिली?
उन्हें मोबाइल मिल गया, लेकिन क्या दादी की कहानी मिली?
उन्हें "डैड" कहना आ गया, लेकिन क्या "पिताजी" कहते समय आँखों में उतर आने वाला वह सहज सम्मान भी मिला?
मैं किसी शब्द का विरोध नहीं करता।
समय बदलता है, भाषा बदलती है, जीवन भी बदलता है।
लेकिन यदि परिवर्तन की इस दौड़ में हमारे बुज़ुर्ग पीछे छूट जाएँ, तो समझिए हम आगे नहीं बढ़े... हम अपनी जड़ों से दूर चले गए।
उस खाली चौकी के सामने बैठे-बैठे मेरी आँखें भीग गईं।
मुझे लगा...
चौकी आज भी भरी हुई है।
उस पर दादाजी नहीं बैठे, लेकिन उनके संस्कार बैठे हैं।
उनकी सीख बैठी है।
उनका आशीर्वाद बैठा है।
और शायद...
मेरा पूरा बचपन आज भी वहीं बैठा मेरा इंतज़ार कर रहा है उस खाली दरी/आसन के सामने बैठे-बैठे मेरी आँखें भीग गईं।
मुझे लगा...
चौकी आज भी भरी हुई है।
उस पर दादाजी नहीं बैठे, लेकिन उनके संस्कार बैठे हैं।
उनकी सीख बैठी है।
उनका आशीर्वाद बैठा है।
और शायद...
मेरा पूरा बचपन आज भी वहीं बैठा मेरा इंतज़ार कर रहा है। उसी क्षण स्मृतियों का एक दरवाज़ा खुला और मैं बरसों पीछे चला गया।
वह सर्दियों की एक सुबह थी। पहाड़ों पर रात भर पाला पड़ा था। आँगन की घास मोतियों की तरह चमक रही थी। दादाजी हमेशा की तरह सबसे पहले उठ चुके थे। उन्होंने गोशाला का दरवाज़ा खोला, गाय के सिर पर हाथ फेरा और फिर आँगन के बीच खड़े होकर उगते सूरज को निहारा। मैं उनींदी आँखों से उन्हें देख रहा था।
उन्होंने मुझे देखकर मुस्कुराते हुए कहा—
"उठ गया मेरा गोलू? सूरज से पहले उठने वाला आदमी दिन से कभी हारता नहीं।"
उस समय मैं उस वाक्य का अर्थ नहीं समझ पाया था। आज जीवन की अनेक यात्राएँ तय करने के बाद समझता हूँ कि वे केवल सुबह जल्दी उठने की बात नहीं कर रहे थे; वे जीवन में समय, अनुशासन और कर्म की बात कर रहे थे।
उनके पास कोई बड़ी डिग्री नहीं थी। उन्होंने कभी किसी विश्वविद्यालय की चौखट नहीं देखी थी। लेकिन जीवन ने उन्हें इतना पढ़ाया था कि उनके एक-एक वाक्य में अनुभव का पूरा ग्रंथ छिपा रहता था।
गाँव में किसी के घर नई छत डलनी होती, तो दादाजी सबसे पहले पहुँचते। कोई बीमार पड़ जाता, तो उसके खेत की चिंता गाँव के लोग मिलकर करते। किसी बेटी की शादी होती, तो पूरा गाँव उसका अपना परिवार बन जाता। उस समय किसी निमंत्रण-पत्र की आवश्यकता नहीं होती थी। दुःख और सुख दोनों की ख़बर हवा से भी तेज़ फैलती थी।
मुझे याद है, एक बार हमारे गाँव में एक अनजान यात्री रास्ता भटक गया था। शाम ढल चुकी थी। ठंडी हवा चल रही थी। वह थका हुआ हमारे आँगन तक पहुँचा।
उसने संकोच से कहा, "रात हो गई है... यदि कहीं ठहरने की जगह मिल जाए..."
दादाजी ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही कहा—
"पहले भीतर आओ बेटा!
न उसका नाम पूछा गया, न जाति, न धर्म, न पहचान।
माँ ने तुरंत चूल्हे में आग जलाई। दादी ने कहा, "रोटियाँ थोड़ी और बेल दो।"
उस रात मैंने देखा कि घर में जितना घी बचा था, वह उस अतिथि की थाली में चला गया। हम बच्चों ने बिना किसी शिकायत के सादी दाल खाई। हमें तब भी यह नहीं लगा कि हमारे हिस्से का कुछ कम हो गया है। क्योंकि बचपन से हमने यही देखा था कि अतिथि सत्कार से बड़ा कोई  सम्मान नहीं होता।
आज जब बड़े-बड़े होटलों के बाहर "अतिथि देवो भवः" लिखा देखता हूँ, तो अनायास दादाजी की मुस्कान याद आ जाती है। उन्होंने कभी यह वाक्य नहीं पढ़ा था, लेकिन उसे हर दिन जीते थे।
दादाजी कहा करते थे—
"जिस घर से भूखा आदमी लौट जाए, उस घर की बरकत भी उसके साथ चली जाती है।"
उनकी बातें सुनकर लगता था कि जैसे जीवन बहुत सरल है।
लेकिन आज समझ आता है कि सरल जीवन जीना ही सबसे कठिन कला है।
गाँव के बुज़ुर्ग केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं रहते थे। वे पूरे गाँव के दादा होते थे। किसी बच्चे को डाँटना हो, किसी युवक को समझाना हो या दो परिवारों के बीच मनमुटाव मिटाना हो—सबकी पहली नज़र उन्हीं की ओर उठती थी।
मैंने कभी उन्हें ऊँची आवाज़ में बोलते नहीं देखा।
वे कहते थे—
"बेटा, नदी जितनी गहरी होती है, उतना ही कम शोर करती है।"
शायद इसलिए उनके शब्द कम थे, लेकिन असर बहुत गहरा था।
आज सोचता हूँ, हम कितनी जल्दी बोलना सीख गए, लेकिन सुनना शायद उनसे सीख ही नहीं पाए।
समय का पहिया घूमता रहा।
मैं पढ़ाई और काम के सिलसिले में गाँव से दूर निकल आया। शहरों की चकाचौंध, भागती सड़कें, ऊँची इमारतें और समय से लड़ती ज़िंदगियाँ मेरे जीवन का हिस्सा बन गईं।
वर्षों बाद जब लौटा, तो बहुत कुछ बदल चुका था।
कुछ पुराने घरों पर अब सीमेंट की चमक थी।
लकड़ी के दरवाज़ों की जगह लोहे के गेट लग गए थे।
आँगन पहले से बड़े थे, लेकिन उनमें बैठने वाले लोग कम हो गए थे।
शाम की चौपाल की जगह अब हर कमरे में एक-एक मोबाइल की रोशनी थी।
सब कुछ आधुनिक था...
लेकिन उस आधुनिकता में मुझे एक सन्नाटा सुनाई देता था।
मैंने देखा, घर के सबसे छोटे बच्चे ने अपने पिता को पुकारा—
"डैड...!"
मैं मुस्कुरा दिया।
शब्द बदल जाने से मुझे कभी शिकायत नहीं रही।
लेकिन उसी क्षण मेरी नज़र कमरे के एक कोने में बैठे उस वृद्ध पर गई, जिनकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया था।
उनकी आँखें दरवाज़े पर थीं...
शायद वे किसी ऐसे व्यक्ति का इंतज़ार कर रहे थे, जो कुछ पल उनके पास बैठकर बस इतना पूछ ले—
"बाबा, आज तबीयत कैसी है?"
उनकी आँखों में शिकायत नहीं थी...
सिर्फ़ प्रतीक्षा थी।
और मैंने उसी क्षण महसूस किया—
समय कभी-कभी घरों को नहीं बदलता...
वह प्रतीक्षा का अर्थ बदल देता है।उनकी आँखों में शिकायत नहीं थी...
सिर्फ़ प्रतीक्षा थी।
और मैंने उसी क्षण महसूस किया—
समय कभी-कभी घरों को नहीं बदलता...
वह प्रतीक्षा का अर्थ बदल देता है।
मैं चुपचाप उनके पास जाकर बैठ गया।
उन्होंने मेरी ओर देखा। पहचानने की कोशिश की। फिर मुस्कुराए। वह मुस्कान वैसी ही थी जैसी बरसों पहले गाँव के हर बुज़ुर्ग के चेहरे पर हुआ करती थी—धीमी, स्नेह से भरी और बिना किसी अपेक्षा के।
"आ गए बेटा?" उन्होंने पूछा।
मैंने उनके हाथ अपने हाथों में ले लिए। वे हाथ पहले जैसे मज़बूत नहीं रहे थे। जिन हथेलियों ने जीवन भर खेत जोते, जंगल से लकड़ियाँ ढोईं, पत्थरों को काटकर रास्ते बनाए, उन्हीं हथेलियों में अब उम्र की थकान उतर आई थी।
कुछ देर तक हम दोनों चुप रहे।
कई बार मौन ही सबसे लंबी बातचीत कर लेता है।
फिर उन्होंने आँगन की ओर देखते हुए कहा—
"जानते हो बेटा... घर तब तक बड़ा नहीं होता, जब तक उसमें रहने वालों के दिल बड़े न हों। पहले हमारे घर छोटे थे, लेकिन किसी के लिए जगह कम नहीं पड़ती थी। आज घर बड़े हो गए हैं... पर कभी-कभी लगता है, दिलों के आँगन थोड़े छोटे हो गए हैं।"
उनकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी।
वह एक युग का अनुभव बोल रहा था।
मैंने पूछा, "बाबा, आपको सबसे ज़्यादा किस बात की कमी महसूस होती है?"
उन्होंने बिना सोचे उत्तर दिया—
"समय की..."
मैंने सोचा, शायद वे अपने जीवन के बचे हुए समय की बात कर रहे हैं।
लेकिन उन्होंने मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिया।
"नहीं बेटा... अपने समय की नहीं। अपने बच्चों के समय की।"
मैं नि:शब्द रह गया।
उन्होंने आगे कहा—
"हम बूढ़ों को दवा से पहले दो पल की बातचीत चाहिए। रोटी से पहले अपनापन चाहिए। और सम्मान... वह तो ऐसा धन है जो देने वाले का भी कम नहीं होता।"
उनकी आँखें अब भीगी नहीं थीं, लेकिन मेरी आँखें नम हो चुकी थीं।
मुझे अपना बचपन याद आने लगा।
जब दादाजी शाम को चौपाल से लौटते थे, तो पूरा घर उनके आसपास बैठ जाता था। कोई उनके पैरों में तेल लगाता, कोई दिनभर की बातें सुनाता, कोई गाँव के समाचार पूछता। वे कम बोलते थे, लेकिन उनके एक वाक्य पर पूरा घर देर तक सोचता रहता था।
आज जानकारी बहुत है...
लेकिन अनुभव सुनने वाला समय कम है।
ज्ञान के स्रोत बढ़ गए हैं...
लेकिन जीवन सिखाने वाले लोग धीरे-धीरे अकेले होते जा रहे हैं।
मैंने बाबा से पूछा—
"क्या आपको लगता है कि आज की पीढ़ी बदल गई है?"
उन्होंने तुरंत सिर हिला दिया।
"नहीं बेटा..."
"पीढ़ियाँ कभी बुरी नहीं होतीं। उन्हें बस जल्दी होती है।"
"हमें भी कभी जल्दी थी। फर्क इतना था कि हमारी जल्दी खेत तक पहुँचने की होती थी, और आज की जल्दी मंज़िल तक पहुँचने की है।"
"बस एक बात का डर है..."
मैंने उत्सुकता से उनकी ओर देखा।
"कहीं मंज़िल की जल्दी में लोग अपने घर का रास्ता न भूल जाएँ।"
उनकी यह बात मेरे भीतर किसी घंटी की तरह देर तक बजती रही।
साँझ ढलने लगी थी।
आँगन में धूप की आख़िरी किरण धीरे-धीरे चौकी से उतर रही थी।
बाबा ने अपनी लाठी उठाई।
धीरे-धीरे खड़े हुए।
फिर मेरी ओर देखकर बोले—
"जब भी लिखना बेटा..."
"हमारी झुर्रियाँ मत लिखना..."
"उनमें छिपे हुए संघर्ष लिखना।"
"हमारे सफ़ेद बाल मत लिखना..."
"उनमें पककर तैयार हुई समझ लिखना।"
"हमारी कमज़ोर चाल मत लिखना..."
"उन पैरों की यात्रा लिखना जिन्होंने अपने बच्चों के लिए कभी थकना नहीं सीखा।"
"और अगर कभी हमारे बारे में लिखो..."
"तो इतना ज़रूर लिखना कि..."
"हमने अपने बच्चों के लिए घर नहीं बनाए थे..."
"हमने घरों के लिए बच्चे बनाए थे।"
मैंने अनायास उनके चरण छू लिए।
उस दिन मुझे लगा...
मैं किसी एक बुज़ुर्ग के सामने नहीं झुका था।
मैं उस पूरी पीढ़ी के सामने नतमस्तक था, जिसने बिना किसी पुरस्कार, बिना किसी पहचान और बिना किसी शिकायत के अपना पूरा जीवन अगली पीढ़ी के नाम कर दिया।
उस दिन लौटते समय रास्ता वही था...
लेकिन मैं पहले वाला नहीं था।
मेरे भीतर कुछ बदल चुका था।...

उस दिन लौटते समय रास्ता वही था...

लेकिन मैं पहले वाला नहीं था।

मेरे भीतर कुछ बदल चुका था।

उस शाम जब मैं अपने पुराने घर के आँगन में लौटा, तो सूरज पहाड़ों के पीछे उतर चुका था। दूर कहीं गौशाला से आती घंटियों की आवाज़ और रसोई से उठती लकड़ी के धुएँ की सुगंध पूरे वातावरण को वैसा ही बना रही थी, जैसा मैंने बचपन में देखा था।

मैं फिर उसी चौकी के सामने जाकर बैठ गया।

हवा का एक हल्का झोंका आया और आँगन के कोने में रखा पुराना पीपल का पत्ता धीरे-धीरे मेरी ओर उड़ आया।

मैंने उसे उठाया और अनायास मुस्कुरा दिया।

दादाजी कहा करते थे—

"पेड़ के सूख जाने का दुःख मत करना बेटा, जब तक उसकी जड़ें ज़िंदा हैं, जीवन लौट सकता है।"

उस दिन पहली बार मुझे लगा कि वे केवल पेड़ की नहीं, परिवार की बात कर रहे थे।

बुज़ुर्ग किसी घर की सबसे पुरानी शाखा नहीं होते...

वे उसकी जड़ होते हैं।

शाखाएँ चाहे जितनी ऊँची चली जाएँ, जड़ों से रिश्ता टूटते ही हरियाली अधिक दिनों तक नहीं टिकती।

आज हम अपने बच्चों को दुनिया जीतने की शिक्षा दे रहे हैं, लेकिन क्या हम उन्हें यह भी सिखा रहे हैं कि घर लौटते समय सबसे पहले किसके चरण छूने हैं?

हम उन्हें अनेक भाषाएँ सिखा रहे हैं, लेकिन क्या हमने उन्हें वह भाषा सिखाई है, जिसमें एक वृद्ध की आँखों का मौन भी समझा जा सके?

हम उन्हें सफलता का अर्थ बता रहे हैं, पर क्या हमने यह भी बताया है कि सबसे सफल वही है जिसके घर का सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति यह महसूस करे कि वह अब भी परिवार का सबसे सम्मानित सदस्य है?

मुझे अपने बचपन का एक और दृश्य याद आया।

बरसात का मौसम था। गाँव का रास्ता टूट गया था। अगले दिन खेतों तक पहुँचना कठिन था।

सुबह जब मैं जागा, तो देखा कि गाँव के सभी लोग हाथों में फावड़े और टोकरी लिए रास्ता ठीक करने में लगे थे। कोई मजदूरी नहीं, कोई आदेश नहीं, कोई सरकारी योजना नहीं।

सबसे आगे वही बुज़ुर्ग थे, जिनकी कमर उम्र के बोझ से झुक चुकी थी।

मैंने दादाजी से पूछा था—

"जब युवा लोग काम कर रहे हैं, तो आप क्यों आए?"

उन्होंने मुस्कुराकर कहा था—

"बेटा, गाँव केवल घरों से नहीं बनता, जिम्मेदारियों से बनता है। जिस दिन बुज़ुर्ग जिम्मेदारी छोड़ देंगे, उस दिन बच्चे जिम्मेदारी सीखेंगे कहाँ से?"

आज वर्षों बाद समझ पाया हूँ कि उस दिन रास्ता केवल मिट्टी का नहीं बन रहा था...

एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी के लिए संस्कारों का मार्ग भी बना रही थी।

समय आगे बढ़ता गया।

कुछ बुज़ुर्ग इस संसार से विदा हो गए।

कुछ घर बदल गए।

कुछ आँगन सूने हो गए।

लेकिन आज भी जब किसी बच्चे को अपने दादा का हाथ पकड़कर चलते देखता हूँ, तो मन में एक विश्वास जाग उठता है कि हमारी संस्कृति अभी पूरी तरह नहीं टूटी है।

आज भी जब किसी घर में बुज़ुर्ग के बैठने के लिए सबसे सम्मानित स्थान सुरक्षित होता है, तो लगता है कि सभ्यता अभी जीवित है।

आज भी जब कोई बेटा अपनी वृद्ध माँ की थाली अपने हाथों से लगाता है, तो विश्वास होता है कि संस्कार अभी साँस ले रहे हैं।

उस दिन जब मैं गाँव से लौट रहा था, तो मैंने एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा।

घर दूर होता जा रहा था।

वह पुरानी चौकी अब दिखाई नहीं दे रही थी।

लेकिन जाने क्यों मुझे लगा...

दादाजी अब भी वहीं बैठे हैं।

उनकी आँखों में वही स्नेह है।

उनके हाथ अब भी आशीर्वाद देने के लिए उठे हुए हैं।

और उनकी आवाज़ आज भी हवा में तैर रही है—

"बेटा, जीवन में कितना कमाया, यह लोग भूल जाएँगे। लेकिन तुमने अपने से बड़े लोगों को कितना सम्मान दिया, यह तुम्हारी अगली पीढ़ी कभी नहीं भूलेगी।"

मैंने हाथ जोड़कर अपने गाँव, अपने आँगन और अपनी स्मृतियों को प्रणाम किया।

उस दिन मैं अपने साथ कोई सामान लेकर नहीं लौटा।

मैं अपने साथ कुछ और अमूल्य चीजें  लेकर लौटा था—

अपने बुज़ुर्गों के संस्कार।

आज जब भी कोई मुझसे पूछता है कि मेरी सबसे बड़ी पूँजी क्या है, तो मैं बिना एक पल रुके कहता हूँ—

"मेरे बुज़ुर्ग..."

क्योंकि उन्होंने मुझे ज़िंदगी जीना नहीं सिखाया...

उन्होंने मुझे इंसान बनना सिखाया।

और आज भी...

जब मैं अपने भीतर झाँकता हूँ...

तो पाता हूँ—

मेरे बुज़ुर्ग कहीं गए नहीं हैं...

वे मेरे निर्णयों में हैं।

मेरे व्यवहार में हैं।

मेरे संस्कारों में हैं।

और सच तो यह है...

जहाँ मेरा कल आज भी साँस लेता है...

वहीं मेरे बुज़ुर्ग आज भी जीवित हैं।

— समाप्त —


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