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दिनेश कुमार कीर

Children Stories Drama Inspirational

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दिनेश कुमार कीर

Children Stories Drama Inspirational

एक लड़की अनजानी सी

एक लड़की अनजानी सी

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परसो रात्रि करीबन साढ़े ग्यारह बजे में ऑफिस से घर को बाइक से निकला ही था की कुछ ही दूरी पर एक लड़की नजर आई सलवार सूट पहने मदद का हाथ लिए इशारे से... 

मैंने बाइक रोकी तो पास से टैक्सी निकल गयी... 

मैंने कहा-जी कहिए... 

वो गुस्से से बोली मैंने टैक्सी को हाथ दिया था, इतनी देर में बड़ी मुश्किल से आया था ओर आपकी वजह से वो भी निकल गया...

मुझे भी बुरा लगा, सोचा - इतनी रात को अकेली लड़की मेरी गलतफहमी की वजह से परेशान हो गई... 

मैंने तुरंत माफी मांगी ओर लिफ्ट के लिए पूछा उसने साफ मना कर दिया मैंने फिर कहा रात बहुत हो चुकी है, ओर आप अकेली हो...

मगर वो तो गुस्साए मूड में थी...

मैंने मन में सोचा चलता हूं यार...

फिर सोचा इस वक्त सुनसान सड़क अकेली लड़की भगवान ना करें कही कुछ गलत हो गया तो...

नहीं... 

मुझे इसकी मदद करनी चाहिए, वरना उस अपराध का दोषी में भी होऊंगा , जोकि मुझसे अंजाने में हो गया, पता नहीं अब कब टैक्सी मिलेगी इसे... 

मैंने कहा ठीक है जबतक आपको टैक्सी नहीं मिलती मै यही कुछ दूर खड़ा रहता हूं चूंकि गलती मेरी है मेरी जिम्मेदारी बनती है इसकी...

वो कुछ नहीं बोली ऐसे ही करीबन आधा घंटा ओर बीत गया समय बारह के पार हो गया मैंने फिर से उससे लिफ्ट के लिए पूछा और कहा अबतक आधा सफर तय कर दिया होता यहां खड़े होने से कोई फायदा नहीं मगर उसने सुनकर अनसुना कर दिया, अजीब उलझन में था उसे अकेले छोड़ने पर मन नहीं था, मन में बेचैनी थी मेरे कही कुछ अनहोनी ना हो जाए फिर सोचा जब मेरे मन में इतनी घबराहट है तो, वो तो एक लड़की है, ओर में तो उसके लिए अनजान कैसे विश्वास होगा, आखिर में भी एक लड़का हूं ओर वो एक लड़की मुझसे ज्यादा तो वो मन में डर रही होगी, अचानक मुझे एक उपाय सूझा मैंने कहा - देखो मेरे घर में भी तुम्हारे जैसी एक छोटी बहन है, ओर तुम भी बिल्कुल वैसी हो मेरी मानो यहां इतनी रात को अकेले रूकना ठीक नहीं है, प्लीज ! मेरे साथ बाइक पर चलो जहां तक तुम्हें अच्छा लगे, मेरे इन शब्दों से वो कुछ राहत के मूड में आई और बोली आप जाइए मैं...

मै कोई ना कोई उपाय कर लूंगी मैंने कहा मुझे ही यहां रूके एक घंटा होने जा रहा है, टैक्सी तो दूर आदमी भी नजर नहीं आ रहा प्लीज चलो मैंने आपको अपनी बहन बोला फिर भी आप मुझपर शक कर रही हो मगर उसने फिर से मना कर दिया तभी मैंने अपना पर्स खोला ओर उससे बोला - देखो... 

इसमें मेरी फोटो है, पहचान पत्र है, ड्राइविंग लांइसेंस, आधार कार्ड है...

इसे अपने पास रख लो, जब अपने घर या किसी सुरक्षित जगह पहुंच जाओ तो लौटा देना...

उसे पर्स में से आधार कार्ड निकाला और पढ़ा ...

दिनेश...

हां मेरा नाम है... 

देखो अब प्लीज मना मत करना... तुम्हारे घर में तुम्हारे मम्मी-पापा, भाई-बहन इंतजार करते होगे...

वैसे कर तो मेरे मम्मी-पापा और बहन भी... 

परेशान भी हो रहे होगें...

अब चलो...

वह थोड़ा सा मुस्कुराई और बाइक पर बैठ गई मैंने पूछा कहा है तुम्हारा घर...

वो बोली... 

आप चलते रहो जहां लगेगा बता दूंगी...

करीबन एक घंटा लगातार बाइक चलती रही वो कुछ नहीं बोली लगभग चालीस किलोमीटर...

अचानक बोली...

बस-बस यहीं रोक दो...

और तुरंत एक सडक से मौहल्ला की ओर जाने वाले रास्ते पर दौड पडी... चंद मिनटों में वो मेरी आँखों से ओझल हो गई .....

खैर मन में सुकून था चलो वह घर के पास तो पहुंच गई....

जैसे-तैसे घर पहुंचा, तो तीन बज चुके थे, पापा बहुत गुस्सा हो रहे थे मम्मी और बहन भी जाग रहे थे...

यकीनन वो सभी चिंतित थे और गुस्सा भी...

सो बिना कुछ बताए मै चुपचाप अपने कमरे में चला गया...

अगले दिन रविवार था, सो आराम से सो रहा था अचानक ग्यारह बजे छोटी बहन ने आकर, झकझोरा...

भैया...

उठो कोई लड़की आई है, उसके, मम्मी-पापा भी है, क्या, कोई लड़ाई कर दिया कया...

और हंसने लगी...

पापा बुला रहे है नीचे...

जल्दी चलो...

पागल है...

मैं और लड़ाई...

शैतान कही की...

अचकच्ची नींद में तुरंत बनियान पहने नीचे आया...

देखा तो वहीं रात वाली लड़की ...

और एक अंकल-आंटी साथ में थे...

ये...

ये यहां कैसे, इसे तो में काफी दूर छोड़कर आया था, इसके घर... 

और मेरा घर तो बहुत दूर...

इससे पहले में कुछ पूछूँ, वो उठकर आई और बोली...

भैया...

हैरान हो गए ना...

मैं यहां कैसे...

आपका पर्स...

जिसमें आपका पैन कार्ड, आधार कार्ड है, उसी से पता लेकर मम्मी-पापा के साथ आई हूं...

आपने बीती रात मेरी इतनी मदद की और मैंने आपको शुक्रिया तक नहीं बोला उल्टा आपके जरूरी दस्तावेज भी ले गई...

पहले शुक्रिया...

फिर क्षमा...

जैसे आपने कहा था मैं भी आपकी छोटी बहन जैसी हूं...

इसके बाद उसके मम्मी पापा ने मुझे ढेरों आशीर्वाद दिए, और काफी देर तक, वो मेरी तारीफें करते रहे फिर अपने यहां सहपरिवार आने का निमंत्रण देकर वह लोग चले गए...

उनके जाते ही पापा ने मुझे सीने से लगा लिया, और कहा मुझे गर्व है, तुझपे दिनेश...

ये की तुमने एक अच्छे बेटे वाली बात...

मगर...

रात को ही बता देता, तो अच्छा होता ना बेकार में तुझे डांटा मैंने...

मैंने कहा - पापा...

आप भी तो मेरी भलाई के लिए ही चिंतित थे...

तभी पापा ने एक बार फिर से मुझे सीने से लगा लिया, मगर...

इस बार मम्मी और छोटी बहन भी आकर मुझसे लिपट गये थे...

दोस्तों मुझे मेरे पापा ने एक बात समझाई है, अकेली लड़की मौका नहीं जिम्मेदारी होती है...


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