धागे से बंधी आत्मा..
धागे से बंधी आत्मा..
जतोग की पहाड़ियों पर जंगलों के बीचोंबीच बना स्कूल। कंधे पर झोला उठाए हम हर रोज़ साथ जाते। घर के उजालों को बाकी बच्चों के साथ बांटते, अंधेरों को अपने-अपने हिस्से की खामोशी में सहेज लेने का ख़ामोश क़रार था हमारे बीच। कभी-कभी रास्ते में बंदर मिलते तो तुम मेरे पीछे छिप जातीं। बातें भले ही कम हों लेकिन हाथों में हाथ ज़रुर होता था। नहीं प्यार जतलाना मकसद नहीं होता शायद ये उस धागे की आत्मा थी।
स्कूल के गेट के भीतर हमारी दुनिया अलग होती। हम अपने-अपने दोस्तों के साथ खेलते, लंच करते। लेकिन उस धागे की आत्मा
ज़िंदगी में पहली बार स्टेज पर चढ़ा, स्कूल की उस छोटी सी दुनिया में नाकारा साबित हुआ, तुमने एक कोने में मेरी रोई आँखों का हाल पूछा।
फिर ज़िंदगी का पहला प्ले, मुझे याद है काका हाथरसी की स्क्रिप्ट। पर्दा गिरने से ऐन पहले दर्शकों की तरफ़ नज़र गई, तालियां बजाते सब एक से दिख रहे थे, लेकिन सबसे पिछली कतार में दीदी तुम थीं। उसी धागे की आत्मा, नज़रों को हाथ थाम कर ले गई हो जैसे। पटाक्षेप करते पर्दे के बीच वो छवि आज भी नज़रों में तैरती है। पहले प्यार को लेकर घर में पहली फिक्र तुम्हारी ही थी।
धागा हम दोनों की जिंदगियों के अलहदा होते रंगों में छिप ज़रुर गया था, लेकिन मौजूद था वहीं। पहली ठोकर से पहले तुमने रास्ता दिखाया, शब्द न तो रुमानी थे न ही ज़ज़्बातों के रेशम से सजे। लेकिन सच खरा था, उसी धागे की आत्मा से जो निकला था। ठेस मेरे दिल को लगी थी, रोकना तुम्हारी बिफरन को पड़ा था।
मेरे दर्द ने उस धागे की आत्मा को पहली बार छुआ था। तुम्हारा सहोदर दुखी भी हो सकता है, तुमसे पहली दफ़ा बर्दाश्त नहीं हुआ था, याद है मुझे।
घर से विदा हो रही थीं तुम। ना तुम्हारी उठती डोली ने सिर्फ़ एक निशब्द विडंबना से भरा था। जिंदगी अब कभी पहले जैसी नहीं होगी। घर के एक हिस्से को ताउम्र तुम्हारी फुर्सत के इंतज़ार की सज़ा मिली थी।
मेरी आँखें तब छलकी थीं, जब किसी ने उलाहना दिया- बहुत निर्दयी हैं आप दूर पार के मेहमान तक रो रहे हैं लेकिन, घर का सबसे छोटा था कंधों ने ज़िम्मेदारी का बोझ बाद में उठाया, तुम्हारी डोली का उससे भी पहले।
उस सुबह जब उस अंजान घर में हमेशा के लिए अकेले होने का एहसास तुम्हारी आँखों से छलक रहा था, मैंने न जाने कहां अपने आँसुओं से गले को भर लिया था। मैं तुम्हारी नसीहतों के बदले खिलखिलाहट भरा हौंसला सौंप कर गया था। पहाड़ी ढलान के रास्ते से गुज़रते एक दफ़ा याद आया था ‘आते-आते उस धागे का टुकड़ा दिल की जेब में डाला था या नहीं?’
नदी पार करने के बाद सामने की सड़क एक वनवास की तरफ़ ले जाने वाली थी। उसके बाद तुम्हारे ग़म, तुम्हारी ख़ुशियाँ सिर्फ छुट्टियों के झरोखे से देख पाया। लेकिन हर बार तुम्हारे चेहरे पर दर्ज होती वक्त की लकीरों से तुम्हारे दिल का हालचाल पूछता आया। कंक्रीट के जंगल के अज्ञातवास में इतना भी अकेला नहीं था। जब-जब रोया न जाने कैसे वहां तुम्हारा प्यार भी भीगा।
हर बार मेरा दुख बिन चिट्ठी-बिन तार तुमसे बात करता रहा। ये उस धागे की आत्मा ही थी शायद जो हमारे बीच का कासिद थी।
जिस चाँद को देखकर तुम मुझे दुल्हन का ख़्वाब दिखाती थीं, वही चाँद कंक्रीट के इस जंगल में मेरे लिए रोटी का टुकड़ा बन गया।
की-बोर्ड पर मशीन की तरह चलती ऊँगलियों के पीछे की कलाइयों की तरह आत्मा भी सूनी है। लेकिन शब्द निकल रहे हैं ये उस धागे की आत्मा ही है शायद।
बचपन में अक्सर अपने टूटे खिलौने जोड़ने के लिए तुम्हारे पास जाता था, इस दफ़ा तुम खुद मौजूद हो। ये उस धागे की आत्मा ही है शायद। तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं फिर भी तुम हो तुम्हारा एहसास है।
ये उस धागे की आत्मा ही है शायद।
