चंदन री माटी
चंदन री माटी
आज हम निकल चुके हैं मेरे प्यारे शहर, जयपुर के लिए हालांकि हम वहां से 1 दिन ही रुक पाएंगे और वहीं से फिर चले जाएंगे माउंडा।
गांव किसको प्यारा नहीं होता। वहां के खेतों - खलियानों की प्रशंसा किसी ने ने न की हो, बच्चों की हंसी - ठिठोली किसके बचपन की यादें ताज़ा न करें ऐसा कुछ कानों ने नहीं सुना।
मेरे परिवार सहित मेरी यात्रा बहुत ही सुन्दर और भजनों को सुन कर बीत रही है। हमारा सफर ट्रेन को पकड़ने की होड़ में बीता। फिर आया लक्ष्मीबाई नगर जिसने शहर यात्रियों का स्वागत ठंड की कब कब आती हुई शीतलहर और कोहरे ने किया। कोहरे को चीरती हुई सूर्य की किरणों का आगमन हुआ जो गरमाहट का एहसास भले ही न दे पाई हो पर इन नव किरणों ने अंतरमन पर जो प्रभाव डाला, वह वहां उपस्थित ही जान सकता है। साथ ही हरियाली ने अपनी अलग ही प्रतिक्रिया दिखाई जिससे ऐसा लग रहा था कि आंखों में चमक आ गई हो। वह नीला गगन सूर्य के साथ ऐसा लग रहा है जैसे किसी प्रतापी राजा के आगमन से डंका बजाती और जयकारा लगाती प्रजा (जो कि बादल है) धरती रूपी राज्यसभा में स्वागत कर रही हो।
जैसे हर कार्य का शुभारंभ गणेश जी से होता है, इसी तरह कुछ औरतों ने भजनों का शुभारंभ भी श्री गणेश गीत से किया। आगे बढ़ने पर हमें पहाड़ पर निर्मित मां चामुंडा देवी के मंदिर के दर्शन हुए। अभी औरतें:-" सांवली सूरत पर दिल दीवाना हो गया" गीत गा रही है। अपनी भारतीय परंपरा में यह जीत रही है कि किसी भी शुभ कार्य में गृह लक्ष्मी या एक स्वर गीत गाती हैं जो अनेकता में एकता का प्रतीक भी है। यह है मेरी दृष्टि परंपराओं में ' लॉजिक ' ढूंढने की। इन गीतों के लिए मैं और क्या कहूं। पर हां यह दावे के साथ कह सकती हूं कि यदि कोई शास्त्रीय संगीत और इन लोकगीतों की जुगलबंदी हो तो लोकगीत ज्यादा सराहनीय होंगे। दोनों अपने आप में सर्वोच्च हैं। शास्त्रीय संगीत को समझने के लिए ज्ञान चाहिए पर लोकगीतों में क्या चाहिए यह मुझे बताने की आवश्यकता नहीं है। हम 6:00 बजे चल दिए थे। कुल सवा घंटे बाद पहुंचे महाकाल की पावन नगरी अवंतिका पर अर्थात उज्जैन। क्या कहने उज्जैन के, जब भी इस नगरी का नाम लो तो मन मैं भक्ति भाव उत्पन्न हो जाता है। यहां पहुंचते ही गीतों ने अपने शब्दों में महादेव और महागौरी के पावन चरित्र को चित्रित किया जिसमें श्री सीताराम जी, श्री राधेश्याम जी, लक्ष्मीनारायण, रिद्धि सिद्धि विनायक, ब्रह्मा जी संग सरस्वती जी और अन्य देवी देवता भी सम्मिलित हुए। उज्जैन पर सूर्य की किरणें बहुत मर्मज्ञ लग रही है जैसे सूरज सीधा महाकाल के चरणों में शीश नवाने आया है।
आगे चलते ही मैं देख रही हूं खेतों को जिसमें अभी अभी बुवाई हुई है। एक खेत ऐसा है जिसके मध्य में लगा है एक बरगद का पेड़। यह मुझे मेरी बूढ़ी नानी यानी कि मेरी ममता बॉस ( मेरी मां) की दादी के देहावसान के दिन की स्मृति कराता है। हालांकि मैं बहुत छोटी थी पर मेरी बूढ़ी नानी के समझदारी के किस्से ( जो उनके सुंदर एवं अच्छे व्यक्तित्व को दर्शाते हैं ) मेरी स्मृति में चित्रित कर जीवित रखते हैं। यह किस्से मेरी मां अपनी मा ( मारवाड़ी में दादी के लिए प्रयुक्त ) को याद कर मुझे सुनतीं हैं। मेरी बूढ़ी नानी थी तो सातवें दशक की पर सोच उनकी इक्कीसवीं सदी की थी। वो कुछ नए प्रयोग करने में मन लगती थीं।
जब से गई तब उनके लिए दुख नहीं हुआ पर उनके किस्सों ने मुझे उन से जोड़े रखा है। उस दिन ऐसा ही खेत देखा था जिस के बीचों-बीच वह बरगद का पेड़ देखा था जो बहुत ही भयानक दिख रहा था। मुझे कुछ याद हो ना हो वह पेड़ तो मस्तिष्क में रचा बसा है। ऐसा बसा है जैसे मैंने उस दिन को इसी चित्र से अंकित कर लिया हो। और ऐसा है भी ।
३०/१०/२१
ट्रेन में सफर गाते - बजाते, खाते - पीते सुस्ताते हुए निकला। सूर्य सर पर आकर कब करने की तैयारी कर रहा था हम लगभग 5:00 बजे जयपुर पहुंच जाएंगे। मेरे मामा जी का फ़ोन आया जो हमें दुर्गापुरा से लेकर जाएंगे, जयपुर और हम तैयार हैं जयपुर के लिए।
कार में सफर सुहाना था और मां, बड़ी मां और मामा जी बातें कर रहे थे। आते ही मामी जी और नानी जी का स्नेह मिला और नाना जी से रात्रि में भेंट हुई। भोजन किया और गांव जाने की तैयारियां कर हम सब थकान से राहत पाने के लिए सोने चले गए।
३१/१०/२१
माउंडा नीम का थाना जिले का एक गांव है। हम गांव दो कार्यों के लिए जा रहे हैं। एक मेरे नाना जी, जो कि मेरे अपने नाना जी के छोटे भाई हैं, का पुस्तकालय अध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त होना और दूसरा उनके पौत्र की सूर्य पूजा। माउंट आ के आजू-बाजू कई गांव और बसे हैं। कार में चलते चलते खेतों खलियान की हरियाली का आनंद उठाते हुए हम पहुंचे, थोई। यहां मेरी मांसी का परिवार रहता है। हमने उन्हें साथ लिया और फिर आया, माउंडा ।
मैं जैसे ही गड़ी से उतरी, वहां की मिट्टी चंदन सी चमक रही थी । कवियों की कही बात , " राजस्थान री माटी चंदन री" स्वयं आभास कर रही हूं । गांव में विकास कार्य तो बहुत हुए पर गांव की हवेली वैसी की वैसी ही है। " ऑल्ड इज़ गोल्ड " ।
हमारी भारतीय संस्कृति में स्वच्छता की बहुत महत्ता है और प्राथमिकता भी इसी को दी जाती है। इसी प्राथमिकता को ध्यान में रखकर मेरी एक नानी जी ने हमें नीम की पत्तियों से बांदनवार बनवाने को कहा। हमने कल के सारे काम निपटा लिए और भोजन करके सो गए।
३१/१०/२१
गांव की सुबह इतनी सुनहरी है जिसका वर्णन करने के लिए शब्द ही नहीं है मेरे पास। हां, इतना ज़रूर कह सकती हूं कि गांव की सुबह सी सुबह नहीं। ऐसा लगता है कि सूर्य सबसे पहले यहीं उदित होता है। चिड़ियों का सवेरा भी शायद यहीं होता है। शीत लहर यहां अभी से आरंभ हो गई है इसलिए सभी अतिथि शॉल स्वेटर में अपने अपने कार्यों में व्यस्त हैं।
अचंभा हो रहा है कि मैं इतनी तड़के कैसे उठ गई। मैंने ऐसी सुबह कई अरसे बाद देखी इसलिए आज मन शांत हो गया। जैसे शहर का भार गांव में आकर उतर गया हो। मेरे और भी मामा - मामी, मासी - मौसा जी है जिनके छोटे-छोटे बच्चे हैं मुझे बच्चे बहुत पसंद है उनको खिलाना मस्ती करना बातें करना मेरी लकड़ी का घोड़ा है। मैं, मेरी बहन, एक भाई और एक उसकी बड़ी बहन, हम चार लगभग एक ही वय के हैं। इनमें से सबसे छोटा मेरी दूसरी मासी का लड़का है, और उससे बड़ी, मैं। जब इनका साथ मिलता है तब तो और भी आनंद आता है।
हम बच्चे हंसी ठिठोली करते हुए दिन बता रहे हैं और बाकी सब सूर्य पूजा की तैयारियों में लगे हैं।
फिर मेरी मासी का आगमन हुआ और उन्होंने सभी से पूछा, " कुण - कुण जारिया छो, बताद्यो । गाड़ियां जारीं छें । " मासी रहवासी तो जयपुर की है पर गांव में आते ही वह अपने लोक भाषा को उतने ही सहज और प्रेम भाव से बोलती हैं जितने सहज भाव से भी सांस लेती हैं। यह उनके भाषा प्रेम को दर्शाता है और मैं इससे प्रभावित हूं ।
मैं अपने नाना जी की मोटर में बैठी हूं। सुबह के साढ़े नौ बज चुके हैं। मैं बचपन से ही घूमने फिरने में जिज्ञासु रही है पर परिस्थितियों की मार से मैं चुप हो जाती है। पिताजी को काम से समय नहीं मिल पाता और मामाजी और नानाजी भी उनसे कम व्यस्त नहीं रहते। इसी कारण वश में जयपुर जैसे ननिहाल को पाकर भी हवा महल के दूर घर के आसपास की गलियां भी नहीं जानती। पर हां, अब कुछ जानने लगी हूं। गांव का भी मैंने केवल कोठी और खेत ही देख रखे हैं पर आज मेरे दूसरे नानाजी की सेवानिवृत्ति ने गांव का जादू देखने का अवसर दे दिया। बड़े बड़े पहाड़ हैं और कई प्रकार के फूल खिले हैं। ऐसा लगता है जैसे सुहागिन स्त्रियों ने हरी हरी साड़ियां पहनी है और फूलों से श्रृंगार किया है । कोहरे को चीरती हुई किरणें जैसे उनका भूषण है। ठंडी हवा चल रही है। सब कुछ इतना सुंदर है कि सफर कितना लंबा है इसलिए कोई चिंता ही नहीं है। गांव की बात की जाए तो गांव की सड़कों को कैसे भुला जा सकता है। देश के विकास के लिए गांव का भी विकास आवश्यक है पर गांव में जितने भी विकास हो जाए आपको पहिया घुमाते हुए बच्चे अवश्य देखने को मिलेंगे । उनके खिलखिलाहट, हंसी - ठिठोली तनाव की अग्नि पर शीतल जल पड़ने जैसी होती है।
सफर इतना जल्दी कैसे पूर्ण हुआ पता ही नहीं चला हम कब के स्कूल से लौट कर आ गए। विद्यालय जाकर मुझे अपने विद्यालय की याद आ गई । अब तो विद्यालय से दो दिन दूर क्या हुई लगता है जैसे दो साल बीतने को आए। ऐसा लगा आप मुझ में बचपन से ही है । मेरे विद्यालय की शिक्षिकाओं से ही स्कूल से इतना स्नेह है और मेरे सहपाठी हो तो उनकी बात ही क्या। स्कूल पहुंचते ही वहां के बच्चों की प्रतिक्रियाओं से मैं मेरे और मेरे सहपाठियों के बचपन को याद कर रही थी। यह साल मेरा विद्यालय में अंतिम साल है और यही साल कब पलक झपकते ही हाथ से चला जाएगा इसका दुख है । साथ ले जाने को बस ज्ञान और स्मृतियां रह जाएंगी। अब तो समय यहीं रुक जाने की आशाओं ने प्रार्थनाओं में जगह बना ली है।
विद्यार्थियों का नानाजी के प्रति स्नेह देखकर भावुक हो गए और सबसे अधिक तो नाना जी भावुक हो रहे थे। सही है, एक न एक दिन तो यह होना ही था । कोई भी यहां अनंत नहीं है, ईश्वर के सिवा।
अब भारतीय रस्मों के संदर्भ में आपको क्या क्या बताऊं। नीम के पत्तों की बंदनवार शाही परिवार के झूमर को भी पछाड़ सकती है । देसी घी की सुगंध अच्छे स्वास्थ्य की सुगंध सी लगती है। वही रही मिट्टी की सुगंध, वह तो अतुल्य है ही । घर की वास्तुकला कड़ाके की ठंड में गर्माहट और कोयल सी तपती धूप में ठंडक की राहत प्रदान करती है। मेरी मां कहती है कि आज तक इस ग्वाड़ी में कभी किसी बच्चे को चोट नहीं लगी और वातावरण इतना शांत है कि यदि 2 - 3 डी जे भी लगवा दिए जाएं तो आप अपने कमरे में शांति से सो सकते हैं। गुवाहाटी की बनावट देखी जाए तो दाएं हाथ चूल्हा - चौका, बाएं हाथ बैठक और क्या बचा, शयनकक्ष तो वह कहीं भी बनाएं जाएं घर के वास्तु शिल्प में कोई अड़चन नहीं । मंदिर की बात की जाए तो मंदिर का मुख्य द्वार पूरब की ओर ही होना चाहिए। पहले के कारीगर निर्माण कार्य में चूने और पत्थर का प्रयोग किया करते थे । यदि कहें मकान का ढांचा कैसे तैयार होता है तो इसके लिए किसी सरिया लकड़ी का प्रयोग नहीं किया जाता था । यहां काम आते थे आंकड़े के पत्ते। इनसे मकान का ढांचा तैयार किया जाता था । प्रतिकूल मौसम में अनुकूल राहत के लिए घर की छत अहम भूमिका निभाती है । आंकड़ों के पत्तों में गोबर और मिट्टी मिलाई जाती थी । पत्तों का लचीलापन ढांचा बनाने के लिए महत्वपूर्ण है । बनाए गए मिश्रण से तैयार किया जाता है ढांचा और फिर डाला जाता है चूना। जब चूना सूख जाता था तब ऊपर से उसे मोगरी से कूटा जाता था । फिर से चूना डालकर सूखने पर फिर मोगरी से कूटा जाता था। यह प्रक्रिया दस - पंद्रह दिनों तक बार-बार दोहराई जाती थी। चूने का प्रयोग उसकी मजबूती के कारण किया जाता था इसलिए लोहे के सरियों की आवश्यकता ही नहीं होती थी । बिना सर यह कि यह मकान सौ साल से भी अधिक पुराने होंगे । भविष्य में भी कुछ शताब्दी या यह बिना सीलन और वातानुकूलित रहकर अपनी इसी मजबूती से खड़े रहेंगे। इसलिए यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि पुरातत्व जन हम से समृद्ध और कौशल पूर्ण थे। यदि इन्हीं परंपराओं को आगे बढ़ाया जाए जो धार्मिक नहीं अपितु हमारी संस्कृति है तो भारत को स्वाधीन, स्वतंत्र और समृद्धि दशक में बना सकते हैं। यह परंपराएं विज्ञान और मूल्यों के आधार पर बनी है जिन्हें हमें अपनाना चाहिए।
साईं काल मेरे प्यारे से भाई की सूर्य पूजा होगी। अभी सब छोटे - बड़े अपने कार्यों में व्यस्त हैं। कोई हलवाई का काम संभाले हुए हैं तो कोई परोसगारी में लगा हुआ है। मेरी मासी - मामी, मेरी ममता बॉस ( मेरी मां) गीत गा रही है।
मैं अपनी मां को ममता बोस इसलिए बोलती हूं क्योंकि मां ममता की मूरत होती है और मेरी मां ममता की बॉस है इसलिए। सुनने वाले को हंसी अवश्य आए पर इसके पीछे का कारण मुझसे ज़रूर पूछें । औरतें ऐसे गीत गा रहे हैं जैसे कोई जुगलबंदी चल रही हो और हम बच्चे हंसी ठिठोली कर रहे हैं।
गांव के रीति-रिवाजों में हम सम्मिलित भले ही सम्मिलित न हुए हैं पर बहुत सी चीजें ऐसी थी जो मैंने अनुभव की। ऐसा इसलिए संभव हो पाया क्योंकि गांव के लोगों की दिनचर्या में अब भी तर्कसंगत व्यवहार संरक्षित है।
यहां से जाने की इच्छा अच्छी नहीं लग रही है परंतु अपनी पढ़ाई को छोड़कर मैं यहां भी तो नहीं रुक सकती। हमें लयणा और वस्त्रों के साथ विदा किया जा रहा है। अंग्रेजी में इसे ' गिफ्ट्स ' कहेंगे । यदि यही गिफ्ट्स शादी ब्याह में दिए जाए तो कुछ गलत नहीं है ना। बिल्कुल नहीं दहेज अर्थात शादी ब्याह में दिया जाने वाले गिफ्ट जो कि देना गलत नहीं है। यह हमारी संस्कृति से जुड़ा है यदि यही तो है किसी पर वह कार्य में सर सम्मति दिए जाएं तो गलत नहीं । कई लोगों ने इन " गिफ्ट्स " की मांग करना आरंभ किया । यहीं से दहेज जैसी गिफ्ट्स देकर प्रेम बांटने वाली प्रथा कू प्रथा कहलाई जाने लगी। हमने इस प्रथा को एक ही नज़रिये से देखा - परखा । दहेज की मांग दिखावे की नींव पर टिकी हुई है जो यश के लिए अतिआवश्यक होती है । हमारे पूर्वज वैभव और बुद्धि में इतने समृद्ध थे और हम उन्हीं के वंशज होकर उनकी बनाई गई परंपराओं को अपने मत से तोड़ - मरोड़ भी देते है और सही - गलत भी ठहरा देते है। यह सोचकर गुस्सा आता है कि हम अपनी परंपराओं को गहराई से जानना ही नहीं चाहते और जानते भी नहीं।
जैसे कि लोगों की दिनचर्या में रीतियां परंपराएं होती हैं इसलिए आज भी राजस्थान में लेनदेन बहुत होता है और इन्हें अच्छे आचरण व्यवहार से स्वीकारा भी जाता है।
सोचती हूं के दो दिन की यात्रा में इतना अनुभव किया तो पूरे राजस्थान भ्रमण में क्या होगा। " राजस्थान री नगरी " को मैं छोड़कर जाने वाली हूं पर फिर कर वापस आने के लिए।
१/११/२१
मैं अब वही हूं जहां मैं जयपुर पहुंचने से पहले थी, ट्रेन में। यात्रा मन मार कर पूरी की परंतु अच्छा पढ़ने लिखने की इच्छा ने इसे पुनः जीवित कर दिया। आखिर मुझे पूरे भारत भ्रमण का सपना जो पूर्ण करना है। मैं धन्य हूं कि जहां स्त्रियों को भी शिक्षा मिलती है, उस समय में जन्म लिया। धन्यवाद उन क्रांतिकारियों को जिन्होंने स्त्री शिक्षा पर जोर दिया। धन्य हूं मैं इस पावन पृथ्वी, भारत की बेटी हूं मैं।
जय हिंद, जय भारत।
