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Rohit Vyas

Children Stories Inspirational

3  

Rohit Vyas

Children Stories Inspirational

भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता

भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता

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ए सुदामा मुझे भी सीखा दें कोई हुनर तेरे जैसा,

मुझे भी मिल जाएगा फिर कोई दोस्त कृष्ण जैसा।।

इस सम्पूर्ण संसार में मानव हर दूसरे व्यक्ति से किसी ना किसी प्रकार के रिश्ते में बंधा हुआ है। मानवीय रिश्तों में माता, पिता, गुरु, भाई, बहन, मित्र, सगे संबंधियों आदि का अपना विशेष महत्व होता है। जिनके आधार पर ही समस्त सृष्टि की रचना हुई है। उपरोक्त सभी रिश्तों में से मित्रता सबसे श्रेष्ठ होती है। जिसको निभाते समय व्यक्ति जात पात, ऊंच नीच, धर्म विशेष आदि के बारे में नहीं सोचता है। यह दो समान विचार रखने वाले व्यक्तियों को परस्पर मिलाती है। इसके अलावा, विपदा की स्थिति में व्यक्ति के सबसे निकट उसका मित्र ही होता है। यही कारण है कि भारतीय समाज में सदैव ही भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण दिया जाता रहा है।

भगवान श्री कृष्ण और सुदामा कैसे बनें मित्र?

भगवान श्री कृष्ण और सुदामा जब आचार्य संदीपन के गुरुकुल में पढ़ने के लिए जाते थे। उसी दौरान इनकी मित्रता हुई थी। धार्मिक कहानियों के आधार पर, भगवान श्री कृष्ण उस वक्त द्वारका नगरी के राजा हुआ करते थे। जबकि सुदामा अस्मावतीपुर के एक गरीब ब्राह्मण थे। परन्तु भगवान श्री कृष्ण ने सदैव ही सुदामा को अपना प्यारा मित्र माना और आवश्यकता पड़ने पर उनकी हर संभव सहायता की। तो वहीं, सुदामा ने भी भगवान श्री कृष्ण के साथ सच्ची मित्रता निभाई।

सुदामा ने भगवान श्री कृष्ण को दरिद्र होने से बचाया

प्राचीन समय में एक गरीब ब्राह्मणी थी। पिछले कई दिनों से उसे भिक्षा प्राप्त नहीं हुई थी। जिस कारण वह उन दिनों पानी पीकर सो जाया करती थी। फिर एक दिन उसे भिक्षा में मुट्ठी भर चने मिले। जिसे अपने सिरहाने रखकर वह सो गई। उसी रात उस पोटली को चुराने कुछ चोर आए। चोरों को लग रहा था कि इस पोटली में सोने के सिक्के हैं। परन्तु जैसे ही उस गरीब ब्राह्मणी को आहट हुई। उसने जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। साथ ही उस गरीब ब्राह्मणी ने यह श्राप भी दे दिया कि जो भी यह चने खाएगा, वह दरिद्र हो जाएगा। ऐसे में ब्राह्मणी का शोर सुनकर चोर वहां से पोटली लेकर भाग गए। और चोरों के रास्ते में आचार्य संदीपन का आश्रम पड़ा। उन्होंने वह पोटली वहीं छोड़ दी। जिसे गुरुमाता ने उठा लिया। सुबह जब सुदामा जंगल से लकड़ी लेकर गुरुमाता के पास पहुंचे। तो उन्होंने वह चने की पोटली सुदामा को दे दी। साथ ही उन्होंने कहा कि यह श्री कृष्ण के साथ बांटकर खा लेना। सुदामा एक ज्ञानी ब्राह्मण थे। जिसके चलते उन्होंने चने की पोटली भगवान श्री कृष्ण के साथ ना बांटकर स्वयं खा ली। क्योंकि उनका मानना था कि यदि भगवान श्री कृष्ण यह चने खा लेंगे तो संपूर्ण जगत दरिद्र हो जाएगा। इस प्रकार, सुदामा ने स्वयं चने खाकर भगवान श्री कृष्ण को दरिद्रता के श्राप से बचा लिया।

भगवान श्री कृष्ण ने निभाया मित्रता का फर्ज

एक बार सुदामा की पत्नी सुशीला ने कहा कि वह भगवान श्री कृष्ण के पास जाकर उनसे आर्थिक मदद मांगे। जिसपर सुदामा ने कहा कि उनके पास भगवान श्री कृष्ण को देने के लिए कोई भेंट नहीं है। वह खाली हाथ भगवान श्री कृष्ण के पास मदद मांगने नहीं जा सकते हैं। जिस पर सुदामा की पत्नी ने थोड़े से चावल पोटली में बांधकर सुदामा को दे दिए। जिसे लेकर सुदामा भगवान श्री कृष्ण को बुलाने चल पड़े। लेकिन रास्ते में जब सुदामा ने लोगों से यह कहा कि वह श्री कृष्ण के मित्र है। तो लोगों ने उनकी गरीबी देखकर उनका मजाक उड़ाया। यह बात जब भगवान श्री कृष्ण को मालूम पड़ी। तब वह नंगे पैर ही सुदामा से मिलने के लिए दौड़ पड़े। भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा को देखते ही उन्हें गले लगा लिया। इतना ही नहीं भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा के पैरों को अपने आंसुओं से धोया और भाभी सुशीला द्वारा भेजे गए चावल को बड़े ही चाव से खाया। हालांकि सुदामा अपनी मदद वाली बात भगवान श्री कृष्ण ने कह नहीं सके। लेकिन भगवान श्री कृष्ण सुदामा के बिना कुछ कहे सब कुछ समझ गए थे। ऐसे में जब सुदामा भगवान श्री कृष्ण से मिलकर वापस लौटे। तब उन्हें अपनी झोपड़ी के स्थान पर महल मिला और उनकी पत्नी सुशीला किसी रानी से कम नहीं लग रही थी। जिसपर उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को धन्यवाद दिया और सुदामा एक सुविधापूर्ण जिंदगी व्यतीत करने लगे। और सुदामा का गांव अस्मावतीपुर सुदामापुरी के नाम से जाना जाने लगा। तो हम कह सकते हैं कि भगवान श्री कृष्ण ने बिना अपने मित्र के कहे उनके दिल का हाल जान लिया था।

इस प्रकार, भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता युगों युगों तक आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी। साथ ही भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता हिंदू शास्त्रों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। जिनका उदाहरण देकर

आगे मित्रता की कसमें खाई जाएंगी।



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