Rahul Vats

Others


4.6  

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बारिशें - II

बारिशें - II

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"माँ माँ देखो ना ! माँ!!" कैरी यही रट लगा रही थी और लगाए भी क्यूँ ना , उसकी छोटी नीली नाव जो बूंदों के बीच में हिचकोले खा रही थी। कभी यहाँ डोले तो कभी दूसरी बूंद के पढ़ते ही वहाँ चली जाए! कैरी को बस कुछ घंटे ही लगे थे उस कागज की नाव को बनाने में। वो पिछले कई दिनों से कोशिश कर रही थी की एक सुंदर सी उसकी खुद की नाव हो जिसका कोई नाम तो नहीं था पर माँ के कहने पर उसने नाम रख लिया था।


बादल तो मानो यूं बरस रहे थे जेसे सभी नदियों का पानी आज ही बरसा देंगे। बादल की गरज से कैरी बीच बीच में चौंकती तो माँ की ओर ताकने लगती। माँ की आँखों में सुकून मिलता तो वो फिर से अपने खेल और खुशी में लौट आती। कैरी अपनी नाव को हाथों से पानी की लहर बना कर बालकनी के एक छोर से दूसरे छोर तक ले जा कर खेल रही थी। बालकनी के बाहर के हिस्से में जाली बनी थी और उस तरफ पानी ज्यादा जम रहा था। कैरी पूरी कोशिश कर रही थी की नाव को उस तरफ भेज दे पर यह होता इससे पहले ही कैरी की आवाज आई। "माँ! नाव गीला माँ! हप्प !" और इसी के साथ माँ दौड़ कर आई और नाव को पानी से बाहर निकाला जो की पूरी गीली हो गई थी। कैरी अब रोने लगी थी क्योंकि उसकी नाव "हप्प" अब तैर नहीं रही थी। अपनी गीली फ्राक को पकड़े वो अपनी माँ की तरफ देख रही थी। उसकी आँखों में दो मोटे मोटे आँसू की बूंदें मोतियों के जैसे जम रही थी जो उसकी गालों की तरफ बढ़ रहे थे। माँ ने उन्हें गिरने से पहले ही अपने हाथों से पोंछा और कैरी को अपनी गोद में उठा लिया। सुबकते हुए कैरी ने हप्प को अपने हाथों में कस्स कर पकड़ लिया और एक टूक जमीन पर गिरती हुई बूंदों को देखने लगी। ना जाने क्यूँ माँ ये सब देख कर मुस्कुरा रही थी।


नाव बनाने का तरीका कैरी को स्कूल के आर्ट्स एण्ड क्राफ्टस टीचर ने सिखाया था। उसे उस दिन से ही अपनी खुद की एक नाव चाहिए थी और आज उसने खुद की हप्प बनाई वो भी नीले रंग की।


बच्चे और उनकी छोटी छोटी खुशियां।


एक हफ्ते बाद आज जाकर कैरी को मौका मिला था बारिश में खेलने और अपनी नाव चलाने का। शाम के 4 बज रहे थे और माँ कैरी के लिए दूध और साथ में चॉकलेट वाले बिस्कुट ला रही थी। माँ जानती थी की उदास कैरी को कैसे खुश किया जाए। माँ ने प्लेट और दूध का गिलास टेबुल पर रखा और दूसरे कमरे में चली गई क्योंकि पापा माँ को बुला रहे थे। माँ के जाते ही कैरी उछल कर बिस्किट की और लपकी और एक बिस्किट लेकर दूध के गिलास में डाल दिया। और उसके बाद एक और डाल दिया। कैरी दूध का गिलास अपने दोनों हाथों से पकड़ कर पी ही रही थी की देखा माँ वापिस आ रही थी। माँ के दोनों हाथ पीछे की तरफ थे और चेहरे पर एक शरारत और ममता से भारी मुस्कान थी। कैरी उठ कर माँ की और दौड़ी तो इससे पहले ही माँ ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा लिए और कैरी के चेहरे की चमक बढ़ गई। माँ के हाथों में रंगीन कागज के अनेक पन्ने थे और कैरी उन्हे देख कर खुश हो रही थी और चहेकने लगी "माँ !! हप्प!! माँ !! हप्प!!"।


एक नाव ही तो डूब गई थी और इस बात को पापा से बेहतर कोई ना समझ था। जिस वक्त माँ और कैरी खेल रहे थे तब पापा ने भी दोनों को खेलते हुए देखा था पर कुछ कहा या किया नहीं। और जब बाद में पापा ने देखा की "हप्प" गीली हो गई है तो पापा ने अपने ऑफिस के कागजों में से कई रंगीन पन्ने निकाल कर कैरी के लिए रख दिए और कैरी को देने का इंतज़ार कर रहे थे। पर उन्हे समय नहीं मिला तो उन्होंने माँ को दे दिए।


कुछ घंटों बाद कैरी के पास कुछ एक-आध दर्जन नावें थी। कुछ बड़ी कुछ छोटी कुछ लंबी और कुछ चकोर सी।इनमे से एक नाव थी सफेद रंग की जो एक तरह के चमकीले कागज़ से बनी थी। नाम था "ननू"।कैरी की पसंदीदा।


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