आवाज़ों का पेड़
आवाज़ों का पेड़
बहुत समय पहले की बात है। पहाड़ों और जंगलों के बीच एक छोटा-सा गाँव था, जिसका नाम था अंबरपुर। यह गाँव इतना शांत था कि रात को हवा की आवाज़ भी साफ सुनाई देती थी। लोग सादा जीवन जीते थे। खेत, पशु और छोटा-सा बाजार… यही उनकी दुनिया थी।
लेकिन इस गाँव में एक अजीब बात थी। गाँव के बाहर, एक पुराने टीले पर एक बहुत बड़ा पेड़ खड़ा था। वह पेड़ इतना पुराना था कि गाँव के सबसे बुज़ुर्ग आदमी को भी नहीं पता था कि वह कब से वहाँ है। लोग उसे “आवाज़ों का पेड़” कहते थे।
क्यों?
क्योंकि जब भी कोई उसके पास जाता… उसे लगता कि पेड़ के अंदर से हल्की-हल्की आवाजें आ रही हैं।
कोई कहता उसे हँसी सुनाई देती है।
कोई कहता किसी के रोने की आवाज आती है।
और कोई कहता जैसे कोई बहुत पुरानी कहानी सुना रहा हो।
गाँव वाले उस पेड़ से थोड़ा डरते भी थे और थोड़ा सम्मान भी करते थे। इसलिए कोई भी रात के समय उसके पास नहीं जाता था।
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एक जिज्ञासु लड़का
उसी गाँव में एक बारह साल का लड़का रहता था। उसका नाम था नयन।
नयन बाकी बच्चों से थोड़ा अलग था। उसे हर चीज़ के बारे में जानने की आदत थी। वह हमेशा सवाल पूछता रहता।
“आसमान नीला क्यों होता है?”
“हवा दिखती क्यों नहीं?”
“और उस पेड़ में आवाजें क्यों आती हैं?”
गाँव के लोग अक्सर उसके सवालों से परेशान हो जाते।
एक दिन नयन ने अपने दादा से पूछा,
“दादा, उस आवाजों वाले पेड़ की असली कहानी क्या है?”
दादा कुछ देर चुप रहे। फिर बोले,
“बेटा, बहुत पुरानी बात है। कहा जाता है कि उस पेड़ में दुनिया की सारी अधूरी बातें जमा हो जाती हैं।”
नयन ने हैरानी से पूछा,
“अधूरी बातें?”
दादा मुस्कुराए,
“हाँ… जो बातें लोग कहना चाहते थे लेकिन कह नहीं पाए। जो सपने पूरे नहीं हुए। जो माफ़ी माँगनी थी पर माँगी नहीं गई। वो सब उस पेड़ के अंदर जमा हो जाती हैं।”
नयन की आँखें चमक उठीं।
“मतलब पेड़ बातें सुनता है?”
दादा ने कहा,
“शायद… और शायद वह उन्हें संभाल कर भी रखता है।”
उस रात नयन को नींद नहीं आई। वह बार-बार उसी पेड़ के बारे में सोचता रहा।
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पहली मुलाकात
अगली सुबह, सूरज निकलते ही नयन चुपचाप घर से निकल गया।
वह खेतों से गुजरता हुआ उस टीले तक पहुँचा जहाँ वह पेड़ खड़ा था।
पेड़ सच में बहुत विशाल था। उसकी शाखाएँ इतनी बड़ी थीं कि लगता था जैसे आकाश को पकड़ने की कोशिश कर रही हों।
नयन धीरे-धीरे पेड़ के पास गया।
पहले तो उसे कुछ नहीं सुनाई दिया।
फिर उसने अपना कान पेड़ के तने से लगा दिया।
कुछ सेकंड बाद…
उसे सच में आवाजें सुनाई देने लगीं।
बहुत धीमी।
जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो।
एक आवाज कह रही थी,
“काश मैं उससे माफी मांग पाता…”
दूसरी आवाज थी,
“मैंने कभी अपना सपना किसी को नहीं बताया…”
एक और आवाज…
“मैं उसे बताना चाहता था कि मैं उससे प्यार करता हूँ…”
नयन चौंक गया।
वह पीछे हट गया।
उसने चारों तरफ देखा। वहाँ कोई नहीं था।
आवाजें सच में पेड़ के अंदर से आ रही थीं।
नयन के मन में डर भी था, लेकिन उससे ज्यादा उत्सुकता।
उसने धीरे से कहा,
“क्या तुम मुझे सुन सकते हो?”
कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।
फिर…
एक नई आवाज आई।
“हाँ…”
नयन का दिल तेज़ धड़कने लगा।
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पेड़ का राज
नयन ने धीरे से पूछा,
“तुम कौन हो?”
आवाज आई,
“मैं कोई एक नहीं हूँ… मैं बहुत सारी आवाजों का घर हूँ।”
नयन समझ नहीं पाया।
“क्या तुम पेड़ हो?”
आवाज हल्की हँसी में बदल गई।
“शायद… तुम ऐसा ही कह सकते हो।”
नयन ने पूछा,
“तुम लोगों की बातें क्यों रखते हो?”
आवाज ने कहा,
“क्योंकि इंसान अक्सर देर कर देते हैं।”
“देर?”
“हाँ… कुछ लोग अपनी सच्ची बातें कहने से डरते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि कल कहेंगे। लेकिन कई बार वो कल आता ही नहीं।”
नयन चुप हो गया।
आवाज फिर बोली,
“जब कोई इंसान अपनी बात दिल में दबा लेता है… वो बात हवा में भटकती रहती है। और फिर आकर मेरे अंदर बस जाती है।”
नयन को यह बात अजीब भी लगी और दुखद भी।
“तो क्या ये आवाजें हमेशा यहीं रहती हैं?”
पेड़ बोला,
“जब तक कोई उन्हें सुन न ले… समझ न ले… और आगे न बढ़ा दे।”
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एक नया विचार
उस दिन नयन देर तक पेड़ के पास बैठा रहा।
वह अलग-अलग आवाजें सुनता रहा।
किसी की अधूरी दोस्ती।
किसी की खोई हुई हँसी।
किसी का अधूरा सपना।
जब वह वापस गाँव लौटा, उसके दिमाग में एक अजीब-सा विचार था।
अगले दिन उसने अपने दोस्तों को बुलाया।
“चलो तुम्हें एक जगह दिखाता हूँ।”
दोस्त पहले तो डर गए।
“नहीं… वो आवाजों वाला पेड़!”
लेकिन नयन ने उन्हें समझाया।
आखिर चार बच्चे उसके साथ चल पड़े।
पेड़ के पास पहुँचकर नयन ने कहा,
“कान लगाकर सुनो।”
एक-एक करके सबने सुना।
और सब हैरान रह गए।
“ये तो सच में बोल रहा है!”
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आवाजें लौटाने का मिशन
उस दिन नयन ने एक फैसला किया।
“हम इन आवाजों को वापस दुनिया तक पहुँचाएँगे।”
दोस्तों ने पूछा,
“कैसे?”
नयन बोला,
“जो बातें लोग कह नहीं पाए… हम उन्हें कहानी बना कर सुनाएँगे।”
उस दिन से बच्चों ने एक नया काम शुरू किया।
हर दिन वे पेड़ के पास जाते।
नई आवाजें सुनते।
फिर गाँव लौटकर उन आवाजों को कहानी में बदल देते।
कभी किसी बूढ़े आदमी की अधूरी माफी की कहानी।
कभी किसी लड़की के अधूरे सपने की कहानी।
कभी दो दोस्तों की टूटी दोस्ती की कहानी।
धीरे-धीरे गाँव में लोग शाम को इकट्ठा होने लगे।
बच्चे कहानियाँ सुनाते।
लोग सुनते… और कई बार उनकी आँखों में आँसू आ जाते।
क्योंकि उन कहानियों में उन्हें अपनी ही जिंदगी की झलक मिलती थी।
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गाँव में बदलाव
कुछ महीनों बाद अंबरपुर बदलने लगा।
लोग अब अपनी बातें छुपाने से कम डरने लगे।
एक दिन गाँव का एक आदमी उठा और बोला,
“मैं अपने भाई से दस साल से बात नहीं कर रहा… लेकिन आज मैं उससे माफी माँगना चाहता हूँ।”
दोनों भाई गले लग गए।
एक लड़की बोली,
“मुझे गाना गाना है… लेकिन मैं डरती थी।”
गाँव वालों ने कहा,
“गाओ।”
धीरे-धीरे गाँव में अधूरी बातें कम होने लगीं।
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पेड़ की आखिरी फुसफुसाहट
एक दिन नयन फिर पेड़ के पास बैठा था।
उसने कान लगाया।
लेकिन इस बार आवाजें बहुत कम थीं।
पेड़ ने धीमे से कहा,
“तुमने अच्छा काम किया है।”
नयन ने पूछा,
“क्या अब आवाजें खत्म हो जाएँगी?”
पेड़ बोला,
“शायद नहीं… दुनिया बहुत बड़ी है।”
“लेकिन अब लोग जल्दी बोलना सीख रहे हैं।”
नयन मुस्कुराया।
“अगर फिर आवाजें आएँगी तो?”
पेड़ ने कहा,
“तब कोई और बच्चा उन्हें सुनेगा… और कहानी बना देगा।”
नयन ने पेड़ को धीरे से छुआ।
उस दिन उसे पहली बार लगा कि पेड़ सच में खुश है।
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कई साल बाद
समय बीतता गया।
नयन बड़ा हो गया।
लेकिन उसकी कहानियाँ दूर-दूर तक फैल गईं।
लोग कहते थे,
“अगर दिल में कोई बात अटकी हो… तो कहानी सुनाओ।”
और इसी तरह दुनिया में एक नई परंपरा शुरू हुई।
लोग अपने दिल की बातें छुपाने के बजाय कहानियों में बदलने लगे।
और कहीं दूर…
अंबरपुर के बाहर…
वह पुराना पेड़ अब भी खड़ा था।
हवा जब उसकी शाखाओं से गुजरती…
तो लगता जैसे वह अब भी धीमे-धीमे कहानियाँ सुना रहा हो।
शायद नई।
शायद पुरानी।
शायद किसी ऐसी आवाज की…
जो अभी तक किसी ने सुनी ही नहीं।
