आखिर
आखिर
दुर्गा पूजा,,,,,महाअष्टमी,,,,
सुबह जल्दी उठकर स्नान करके मैं अपने परिवार के साथ पूजा मंडप पहुंचा।
सुबह व्रत रखा था। मंडप में सपरिवार पुष्पांजलि दिया। पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद मंडप में उपस्थित सभी भक्तों को प्रसाद दिया गया।
हमने भी प्रसाद लिया। प्रसाद में प्रत्येक को एक बूंदी लड्डू और एक ककड़ी दिया गया।
मैने लड्डू खाया और ककड़ी को हाथ में लेकर मंडप से बाहर निकल आया।
सोचा, ककड़ी घर पहुंचकर खाऊंगा।
जब मैं मंडप के गेट से बाहर निकल रहा था, मैने देखा एक भिखारिन वहां खड़ी है। उसने मुझे पुकारा, "काका,,,,,", और इशारे से भीख मांगने लगी। मैंने अपने हाथ में लिया हुआ ककड़ी उस भिखारिन को देना चाहा।
लेकिन उस भिखारिन ने वह ककड़ी लेने से इंकार कर दिया।
उसने मुझसे कहा, "मैं यह खाती नही हूं"। यह सुनकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ।
मैं प्रायः प्रतिदिन एक केला और एक ककड़ी खाता हूं। ,,,,और एक इंसान जो भीख मांग रहा है, उसे भी खाने_पीने के बारे में पसंद_नापसंद है।
घर आने के बाद मैंने वह ककड़ी खाया।
दुर्गा पूजा,,,, महानवमी,,,,,
पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद प्रसाद लेकर मैं मंडप से बाहर निकला।
इस दिन प्रसाद में सभी को सूजी और एक संतरा दिया गया। मैंने सूजी प्रसाद मंडप में ही खा लिया और संतरा को हाथ में लेकर मंडप के गेट की ओर चल दिया।
मंडप के गेट के पास एक वृद्ध भिखारी बैठकर भीख मांग रहा था।
मैने उससे पूछा, "संतरा खाओगे,,,"
उसने मुझे जवाब दिया, "क्यों नहीं खाऊंगा,,,,आप मुझे जो कुछ भी देंगे मैं लूंगा,,,,कुछ खाने को मिले इसलिए ही तो मैं भीख मांग रहा हूं।"
यह सुनकर मैंने उसे वह संतरा दिया और गेट से बाहर निकलकर घर के तरफ चलने लगा।
चलते _ चलते मैं सोचने लगा, भीख किस को दूं ,,,,,
मैं कशमकश में पड़ गया, "आखिर,,, भिखारी कौन हैं?" ,,,,,
