A letter to Nobody
A letter to Nobody
मैं लेखक हूँ, चाहूँ तो पूरी कायनात के बारे में लिख सकता हूँ। पर शायद शब्दों की भी एक सीमा होती है, जो मुझे तुम्हारे बारे में लिखने से रोक देती है। शायद शब्द भी जानते हैं कि वे तुम्हारे स्वरूप को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकते।
क्या तुम्हें याद है, हम पहली बार कब मिले थे? वह मेरी ज़िंदगी के सबसे हसीन लम्हों में से एक था। अगर मेरा बस चले, तो मैं उसी एक पल में हमेशा के लिए ठहर जाऊँ। उस दिन तुम्हारी गुलाबी साड़ी पर बने वे लाल फूल ऐसे लग रहे थे, मानो आकाशगंगा में तारे चमक रहे हों। जब तुम मेरे पास से गुज़रीं, तो लगा जैसे मेरा पूरा जीवन सँवर गया। तुम्हारी खूबसूरती बनारस की गंगा आरती जैसी थी—इतनी भव्य कि मेरी आँखें उसे खुद में समेट न सकीं। उस दिन मुझे समझ आया कि आँसू सिर्फ दुख में नहीं निकलते। पहली नज़र का प्यार क्या होता है, उसका अहसास मुझे उसी दिन हुआ।
उस समय मन में एक स्वार्थी सा ख़याल आया था कि तुम इस भीड़ को छोड़ कर मेरे पास आओ और मुझे गले लगा लो। उस दिन से आज तक मैं बस इसी कोशिश में हूँ कि खुद को तुम्हारे काबिल बना सकूँ, और यकीन मानो, इस कोशिश में असफल होकर भी मैं खुश हूँ। मैं तुम्हारे कहे बिना ही जानता हूँ कि हम साथ नहीं रह सकते, और शायद हम दोनों के लिए यही बेहतर है। इस प्रेम के भँवर में अपनी नौका उतारना मेरे लिए ठीक नहीं।
कोई बात नहीं, इस जन्म में न सही, पर अगले जन्म में हम साथ होंगे। तब कोई भी सामाजिक या पारिवारिक बंधन हमें एक होने से नहीं रोक पाएगा। अलविदा! मैं हमेशा यही चाहूँगा कि तुम खुश रहो और तुम्हारा जीवन उल्लास से भरा रहे। यह तुम्हारे लिए मेरा आख़िरी ख़त है, इसके बाद मेरी तरफ से तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी। यह मत समझना कि मैं नाराज़ हूँ; लेखक हूँ, ऐसी नाराज़गी तो अक्सर किसी कहानी को लिखते समय आ ही जाती है।
शायद अब हमारी मुलाकात उस मोड़ पर होगी, जहाँ तुम चाहकर भी मेरी तरफ देख नहीं पाओगी और मैं न चाहते हुए भी तुमसे नज़रें नहीं हटा पाऊँगा।
