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सुलगती नदी थी...
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सुलगती नदी...
“
सुलगती नदी थी वो शीतल सा आग था वो तपती रेत को फिर से मुट्ठी मे भर कर उड़ा दिया आँशुओं की ओस में भींगी थी दिल की जमीं यादों के झोंके ने फिर से रूह के चादर उठा दिये --कंचन प्रभा
”
By
Kanchan Prabha
389
नदी
शीतलविचार
रेत
आँशु
दिल
जमीं
अपनीयादोंकेसाथ
रूह
नीलाचादर
झोंका
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Kanchan Prabha
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