Kanchan Prabha
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कैसे कहूँ कि तेरे बिना दिन ढल जाएगा कहीं कैसे कहूँ कि तेरे बिना शाम हो जाएगी कहीं चलते चलते हम आज ये कहां आ चुके कि कैसे कहूँ कि तेरे बिना दिल लग जाएगा कहीं kp

अपने अंतर्मन की ये व्याकुल व्यथा किसे सुनाऊँ मैं ये उठती गिरती लहरों की ऊंचाई ये दिल के ऊपर पड़े भारी पत्थर कैसे हटाऊँ मैं

अपने अंतर्मन की ये व्याकुल व्यथा किसे सुनाऊँ मैं ये उठती गिरती लहरों की ऊंचाई ये दिल के ऊपर पड़े भारी पत्थर कैसे हटाऊँ मैं

आईना भी क्या चीज है दिखाता तो सब सच है पर पूरा उल्टा कंचन प्रभा

रंग अनोखे जीवन के तरह तरह के उपवन से कंचन प्रभा

जीवन के रंग भी अजीब होते है कभी लगे तो दर्द दे कभी लगे तो खुशियां ही खुशियां कंचन प्रभा

चलो फिर से कुछ अच्छा सोचते है जिंदगी ही तो है कभी कभी बेइमान हो जाती है

हम कहां आसमान की इच्छा रखते थे पता नहीं था मेरे पर काट दिए गए थे कंचन प्रभा

कभी सोचूं तो लगता है कितना दुख है ना सोचूं तो सुख ही सुख है


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