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गिरती...

“ गिरती बूंदों सा गिर तू टुटके ज़मीन पर बिखर तू दुब जा किसी नदियां मे ऐसे के किसी की प्यास बन जा तू मिट्टी में चाहे मिल जाएे तू कीचड़ चाहे कहलाए तू बनजा वो दलदल जिसमें कमल खिला सके तू... ”

By Harshad Molishree
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