' सुकून हिंद सा '
' सुकून हिंद सा '
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अपना मुल्क छोड़ कर, शख्स वो जाने किधर गया ।
अक्सर कहता था जो मुझसे, "मर जाऊंगा, जो उधर गया ।।
मिला ना सुकूँ मुझे हिन्द सा, दुनिया में मैं जिधर गया ।
रंग है ये केसरी या लहू किसी का बिखर गया ।।
किसके हाथों के निशां है ये, कौन इस ध्वज को छूकर गया ।
पड़े जो कदम हिमालय की बर्फ पर, लगा स्वर्ग से गुजर गया ।।
हमें सभ्यता का ताना देते हो, पाक कौन सा सुधर गया ।
चढ़ा है रंग फितूरी का या इंकलाब कहकर उतर गया ।।
उम्मीद होगी क्या उससे, जो देशभक्ति से ही मुकर गया।
देख लाशें शहीदों की, मां का हृदय भर गया ।।
ना ईद मनी, ना दीवाली हुई, कहाँ कोई फौजी घर गया।
चमकती हैं आंखें भारत सुनकर, या आँखों का पानी मर गया ।।
