रजाई
रजाई
ठंड की जब भी बात होती है
तो रजाई ही बस साथ होती है,
चुपके से मुझको बाहों में लेती है
सच कहूं ये भी मां जैसी होती है।
जब भी थक जाता हूं मै काम से
मै इसको ओढ़ लेता हूं आराम से,
मेरी सारी थकान ये उतार देती है
ये मुझे गले लगाकर प्यार देती है,
जब भी हो पास अपनापन देती है
ये अहसास ही बहुत खास देती है,
चुपके से मुझको बाहों में लेती है
सच कहूं ये भी मां जैसी होती है।
मेरी बातों को सुनती है ध्यान से
समझती है बहुत इत्मीनान से,
मै आसूं भी दूं ये रख लेती है
मै कुछ भी कहूं सह लेती है,
ख़ुद में ये मुझको समा लेती है
पास बुलाकर सुला लेती है,
चुपके से मुझको बाहों में लेती है
सच कहूं ये भी मां जैसी होती है।
जैसा भी चाहूं इसको बना लेता हूं
कभी सिरहाना तो कभी चादर,
कुछ नहीं कहती कभी मुझसे
सिर्फ़ देती है सुकून का सागर,
जो भी मै मांगू मुझे दे देती है
गम में भी सदा सुख ही देती है,
चुपके से मुझको बाहों में लेती है
सच कहूं ये भी मां जैसी होती है।
सारी रिश्तेदारी ये मुझसे है निभाती
मेरे लिए सदा अपनापन है निभाती ,
ग़ैर इसको कैसे कह दूं हो नहीं सकती
ये मेरी है मुझसे दूर हो नहीं सकती,
प्यार की चादर से अपनी मुझको
ये जिन्दगी मेरी संवार देती है,
चुपके से मुझको बाहों में लेती है
सच कहूं ये भी मां जैसी होती है।
