नारी
नारी
मेरी कलम में शक्ति कहाँ,
जो लिख सकूँ नारी की महिमा।
कलम भी लिखकर थक जाती है,
जब लिखती है नारी की गरिमा।
बिन नारी संसार अधूरा, नारी से ही जग होता पूरा।
जो न समझे मान नारी का, उसका रहता ज्ञान अधूरा।1
नारी के तो रूप अनेक, सब रूपों में ममता एक।
कण-कण में है शक्ति इनकी, भाव बड़े ही इनके नेक।2
खुद काँटों पर चलकर ये, देती हरदम हमको छाँव।
ममता की इन मूरत के ही, पैरों में बसते पुरे धाम।3
खोलो आँखें अब तो देखो, क्या नारी की शक्ति है।
मिला अवसर जब से इनको, अलग ही रोमांच भरा है।
जहाँ हुआ सम्मान नारी का, वही चहल-पहल खुशहाली है।
जहाँ हुआ बहिष्कार नारी का, वहाँ दुःख दरिद्रता लाचारी है।
जिस कोख से जन्मे हो तुम, उसका न अपमान करो।
मिट जाएगा अस्तित्व तुम्हारा, अब तो इनका सम्मान करो।
उठो! बदलें दुनिया सारी, दें नारी को उनका मान।
तभी रहेगा अस्तित्व हमारा, और बढ़ेगा जग का मान।
बिन नारी संसार अधूरा, नारी से ही जग होता पूरा।
जो न समझे मान नारी का, उसका रहता ज्ञान अधूरा।
वंदना सिंह
