मैं क्यूँ अकेला
मैं क्यूँ अकेला
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चारों तरफ हैं
हँसते हुए चहरे
बिखरा है रंग, सुनहरी दुपहरें।
फिर मैं क्यूँ हूं तन्हा
मैं क्यूँ अकेला
रंग भी नहीं कोई
है बिल्कुल अंधेरा
तन्हाई में डूबा मेरा बसेरा।
फैली है खुशबू
है महकी बहारें।
घर को हम अपने
आओ मिलकर संवारें।
सबके हैं साथी
है सबका बसेरा।
फिर मैं क्यूँ हूं तन्हा
मैं क्यूँ अकेला।
काला है बियाबान ये जंगल घनेरा
खाये क्यूँ अंदर से मुझ को अंधेरा ।
