STORYMIRROR

Geetanjali Geetanjali

Others

3  

Geetanjali Geetanjali

Others

मैं औरत हूँ साहब !

मैं औरत हूँ साहब !

1 min
255

प्रेम बंधनों में बंध जाती हूँ

हर रिश्ता दिल से निभाती हूँ

बेगानों से परास्त नहीं होती कभी

बस अपनों से ही हार जाती हूँ


मुझे औरत कहते हैं साहब

सात फेरों का रिश्ता

सात जन्म तक निभाती हूँ


दर्द अपना जाहिर नहीं करती

उसकी कराह पर तड़प जाती हूँ

अपनी खुशी की परवाह नहीं,

उसकी खुशी पर अपनी

खुशी वार जाती हूँ


मुझे औरत कहते हैं साहब

अश्क आंखों में ले के मुस्कुराती हूँ

  

आसमान से ऊंची मेरी परवाज़  

ना किसी के रोके रुक पाती हूँ

घर की चार दीवारी में रहकर भी

चाँद सितारों तक हो आती हूँ


मुझे औरत कहते हैं साहब,

हर इक दरिया पार कर जाती हूँ


दोगे जो मान सम्मान तो

अपना आप भी मिटाती हूँ

करोगे प्रतिष्ठा पर प्रहार तो 

रणचन्डी भी बन जाती हूँ


मुझे औरत कहते हैं साहब,

अपने हक के लिए लड़ जाती हूँ


सहकर हल की नुकीली चोट मैं,

चीर अपना सीना अन्न उगाती हूँ 

सहन शक्ति में ना कोई मेरा सानी       

इसलिए धरा की बेटी कहलाती हूँ


मुझे औरत कहते हैं साहब,

हर घाव सह जाती हूँ ...



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Geetanjali Geetanjali