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Kalindi Rajgor

Others

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Kalindi Rajgor

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ज़िंदगी

ज़िंदगी

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एक दिन ज़िंदगी आई थी यूं ही बैठने पास मेरे,

और फिर पूछ बैठी के बता क्या हाल है तेरे !


मैंने भी मुस्कुरा कर बता दिया,

अच्छा !! तो अब तुम मुझसे सुनना चाहती हो खुद की ही कहानी,

करूँ पहले शिकायतें या फिर बताऊं की हो तुम कितनी सुहानी ।


कभी खुशियों की बारिश में भिगाती हो,

तो कभी आंखों के आंसू बन जाती हो ।


कभी बन जाती हो ख्वाबों की दुनिया मेरी,

तो कभी हकीकत से भी दोस्ती करवाती हो ।


हां! लगती हो तुम कभी शांत पानी के जैसी,

तो कभी सैलाब बन के आ जाती हो ।


कभी सुलझा देती हो हर बात को तुम,

तो कभी खुद ही खो जाऊं इतना उलझाती हो ।


ना जाना हो जहां , वही लाकर तुम सताती हो ,

ऐ ज़िंदगी!! क्या तुम जीना ऐसे ही सिखाती हो ?



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