ज़िंदगी
ज़िंदगी
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एक दिन ज़िंदगी आई थी यूं ही बैठने पास मेरे,
और फिर पूछ बैठी के बता क्या हाल है तेरे !
मैंने भी मुस्कुरा कर बता दिया,
अच्छा !! तो अब तुम मुझसे सुनना चाहती हो खुद की ही कहानी,
करूँ पहले शिकायतें या फिर बताऊं की हो तुम कितनी सुहानी ।
कभी खुशियों की बारिश में भिगाती हो,
तो कभी आंखों के आंसू बन जाती हो ।
कभी बन जाती हो ख्वाबों की दुनिया मेरी,
तो कभी हकीकत से भी दोस्ती करवाती हो ।
हां! लगती हो तुम कभी शांत पानी के जैसी,
तो कभी सैलाब बन के आ जाती हो ।
कभी सुलझा देती हो हर बात को तुम,
तो कभी खुद ही खो जाऊं इतना उलझाती हो ।
ना जाना हो जहां , वही लाकर तुम सताती हो ,
ऐ ज़िंदगी!! क्या तुम जीना ऐसे ही सिखाती हो ?
