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Aadarsh Sharma

Others

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Aadarsh Sharma

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झूलती मौत का अंत

झूलती मौत का अंत

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झूलती मौत थी हर रोज मेरे सर पे सवार, 

मैंने भी थी मन में ठानी,

झूलती मौत को मजा चखाने की ,

झूलती मौत से कर डाली एक दिन कबड्डी,

कभी झूलती मौत मेरे ऊपर,

और कभी मैं उसको पकड़ दबोचती,

झूलती मौत को ऐसा पछाड़ ,


झूले से उतार जमीन पर पटका,

झूलती मौत फिर न मेरे सिर पर झूली ,

दुबक कर छुप कर कहीं बैठ गई,

मौत के मर्म को ना समझना डरकर भागते रही,

मौत भी हर रोज झूल झूल कर ,

बिना मौत हर रोज मुझे मारती रही ,

जब मैं अकड़ के खड़ी हुई,

तब वह जाकर दुबक गई ,

डर डर के रोज क्यों मरना,

एक दिन की मौत ही भली।


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