झूलती मौत का अंत
झूलती मौत का अंत
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झूलती मौत थी हर रोज मेरे सर पे सवार,
मैंने भी थी मन में ठानी,
झूलती मौत को मजा चखाने की ,
झूलती मौत से कर डाली एक दिन कबड्डी,
कभी झूलती मौत मेरे ऊपर,
और कभी मैं उसको पकड़ दबोचती,
झूलती मौत को ऐसा पछाड़ ,
झूले से उतार जमीन पर पटका,
झूलती मौत फिर न मेरे सिर पर झूली ,
दुबक कर छुप कर कहीं बैठ गई,
मौत के मर्म को ना समझना डरकर भागते रही,
मौत भी हर रोज झूल झूल कर ,
बिना मौत हर रोज मुझे मारती रही ,
जब मैं अकड़ के खड़ी हुई,
तब वह जाकर दुबक गई ,
डर डर के रोज क्यों मरना,
एक दिन की मौत ही भली।
